स्वयं को तुम बदलना सीख लो
नये ढांचो में ढलना सीख लो
यही सब से बड़ा गुण है “कुमार”
समय के साथ चलना सीख लो
कुमार अहमदाबादी
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
स्वयं को तुम बदलना सीख लो
नये ढांचो में ढलना सीख लो
यही सब से बड़ा गुण है “कुमार”
समय के साथ चलना सीख लो
कुमार अहमदाबादी
ना इधर जाएँगे ना उधर जाएँगे
गर चले जो गए तो बिखर जाएँगे
आप की राय स्वीकार करता हूं की
“आप जिंदा कहाँ हैं जो मर जाएँगे”
पात्र नाटक के ये सोचते हैं की क्या
हम कहानी से मिलकर निखर जाएँगे
आज मुझ से कहा है कलम ने की अब
अश्रु ग़ज़लों में ढलकर संवर जाएँगे
आप ये सूचना उन को दे दो की वो
वो जिधर जाएँगे हम उधर जाएँगे
सांप है वे नहीं छोड़ सकते आदत
छोड़ दे आस की वे सुधर जाएँगे
चंद पल जी मिले हैं ख़ुशी के जी ले
पल दो पल में मधुर पल गुजर जाएँगे
आखिरी शेर सुन ले ग़ज़ल का “कुमार”
शब्द वर्ना यहीं पर पसर जाएँगे
2025 में दो ब्लॉक बस्टर फिल्मों को प्रदर्शित हुए पचास वर्ष हो गये। पहली फिल्म शोले और दूसरी जय संतोषी मां थी। शोले एक बड़े बजट की फिल्म थी। जब की जय संतोषी मां बहुत ही कम बजट में बनी थी। शोले लगभग तीन या पांच करोड़ में बनी थी।
जय संतोषी मां मूवी का बजट इतना कम था कि निर्माता ने एकदम नये या कम प्रचलित कलाकारों को लिया था।
इस मूवी का स्तर उस समय की गुजराती फिल्मों जैसा था। लेकिन फिल्म जबरदस्त सुपर हीट ब्लॉक बस्टर साबित हुई। एसी ब्लॉक बस्टर की कुछ विदेशी मूवी रिसर्चरों ने भी इस पर डॉक्यूमेंट्री बनाई।
मूवी लगभग पचीस से तीस लाख में बनी थी। मूवी ने भारत में पांच से आठ करोड व वर्ल्ड वाइड आठ से दस करोड की कमाई की थी।
उस समय जन मानस पर संतोषी माता का एसा प्रभाव था। लोग गांवों से बैलगाड़ियां भर-भर कर मूवी देखने जाते थे। जूते चप्पलों को ऑडिटोरियम (जहां बैठने की कुर्सियां होती है) के बाहर खोलकर जाते थे। कई स्त्रियां पूजा की थालीयां लेकर जाती थी। जब परदे पर पहली बार संतोषी माता दिखाई देती थी। तब स्त्रियां आरती उतारती थी। कई स्त्रियां एसे चौधार आंसुओं से रोती थी। जैसे साक्षात संतोषी माता के दर्शन कर रही हों। संतोषी माता का पात्र निभानेवाली अनिता गुहा के बंगले के सामने रोज भीड इकट्ठी होती थी।
एक रौचक बात सुनिये,
जय संतोषी मां के गीत कवि प्रदीप ने लिखे थे। जब की उन्होंने पहले कभी संतोषी मां का नाम भी नहीं सुना था। इस का कारण है। संतोषी माता का उल्लेख भारतीय पुराणों या शास्त्रों में कहीं नहीं है।
इस घटना को फिल्म के अंत में एक संवाद द्वारा बताया गया है।
कोर जिस की फट गयी
उस की कीमत घट गयी
थी बहुत काली मगर
रात आखिर कट गयी
विघ्न क्यों बनती मैं सो
रास्ते से हट गयी
साथ देने के लिये
मोरचे पर डट गयी
मैं गयी ना साथ पर
साथ मेरी लट गयी
आज तक पूछा नहीं
बात से क्यों नट गयी
जब पटाया प्रेम से
मुस्कुराकर पट गयी
देखते ही देखते
चंद सांसे घट गयी
छोड दे आलस “कुमार”
जाग जा पौ फट गयी
कुमार अहमदाबादी
आज नवरात्रि उत्सव का चौथा दिन है। आज सुबह सुबह माताजी की कृपा से एक गरबा लिखा है। आप सब की सामने पेश कर रहा हूं।
गरबा
कुमार अहमदाबादी
सूरज के आंगन में गरबा खेलें
चंदा के आंगन में रास…..
तारे खेलेंगे सितारे खेलेंगे
धरती खेलेगी नक्षत्र खेलेंगे
चंदा के आंगन में रास…..
शहर खेलेंगे गांव खेलेंगे
गलियां खेलेंगी चौपाल खेलेंगे
चंदा के आंगन में रास…..
भारत खेलेगा दुनिया खेलेगी
ंदुनिया के साथ भारत खेलेगा
चंदा के आंगन में रास….
સૂરજના આંગણે ગરબે રમીએ
ચાંદાને આંગણે રાસ
તારા રમશે નક્ષત્રો રમશે
ધરતી રમશે મંગળ રમશે
ચાંદાને આંગણે રાસ…સૂરજ રમશે
શહેરો રમશે ગામડાં રમશે
પોળો રમશે પાદર રમશે
ચાંદાને આંગણે રાસ…સૂરજ રમશે
ભારત રમશે દુનિયા રમશે
ભારતની સાથે દુનિયા રમશે
ચાંદાને આંગણે રાસ…સૂરજ રમશે
અભણ અમદાવાદી
ये गीत
क्या करते थे साजना तुम हम से दूर रहकर
१९८९ में बनी लाल दुपट्टा मलमल का
मूवी का है।
ये गीत तब भी सुपर हीट था व आज भी सुपर हीट है। गीत को मजरुह सुलतानपुरी ने लिखा है। इसे आनंद मिलिंद ने स्वरबद्ध किया है।
इस गीत के शब्दों में प्रश्न, विरह की व्यथा, परमात्मा से प्रार्थना, मजबूरी, तड़प सब कुछ है। इस सब भावों को संगीतकार आनंद मिलिंद ने कहरवा ताल में ढालकर यादगार सृजन किया है,
शब्दों का एक उदाहरण देखिए,
माना जुदाई का मौसम बुरा था
उस का भी लेकिन अपना मज़ा था
थोडा तड़पना थोडा सिसकना
सच पूछिए तो अच्छा लगा था
क्या चीज है ये प्यार भी
सुख में हंसी दुख में हंसी
ना पूछो के क्या करते थे
तुम को ही मांगा करते थे
स्वयं को तुम बदलना सीख लो नये ढांचो में ढलना सीख लो यही सब से बड़ा गुण है “कुमार” समय के साथ चलना सीख लो कुमार अहमदाबादी