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गुरुवार, फ़रवरी 12

सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

 सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

(अनूदित)

अनुवादक - महेश सोनी 


ये लेख विशेष रुप से उन के लिये है। जिन का जन्म 1960,1961,1963,1964,1965,1966,1967,1968,1969,1970,

1971,1972,1973,1974,1975,1976,1977,1978,1979,1980 में हुआ है। 

ये पीढ़ी 45 की आयु से आगे बढ़कर अब 65-70 यानि आयु के सातवें व आठवें दशक की ओर बढ़ कही है। 


इस पीढ़ी की सब से बड़ी सफलता ये है। इसने जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन देखे हैं;अपनाये भी हैं।


1,2,3,,4,5,10,20,25,50 पैसे के सिक्कों को वित्तीय व्यवहार में देखने वाली ये पीढ़ी बिना हिचकिचाहट मेहमानों से पैसे ले लेती थी।


स्याही, कलम, पेन्सिल, पेन से शुरुआत करने वाली पीढ़ी आज लेपटॉप, कम्प्यूटर का उपयोग भी कुशलता से कर रही है।


जिस पीढ़ी के लिये बचपन में सायकल चलाना भी एक वैभव था। वो पीढ़ी आज स्कूटर, मोटर सायकल,और कार चला रही है।

अच्छे संस्कारों से सिंचित इस पीढ़ी ने कभी चंचल तो कभी गंभीर रहकर बहुत कुछ  ग्रहण किया है, बहुत कुछ भोगा भी है। 


वो भी समय था। जब टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांज़िस्टर अच्छी रइसी के प्रतिक थे।


ये आखिरी पीढ़ी है। जिन का बचपन और गुण पत्रक(मार्क शीट) टेलीविजन के आगमन से बिगडा नहीं।


इस पीढ़ी ने कुकर की रींग्स और पुराने टायर को वाहन समझकर खेलने में कभी शर्मिंदगी का अनुभव नहीं किया।


तीखी नोक वाली लोहे की छोटी सी छडी को जमीन में घोंप कर खेलना भी एक मजेदार खेल था।

 

जिन के लिये “कच्चे आम को तोडना” चोरी नहीं थी।

कोई भी व्यक्ति किसी भी समय किसी के घर के दरवाजे की कुंडी खडका सकता था। उस से किसी को कोई समस्या नहीं होती थी। एसा करना ग़लत भी नहीं माना जाता था।


ये कहने में “मित्र की मम्मी ने खाना खिला दिया” कतई उपकार का भाव नहीं होता था; “उस के पापा ने डांटा” कहने में शिकायती लहजा नहीं होता था। 

कक्षा या पाठशाला में अपनी बहन के साथ मजाक करते हुए सीधा सरल बोलने वाली पीढ़ी।


मित्र अगर दो दिन पाठशाला ना आये तो पाठशाला से छुट्टी होते ही बस्ता लेकर उस के घर पहुंच जाने वाली पीढ़ी।


किसी मित्र से पिता पाठशाला में आ जाए तो –

मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौडते हुए जाकर उसे सूचना देना की

“तेरे पापा आ गये हैं जल्दी चल”

ये उस समय ब्रेकिंग न्यूज़ भी होती थी।


जब मोहल्ले के किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तब अपना काम समझकर आमंत्रण के बिना काम करनेवाली पीढ़ी।


कपिल देव, सुनील गावस्कर, वेंकट राघवन, इरापल्ली प्रसन्ना, स्टेफी ग्राफ और पीट सेम्प्रास, भूपति अगासी के खेल को देखकर आनंदित होनेवाली पीढ़ी।


राज कपूर, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, जितेन्द्र, अमिताभ बच्चन, आमिर, सलमान,शाहरुख, माधुरी दीक्षित इन सब पर फिदा होने वाली पीढ़ी।


पैसे इकट्ठे कर के भाडे पर VCR लाकर एक साथ चार पांच फिल्में देखने वाली पीढ़ी।


असरानी, संजीव कुमार के विनोद पर खिलखिलाकर हंसने वाली,

नाना, ओम पुरी,‌ शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गु दादा, माधुरी, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी 


“शिक्षक से मार खाने” में कुछ भी ग़लत नहीं था। डर इस बात का लगता था कि घर में किसी को मालूम न हो जाए; वर्ना घर में भी जूते पडेंगे।


शिक्षक के सामने आवाज़ व नजर नीची रखने वाली पीढ़ी।


जितनी भी मार खाई हो; दशहरा पर उसे जलाने वाली वाली पीढ़ी; उस समय पढाने वाले शिक्षक व अब सेवा निवृत शिक्षक कहीं मिल जाए तो निःसंकोच नमन करने वाली पीढ़ी।


कॉलेज में छुट्टी ना हो तो यादों में सपने देखने वाली पीढ़ी…..


