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बुधवार, फ़रवरी 25

आयु का खेल


आयु का खेल

अनुवादक - महेश सोनी 


*“1 ₹ के 6 गोलगप्पे”* से *“30 ₹ के 6 गोलगप्पे होने तक हम बड़े हो गये। 

*“मैदान में आजा”*

और 



*“ऑनलाईन आजा”*

के बीच 

हम बडे हुए हैं।

        

*“होटल में खाने की इच्छा”*

एवं 

*“घर में खाने की इच्छा”*

के बीच हम बड़े हो गये।


*“बहन की पारले की चॉकलेट चुराने”*


और

*“बहन के लिये सिल्क लाने तक”*

हम बडे हो गये।

  

*“मम्मी, बस पांच मिनिट और सोने दे”*    

और

*“snooze बटन दबाने के बीच हम सब बडे हो गये। ये हमें मालूम ही नहीं हुआ।

 


*“टूटी हुई पेन्सिल”*


       

*“टूटे हुए मन”* के बीच हम बड़े हो गये।


*“मैं बडा होना चाहता हूं।”* 

और 

             

*“मैं फिर से बच्चा बनना चाहता हूं"* 

के बीच हम बडे गये।


*“चलिये, मिलकर आयोजन करें”*

से

*“चलिये मिलकर कुछ आयोजन करते हैं”*

इन दो OK के बीच हम बडे हो गये।

   

आखिर में           

*“किसी की तोंद निकल आयी है तो किसी के बाल झड़ गये हैं"*


*“आयु के हमारे साथ खेल कर गयी”*... 



*सब के* 

*क्या सपने थे* 

*और सब क्या बन गये हैं....*

*परिस्थिति अनुसार* 

*सब ने अपने अपने रास्ते चुन लिये हैं..!* 

मंगलवार, फ़रवरी 24

समाज सभ्य हो गया है (अनुदित)

 

अनुवादक - महेश सोनी 

✳️ समय पुराना था ✳️

लोगों के पास तन ढकने के लिये वस्त्र नहीं थे; लेकिन वे तन ढकने का प्रयास करते थे।

आज वस्त्रों के भंडार भरे पडे हैं लेकिन तन का प्रदर्शन करने के प्रयास करते हैं। 

समाज बहुत “सभ्य” हो गया है, है ना!



✳️ समय पुराना था ✳️

आवागमन के साधन मर्यादित थे; लेकिन लोग रिश्तेदारों से मिलने जाते थे। 

आज बेशुमार साधन है लेकिन लोग न मिलने के लिये बहाने बनाते हैं।

समाज बहुत सभ्य” हो गया है, है ना! 


✳️ समय पुराना था ✳️

एक घर की बेटी को पूरा गांव अपनी बेटी मानता था।

आज बेटी पड़ोसी के घर जाए तो भी मन डरता है।

समाज बहुत “सभ्य” हो गया है, है ना! 


✳️ समय पुराना था ✳️

लोग अपने इलाके के बुजुर्गों को हालचाल पूछ लेते थे।

आज लोग स्वयं अपने माता पिता को ही वृद्धाश्रम में भेज देते हैं।

समाज बहुत सभ्य हो गया है, है ना!




✳️ समय पुराना था ✳️

खिलौने सीमीत मात्रा में थे। इलाके के बच्चे साथ मिल जुलकर खेलते थे। आज बच्चे मोबाइल में कैद हो गये हैं।

समाज बहुत “सभ्य” हो गया है,‌ है ना!


✳️ समय पुराना था ✳️

गली के पशुओं को भी रोटी दी जाती थी। गाय और कुत्ते के लिये घर में दो रोटी हमेशा बनती थी।

आज पड़ोसी के बच्चे भूखे सो जाते हैं।

तब मानवता रोने लगती है।

समाज बहुत सभ्य हो गया है।



✳️ समय पुराना था ✳️

लोग पड़ोसी के घर आये मेहमान का हालचाल पूछते थे।

आज पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते।

समाज बहुत सभ्य हो गया है 



👌 वाह रे आधुनिक और सभ्य समाज👌

रविवार, फ़रवरी 22

ढलती आयु में थकान (अनुदित)


अनुवादक - महेश सोनी 


🧡 ढल रही संध्या के समय‌ आकाश का सौंदर्य अपने शिखर पर होता है।

तो फिर….

हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है…?🧡


🧡 अधूरे सपने पूरे करने की आशा इसी दौर में जगती है तो फिर हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है?


🧡 जिम्मेदारीयों से मुक्त होकर स्वयं से मिलने की प्यास जगती है

तो फिर…….

हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है…….? 🧡


🧡 अंधियारी रात को,

पूनम के चांद की रोशनी कितना रोशन कर रही है।

आयु के इस पड़ाव पर जिंदगी के अनुभवों से समझ का एक एहसास जगता है।

तो फिर……

हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है 


🧡 सुख दुःख दोनों जीवन के सनातन व अकाट्य सत्य है।🧡

उन्हें एक बार एक किनारे पर रखकर जिंदगी को जीकर देखो….

फिर देखिएगा 





🧡 ज़िंदगी कितनी विशेष लगती है।….....!!!

🧡तन का थक जाना नियती है…

मगर,‌ मन से मत थकना 

दोस्त….

फिर देख लेना.....…

ढलती आयु की

 थकान लगती भी है या नहीं..🧡



 

गुरुवार, फ़रवरी 19

बब्बर शेर(अनुदित)

 


अनुवादक - महेश सोनी 

दो नवयुवतियां सूर्योदय के समय मस्तक पर घडे रखकर जंगल की पगदंडी पर चली जा रही थी। कैसा अनुपम सौंदर्य….


पतली पतली उंगलियां, मोती सरीखे दांत, हंस जैसी उज्ज्वल काया, 

शरद पूनम के चंद्र जैसे उजले दांत, तन-बदन में बिजली की गति


अचानक सिंह की दहाड सुनाई दी। जिसे सुनकर एक बेटी कांपने लगी। लेकिन दूसरी मन व चेहरे पर जूं भी न रेंगी। वो दूसरी का बांह पकड़कर बोली “बहन, डरना मत मै इस जंगल के चप्पे-चप्पे से परिचित हूं।

सिंह के बच्चों के साथ खेल कूदकर बडी हुई हूं। सिंह की इस दहाड़ में किसी का शिकार करने की इच्छा नहीं बल्कि वेदना की कसक है।”


उस बेटी की जानकारी सच थी। वे दोनों जब नदी के तट पर पर थी; तब वहां से थोड़ी दूर एक सिंह पानी पीने आया था। उस के आगेवाले दाएं पैर के पंजे में लंबा कांटा घुस गया था। उस की पीडा उसे सता रही थी; इसलिए उस की दहाड़ में वेदना की कसक थी। 

कांप रही बेटी की बांह को छोडकर दूसरी बेटी ने सिंह की ओर बढने लगी। उस की चाल एसी थी जैसे चोटीला पर्वत से मांँ चामुंडा पत्र रही हो; जैसे पावागढ से काली माता या गब्बर से मांँ अंबा अथवा कडी की माँ मेलडी या हिमालय के शिखर से माता वैष्णोदेवी चल रही हो।


बेटी वीर बहादुर बेटी आसन मुद्रा में सिंह के पास बैठ गयी और सिंह के कंधे पर अयाल(गुजराती में जिसे केशवाळी कहते हैं उसे हिन्दी में अयाल कहते हैं) प्रेम से हाथ घुमाया और पूछा 



"वनराज, बहुत पीडा हो रही है। जरा ठहरो, अभी कांटा निकाल देती हूं।" 

इतना कहकर सिंह का एक पैर अपने आगे के पैरों के घुटनों पर रखकर दोनों हाथों से सिंह का पंजा पकड़कर बबूल के कांटे को दो दांतों के बीच फंसाकर मुंह को जोर का झटका दिया। उस झटके से कांटा निकल गया; रक्त की धार बह गयी। उस धार से बेटी का मुंह लाल लाल हो गया। एसा दृश्य बन गया जैसे अभी अभी भगवती काली ने महिषासुर का वध किया हो।


बेटी ने अपनी ओढनी से रक्त सना चेहरा पोंछा। ओढनी को फाडकर सिंह के पंजे के घाव पर पट्टी के रुप में बांध दिया। उस के बाद सिंह को कहा 

"हे नरसिंह! अब आप वहां जा सकते हैं, जहां से आये हैं। अभी उजाला होगा।‌ गांव की बेटियां पानी भरने के लिये आएंगी। आप को देखकर उन सब के हृदय की गति तेज हो जाएगी।" इतना कहने के बाद हौले से वनराज के मस्तक पर प्रेम से हाथ घुमाया। ये सुनकर सिंह एसे उठा जैसे नन्हा बच्चा माता की आज्ञा सुनकर उठता है।

सिंह उठकर छलांग मारकर सामने स्थित चट्टान पर चढ़ गया और दूसरी ओर उतर गया। दो इंसानों ये पूरा दृश्य देखा। जिस एक राजा और दूसरा साधु था। राजा घोडे पर सवार था और संत पैदल था। बगल में पवन पावडी थी। एक हाथ में कमंडल था। 

साधु ने पूछा “राजन क्या देखा?


