अनुवादक - महेश सोनी
दो नवयुवतियां सूर्योदय के समय मस्तक पर घडे रखकर जंगल की पगदंडी पर चली जा रही थी। कैसा अनुपम सौंदर्य….
पतली पतली उंगलियां, मोती सरीखे दांत, हंस जैसी उज्ज्वल काया,
शरद पूनम के चंद्र जैसे उजले दांत, तन-बदन में बिजली की गति
अचानक सिंह की दहाड सुनाई दी। जिसे सुनकर एक बेटी कांपने लगी। लेकिन दूसरी मन व चेहरे पर जूं भी न रेंगी। वो दूसरी का बांह पकड़कर बोली “बहन, डरना मत मै इस जंगल के चप्पे-चप्पे से परिचित हूं।
सिंह के बच्चों के साथ खेल कूदकर बडी हुई हूं। सिंह की इस दहाड़ में किसी का शिकार करने की इच्छा नहीं बल्कि वेदना की कसक है।”
उस बेटी की जानकारी सच थी। वे दोनों जब नदी के तट पर पर थी; तब वहां से थोड़ी दूर एक सिंह पानी पीने आया था। उस के आगेवाले दाएं पैर के पंजे में लंबा कांटा घुस गया था। उस की पीडा उसे सता रही थी; इसलिए उस की दहाड़ में वेदना की कसक थी।
कांप रही बेटी की बांह को छोडकर दूसरी बेटी ने सिंह की ओर बढने लगी। उस की चाल एसी थी जैसे चोटीला पर्वत से मांँ चामुंडा पत्र रही हो; जैसे पावागढ से काली माता या गब्बर से मांँ अंबा अथवा कडी की माँ मेलडी या हिमालय के शिखर से माता वैष्णोदेवी चल रही हो।
बेटी वीर बहादुर बेटी आसन मुद्रा में सिंह के पास बैठ गयी और सिंह के कंधे पर अयाल(गुजराती में जिसे केशवाळी कहते हैं उसे हिन्दी में अयाल कहते हैं) प्रेम से हाथ घुमाया और पूछा
"वनराज, बहुत पीडा हो रही है। जरा ठहरो, अभी कांटा निकाल देती हूं।"
इतना कहकर सिंह का एक पैर अपने आगे के पैरों के घुटनों पर रखकर दोनों हाथों से सिंह का पंजा पकड़कर बबूल के कांटे को दो दांतों के बीच फंसाकर मुंह को जोर का झटका दिया। उस झटके से कांटा निकल गया; रक्त की धार बह गयी। उस धार से बेटी का मुंह लाल लाल हो गया। एसा दृश्य बन गया जैसे अभी अभी भगवती काली ने महिषासुर का वध किया हो।
बेटी ने अपनी ओढनी से रक्त सना चेहरा पोंछा। ओढनी को फाडकर सिंह के पंजे के घाव पर पट्टी के रुप में बांध दिया। उस के बाद सिंह को कहा
"हे नरसिंह! अब आप वहां जा सकते हैं, जहां से आये हैं। अभी उजाला होगा। गांव की बेटियां पानी भरने के लिये आएंगी। आप को देखकर उन सब के हृदय की गति तेज हो जाएगी।" इतना कहने के बाद हौले से वनराज के मस्तक पर प्रेम से हाथ घुमाया। ये सुनकर सिंह एसे उठा जैसे नन्हा बच्चा माता की आज्ञा सुनकर उठता है।
सिंह उठकर छलांग मारकर सामने स्थित चट्टान पर चढ़ गया और दूसरी ओर उतर गया। दो इंसानों ये पूरा दृश्य देखा। जिस एक राजा और दूसरा साधु था। राजा घोडे पर सवार था और संत पैदल था। बगल में पवन पावडी थी। एक हाथ में कमंडल था।
साधु ने पूछा “राजन क्या देखा?
"गुरुदेव, सब देखा, लड़की कमाल की है।”
“मैं कौन हूं?” गुरु जी ने फिर पूछा।
“आप मेरे गुरुदेव हैं” राजा ने आश्चर्य के साथ उत्तर दिया।
“मेरी आज्ञा का पालन करोगे?”
“गुरुदेव पहले मैं राजपूत हूं फिर राजा। आप की आज्ञा होगी तो मेरे मस्तक को उतार कर आप के चरणों में रखने में किंचित देर न होगी। लेकिन आप एसे प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं”
“तो महाराज! इस कन्या से विवाह कर लीजिए” अचानक गुरुदेव ने आज्ञा दे दी। राजा को आश्चर्य हुआ। गुरुदेव ने अचानक से आज्ञा क्यों की?
आश्चर्य चकित राजा ने कहा “गुरुदेव! ये कुछ भी नहीं मालूम, वो कौन है, किस जाति की है, कौन से धर्म की है, किस की बेटी है, विवाह कैसे कर लूं?
गुरुदेव ने दृढ आवाज़ में कहा “राजन! गुरु आज्ञा के पासन से बडा धर्म कोई नहीं है। ये मेरी आज्ञा है।”
“गुरुदेव, आप उस लडकी से विवाह करने के लिये इतना दबाव क्यों लगा रहे हैं।” राजा ने फिर प्रश्न पूछा।
“राजन! अभी आपने क्या देखा? गुरु जी ने पूछा।
“जो लड़की निर्भय होकर सिंह के पैर से कांटा निकाल सकती है। उस की कोख से जो बेटे जन्म लेंगे। वे भी बब्बर शेर जैसे ही होंगे। इसी कारण से मैं कह रहा हूं; इस लड़की से विवाह कर ले।” गुरुदेव ने फिर दृढ़ता से कहा।
राजा ने गुरुदेव की आज्ञा मान ली। उस लड़की से विवाह कर लिया।
ये राजा थे पूना के महाराज शाहजीराव भोंसले और गुरुदेव थे समर्थ रामदास जी। उस बेटी का नाम था जीजाबाई। जिन की कोख से छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था।
धन्य थी वो कोख जिसने शिवाजी जैसे मानव रत्न को जन्म दिया था। जिन की तलवार की नोंक ने हिन्दू धर्म की रक्षा की।
धन्य है पुत्र शिवा को ये कहने वाली माता
मरना सिंह मैदान में
इस देश की आर्य रमणी रहे इतिहास में
मूल गुजराती रचना का अनुवाद
गुजराती रचनाकार - कवि कान
चूडा पहनुं इन का
जिन की अंखियां रक्तिम
चाहे रहूं पर दो पल सुहागिन
मेरा पूरा जीवन स्वर्णिम
शिवाजी महाराज की जन्म जयंती पर कोटि कोटि शुभेच्छाएं
मेघाणी जी ने जिन की लोरी गायी थी
गगन में खिला है चंद्रमा जीजाबाई ने बालक को जन्म दिया