ना मोबाइल, ना SMS ना What's App

सिर्फ रुबरु मिलने को तत्पर पीढ़ी।


पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुडाया“ सुनकर आंखें नम करने वाली पीढ़ी।


दिपावली के पांचो दिनों का महत्व व कहानी जानने वाली पीढ़ी।


 लिव इन तो दूर, लव मैरिज को भी बहुत बडा साहसिक कदम मानने वाली पीढ़ी।

पाठशाला - कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लडकों को “हिम्मतवाला” मानने वाली पीढ़ी।


आज आंख बंद कर के……

वही दस, बीस….अस्सी, नब्बे….वही सुनहरी स्मृतियां 

उभर आती है।


बीता कल वापस नहीं आता, लेकिन स्मृतियां हमेशा साथ रहती है।

वो नासमझ पीढ़ी इतनी समझदार थी–

वो जानती थी आज के पल कल स्वर्णिम स्मृतियां बनेंगे।


हमारा भी एक जमाना था…..

तब प्ले स्कूल वगैरह कुछ नहीं था।

6-7 वर्ष के होने पर सीधे पाठशाला में दाखिला होता था।

हम पाठशाला ना जाएं तो भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

सायकल या सीटी बस से आवागमन करते थे।

माता पिता को ये डर नहीं सताता था। बच्चे को अकेला भेजेंगे तो कोई अनहोनी हो जाएगी।


उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण सब चलता था।

परसेन्टज (%) से कोई सीधा लगाव नहीं था।


ट्युशन जाना शरम की बात मानी जाती थी। ट्युशन जाने वाले को “डिब्बा” माना जाता था।

हम किताबों में कापियो में मोर पंख रखते। हम सोचते थे; बल्कि दृढ विश्वास था: एसा करने से हम तेजस्वी विद्यार्थी हो जाएंगे।

कपड़े की थेली में किताबों को रखना।

टीन की पेटी में किताबों को करीने से जमाना हमारी सृजनात्मक सूझ बूझ थी।


हर वर्ष नयी कक्षा में किताबों व कापियों पर खाखी या पुराने अखबार का जिल्द चढाना हमारे लिये वार्षिक उत्सव सा होता था

वर्ष पूरा होने पर पुरानी किताबें बेचनी और नयी जो की वैसे तो पुरानी(यू नो, सेकंड हेन्ड) किताबें खरीदने में हमने कभी भी ग्लानि का अनुभव नहीं किया। 

मित्र की साइकिल के डंडे पर एक और दूसरे को कैरियर पर बैठकर घूमने में क्या लुत्फ आता था। उसे हमारी पीढ़ी ही जानती है। 


पाठशाला में मास्टर जी से मार खाना,

पैर के अंगूठे को पकड़कर खड़ा रहना,

कान खिंच कर लाल हो जाने पर भी कभी भी हमारा ‘इगो” हर्ट नहीं होता था।


दरअसल यह हमें मालूम ही नहीं था। इगो किस चिड़िया का नाम है।

मार खाना तो रोजमर्रा की घटना थी।

मार खाने वाला और मारने वाला दोनों खुश हो जाते थे।

मार खाने वाला इसलिये खुश होता था की “आज कल से कम मार पडा है”  जब की मारने वाला इसलिये खुश होता था की “आज फिर हाथ साफ करने का अवसर प्राप्त हो गया।”

लकड़ी का बैट लेकर नंगे पैर किसी भी गेंद से गलियों में क्रिकेट खेलना सब से बडा सुख था, आनंद था।


हमने कभी भी पॉकेट मनी नहीं मांगी थी; ना ही माता पिता ने कभी दी थी।

हमारी जरुरतें बहुत सीमित थी।

जिसे परिवार पूरा कर देता था।


छह सात महीने में एक बार अगर कुछ चटपटा या नमकीन खाने को मिल जाता तो-

हमारी खुशी छलकने लगती थी।


दिपावली के दिन रंगबिरंगी फूलझडियां जलाकर हमे जो आनंद मिलता था। वो अवर्णनीय है।

नन्हें नन्हें बमों के गुच्छे से एक एक बन के अलग करने के बाद उन्हें एक के बाद एक जलाने में जो सुख मिलता था। उस के बारे में क्या लिखूं! वो मौज अदभुत थी। 