"गुरुदेव, सब देखा, लड़की कमाल की है।”


“मैं कौन हूं?” गुरु जी ने फिर पूछा।

“आप मेरे गुरुदेव हैं” राजा ने आश्चर्य के साथ उत्तर दिया।



“मेरी आज्ञा का पालन करोगे?”

“गुरुदेव पहले मैं राजपूत हूं फिर राजा। आप की आज्ञा होगी तो मेरे मस्तक को उतार कर आप के चरणों में रखने में किंचित देर न होगी। लेकिन आप एसे प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं” 


“तो महाराज! इस कन्या से विवाह कर लीजिए” अचानक गुरुदेव ने आज्ञा दे दी। राजा को आश्चर्य हुआ। गुरुदेव ने अचानक से आज्ञा क्यों की?

आश्चर्य चकित राजा ने कहा “गुरुदेव! ये कुछ भी नहीं मालूम, वो कौन है, किस जाति की है, कौन से धर्म की है, किस की बेटी है, विवाह कैसे कर लूं?


गुरुदेव ने दृढ आवाज़ में कहा “राजन! गुरु आज्ञा के पासन से बडा धर्म कोई नहीं है। ये मेरी आज्ञा है।”


“गुरुदेव, आप उस लडकी से विवाह करने के लिये इतना दबाव क्यों लगा रहे हैं।‌” राजा ने फिर प्रश्न पूछा।

“राजन! अभी आपने क्या देखा? गुरु जी ने पूछा।


“जो लड़की निर्भय होकर सिंह के पैर से कांटा निकाल सकती है। उस की कोख से जो बेटे जन्म लेंगे। वे भी बब्बर शेर जैसे ही होंगे। इसी कारण से मैं कह रहा हूं; इस लड़की से विवाह कर ले।” गुरुदेव ने फिर दृढ़ता से कहा। 


राजा ने गुरुदेव की आज्ञा मान ली। उस लड़की से विवाह कर लिया। 

ये राजा थे पूना के महाराज शाहजीराव भोंसले और गुरुदेव थे समर्थ रामदास जी। उस बेटी का नाम था जीजाबाई। जिन की कोख से छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था।


धन्य थी वो कोख जिसने शिवाजी जैसे मानव रत्न को जन्म दिया था। जिन की तलवार की नोंक ने हिन्दू धर्म की रक्षा की। 

धन्य है पुत्र शिवा को ये कहने वाली माता


मरना सिंह मैदान में

इस देश की आर्य रमणी रहे इतिहास में 

मूल गुजराती रचना का अनुवाद 

गुजराती रचनाकार - कवि कान


चूडा पहनुं इन का

जिन की अंखियां रक्तिम

चाहे रहूं पर दो पल सुहागिन 

मेरा पूरा जीवन स्वर्णिम 


शिवाजी महाराज की जन्म जयंती पर कोटि कोटि शुभेच्छाएं 

मेघाणी जी ने जिन की लोरी गायी थी


गगन में खिला है चंद्रमा जीजाबाई ने बालक को जन्म दिया 





बुधवार, फ़रवरी 18

चेतना को सब पता है(ग़ज़ल)

चेतना को सब पता है लालसा क्या चीज है 

लोभ लालच चापलूसी फायदा क्या चीज है 


शब्द तो मालूम था पर अर्थ से परिचित न था 

मौत ने उस की बताया फासला क्या चीज है 


ज़िंदगी में तुम चले हो मखमली पथ पर सदा 

“किस तरह समझाऊं तुम को हादसा क्या चीज है” 


