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गुरुवार, नवंबर 8

माँ की वेदना

रंग लाया है आज वो बारुद
तुमने जो मेरे सीने में उतारा था।
प्रयोग जिस पे तुमने किये और
सहे जिसने दिल वो हमारा था॥

क्या तुम जानते हो ये हकीकत?
विस्फोट चाहे वो तुम्हारा था।
आग मेरे तन में उतरी थी जब
तुमने 'विज्ञान' को निखारा था॥


न जाने कितने घाव दिये उस
बेटे ने जो सब से दुलारा था।
माँ हूँ ना कई बार किया मैंने
विनाश की ओर ईशारा था॥

मगर हर बार हाँ हर बार
ईतिहास को बेटों ने नकारा था।
ईसीलिये अब भुगतोगे बारहा
सुनामी तो एक छोटा सा नजारा था॥

जैसी करनी वैसी भरनी
घाव बोने का काम तुम्हारा था।
काटनी पड़ेगी वही फ़सल
जैसा खेत तुमने संवारा था॥
कुमार अहमदाबादी   

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