हमने कभी अपने माता-पिता से ये नहीं कहा कि “हम आप से बहुत प्रेम करते हैं”–

क्यों कि हमने कभी “I Love You” कहना या बोलना सीखा ही नहीं।



संघर्ष करते करते आज हम दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं।

कुछ लोगों ने वो प्राप्त कर लिया है। जिसे वे प्राप्त करना चाहते थे।

कुछ आज भी संघर्ष कर रहे हैं– “क्या मालूम….”


पाठशाला के बाहर छत्ते वाले के ठेले पर मित्रों की मेहरबानी से जो मिलता था–

वो कहां खो गया?


हम विश्व के किसी भी कोने में हों,

लेकिन सत्य ये है कि–

हम वास्तविक जीवन जीकर बड़े हुए हैं।

हमने हमेशा यही सोचा है

“वस्त्रों में व संबंधों में कभी भी सिलवट नहीं रहनी चाहिये”


“संबंधों में औपचारिकता रहनी चाहिये” 


जो हमें कभी नहीं आया। 


हमें मालूम ही नहीं था कि सब्जी रोटी बिना भी नाश्ते का डिब्बा हो सकता है।


हमने कभी भी हमारे नसीब को दोष नहीं दिया। 

हम आज भी सपने में जी सकते हैं।

शायद वो सपने ही हमें जीवन के लिये उर्जा प्रदान करते हैं।

हमारे जीवन की वर्तमान के साथ तुलना हो ही नहीं सकती।


हम अच्छे हैं या खराब–

लेकिन हमारा भी एक जमाना था।

रविवार, फ़रवरी 8

रूप को छेड़ना मत (मुक्तक)


अनुदित 


मूर्ख मन रूप को छेड़ना मत कभी 

 ज्योत है शांत है फिर भी वो आग है

भस्म कर देगी ज्वाला बनी वो अगर 

उस के मन में धधकता अनुराग है

कुमार अहमदाबादी

 

शनिवार, फ़रवरी 7

वरिष्ठ नागरिकों के लिये

 

वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
(अनुदित - अनुवादक - महेश सोनी)

किस में कटौती करें?
१.नमक
२.चीनी
३.सफेद मैदा
४.डेयरी के उत्पाद 
५.प्रोसेस किया गया भोजन
६.वाद विवाद
७.टोका टाकी

क्या खाना चाहिये?
१.सब्जियां
२.दाल सब्जी
३.मूंगफली
४.सूखे मेवे
५.शीतल प्रकृति के तेल (ओलिव, नारियल का तेल)
६.फल
७.किसी के कटु वचन
८.दु:खों को कटक जाना चाहिये


इन तीन बातों को भूलने का प्रयास करना चाहिये

१.आप की आयु

२.आप का भूतकाल
३.आप की शिकायतें
४.रिश्तेदारों द्वारा खडी की गयी अड़चनें       

इन तीनों को सहेज कर रखो
१.आप का परिवार
२.आप के मित्र
३.आप के सकारात्मक विचार
४.स्वच्छ एवं हंसता खेलता घर
५.संभवित कठिन समय के लिये अच्छा खासा धन संभालकर रखना

इन को अपनाइये

१.हमेशा मुस्कान होनी चाहिये
२.कसरत की आदत डाल लेनी चाहिये
३.शारीरिर वजन को नियंत्रित रखिये
४.वाणी में मीठास होनी चाहिये; ना हो तो अपनाइये
५.अन्यों के बातों को सुनने की आदत को विकसित कीजिए

जीवन जीने के इन तरीको का अनुसरण कीजिए  
१.प्यास लगने पर ही पानी पीजिए
२.जब थकें तब नहीं। नियमित रुप से आराम कीजिए
३.बीमार होने पर नहीं; नियमित रुप से जांच करवाइये
४.चमत्कार की प्रतीक्षा मत कीजिये
५.अपने आप पर विश्वास रखिये
६.हमेशा सकारात्मक रहिये। उज्ज्वल भविष्य का ही विचार कीजिए
७.लगातार एक ही स्थान पर बैठे ना रहें
४७ से ९० की आयु के कोई व्यक्ति अगर आप के मित्र हैं? तो ये संदेश उन्हें अवश्य भेजियेगा

वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
हैपी सिनियर सिटीजन वीक

                   🌹
"सब को स्वस्थ, मंगलमय और मौज मस्ती से भरपूर जीवन की शुभकामनाएं" 
                    🙏

बुधवार, फ़रवरी 4

बेटी क्या है? और क्या नहीं?