याद आता है मुझे वो दौर स्वर्णिम सेठ जब 

जानते थे शिल्प सी कुंदन कला क्या चीज है 


जानते हैं ना कभी भी जान पाएंगे पुरुष 

औरतें ही जानती है मायका क्या चीज है 


पीर तेरी मैं समझ सकता हूं प्यारे क्योंकि ये 

ये व्यथित दिल जानता है जलजला क्या चीज है 


चाव से श्रम से लगन से जोड़कर तिनके “कुमार”

खग युगल ने ये बताया हौसला क्या चीज है  

फाफडा क्या चीज है (ग़ज़ल)

पूछता है विश्व सारा फाफडा क्या चीज है 
दाल-बाटी रसमलाई गांठिया क्या चीज है 

भारतीयों को पता है जायका क्या चीज है 
नान तंदूरी परांठा रायता क्या चीज है 

दाळिया मिर्ची बडा गट्टा मसाला राजमा 
सेव रतलामी जलेबी बाफला क्या चीज है 

हम चटोरे जानते हैं पावभाजी गोंदपाक 
सेव खमणी ढोकळा औ’ पातरा क्या चीज है 

लापसी घेवर समोसा तिल के लड्डू रामरोट
आमरस कतली कचौरी थेपला क्या चीज है 

राब मोहनथाळ थालीपीट कुल्फी राजभोग
दाल-पूरी पापडी औ’ गुलगुला क्या चीज है 

खीर मोतीपाक लस्सी लापसी मोदक “कुमार”
उंधियू पेडा मठीया खाखरा क्या चीज है 

शुक्रवार, फ़रवरी 13

बेटी….

अनुवादक – महेश सोनी 

१.विवाह के समय सब व्यस्त होते हैं। बेटी की मनःस्थिति के बारे में किसी को मालूम नहीं होता।

३.आमंत्रण पत्रिका में अपने नाम के बाद ब्रेकेट में लिखे नाम को देखकर सोचती है। आज आखिरी बार मेरे नाम से बाद पिता का नाम लिखा गया है। आज के बाद न सिर्फ नाम बल्कि पहचान व वातावरण आदि सब \ बदल जाएंगे।

३.कल तक जो जिद कर के भी अपनी बात मनवाती थी। आज वो इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख जाती है।

४.बेटी किसी से कुछ भी कहना नहीं चाहती। ससुराल से पीहर आने पर अपने पुराने गिलास में पहले मटकी में से पानी लेकर पीती है। उसे घर के किसी कोने में अपना बचपन मिल जाता है। वो आज भी पापा की उंगली पकड़कर घूमना चाहती है। झूले में बैठ कर झूला झूलते हुए साउंट सिस्टम पर उंची आवाज में मनपसंद गीत सुनना चाहती है। लेकिन, अब वो बेटी होने के साथ साथ किसी की पत्नी भी है। कर तक जो जिद कर के भी अपनी अपनी इच्छाएं पूरी करवाती थी। वो इच्छाओं को नियंत्रित कर लेती है। वो अब किसी को कुछ कहना नहीं चाहती। 

५. आंसूओ को लीटर या किसी और तरह से नहीं मापा जा सकता है। नन्हीं नन्हीं हथेलियों से पापा को मनाकर फरमाइश करने के दिन गुजरे कल की बात हो जाती है। जितना कठिन बेटी के लिये अपने ही घर में मेहमान बनकर आना होता है। उतना ही कठिन पिता के लिये बेटी को मेहमान के रुप में देखना होता है।

६.बेटा चाहे कितना भी थककर घर आया हो; वो चाहे जितना बड़ा हो जाए पिता ये सोचकर की वो कर फिर से सो जाएगा; आधी रात को भी उसे जगा कर कोई काम सौंप सकता है। लेकिन अगर बेटी सोई होगी तो पिता उसे जगाने की हिम्मत नहीं करता। बेटे की शादी करते समय बाप पुनः जवान हो जाता है। जब की बेटी की शादी के बाद वो उम्र से ज्यादा बूढा हो जाता है।


बेटी की शादी मतलब नदी को नववधू बनाने के पल…!

(फेसबुक मित्र सिम्मी शाह के पटल पर पढा था। स्मृतियों से भंडार में सहेज कर रखा था। आज सामने आया तो अनुवाद कर के पेश कर दिया।)



आयु का खेल

आयु का खेल अनुवादक - महेश सोनी  *“1 ₹ के 6 गोलगप्पे”* से *“30 ₹ के 6 गोलगप्पे होने तक हम बड़े हो गये।  *“मैदान में आजा”* और  *“ऑनलाईन आजा”* ...