 

बेटी क्या है? और क्या नहीं?🌹


🌞 सूरज के घर बेटी होती व उसे विदा करने की घडी आयी होती तो सूर्य को पता चलता की अंधकार किसे कहा जाता है ?……

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✍ “बेटी” क्या होती है?"

🌹““बे”” - 👉 हृदय के साथ जुडी अटूट सांस…….

🌹““टि”” - 👉 कस्तूरी के समान हमेशा सुगंधित 

🌹 ""यां"" - 👉 रिद्धि - सिद्धि लानेवाली एवं परिवार को रोशन करने वाली एक परी….🖌🌹❣


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🌹 किसी भी परिवार में पिता को भोजन कराने का अधिकार 

सिर्फ और सिर्फ एक बेटी के पास होता है।

🌹 प्रत्येक बेटी सब से ज्यादा प्रेम अपने पिता से करती है।

🌹 बेटी जानती है। समग्र विश्व में यही एक एसा पुरुष है। जो कभी उसे दुःखी नहीं करेगा।


🌹बेटी दाम्पत्य का दीपक

एक बार एक चर्चा के दौरान एक मित्र ने कहा 


🌹“मैं मेरी पत्नी से ज्यादा प्रेम मेरी बेटी से करता हूं।


🌹आज भी जब भी मैं अस्वस्थ होता हूं तब ससुराल से तुरंत दौडी चली आती है। उस को देखते ही मैं मेरे सारे दुःख भूल जाता हूं।

🌹मुझे लगता है। शायद इसी वजह से उस की बिदाई के पलों में माता से ज्यादा दुःख पिता को होता है।

 🌹 क्यों कि माता रो सकती है, पिता आसानी से रो नहीं सकता।

बेटी के बीस बाईस की होने तक माता पिता को उस के प्रेम की लय लग जाती है। 

🌹 बेटी कभी माँ बन जाती है तो कभी दादी बन जाती है। कभी मित्र बन जाती है।


🌹सुख के समय बेटी पिता की मुस्कान बन जाती है और 

🌹 दुःख के समय में पिता के आंसू पोंछने वाली हथेली बन जाती है।

देखते ही देखते बेटी बडी हो जाती है। एक दिन लाल जोडे में नववधू बनकर विदा हो जाती है। 


🌹 जाते समय वो पिता के सीने से लगकर सजल नेत्रों से कहती है।

🌹 पापा, मैं जा रही हूं…. आप मेरी तनिक भी चिंता मत करियेगा।

समय समय पर अपनी दवाइयां लेना मत भूलना।



🌹 उस पल पिता द्वारा आंसूओं को रोकने से अनेक प्रयासों के बावजूद वे की सरहद लांघकर गंगा की तरह बह निकलते हैं। 

🌹 कवि कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतल में कण्व ऋषि शकुंतला को विदा करते हुए कहते हैं,

🌹🌹मेरे जैसे संसार का त्याग कर के वनवासी बने व्यक्ति को अगर पुत्री की बिदाई इतनी पीडा दे सकती है तो संसारी व्यक्तिओं की पीडा कितनी गहन होगी?


🌹 मैं एक बार एक शादी में गया था। मित्र की पुत्री की शादी थी।

बेटी को विदा करने के पश्चात वो एकदम पस्त होकर बैठे उस मित्र ने 

कहा था : - : 


🌹 आज तक मैंने कभी परमात्मा के सामने प्रार्थना नहीं की है। लेकिन आज मन कर रहा है - हर बेटी के बाप को परमात्मा से ये प्रार्थना करनी ही चाहिये- 

🙏👏 हे परमात्मा, आप संसार के सारे पुरुषों को बहुत समझदार व विवेकशील बनाना; क्यों कि उन्हीं में से कोई एक मेरी पुत्री का पति बनने वाला है।


🌹 संसार की सारी स्त्रियों को ममतामयी बनाना। उन्हीं में से कोई मेरी बेटी की सास या ननद बनने वाली है।


🌹 भगवान, तुम्हें अगर पूरी सृष्टि का पुनः निर्माण करना पडे तो मेरी बेटी के भाग्य में सुख ही सुख लिखना। दुःख नाम का कहीं उल्लेख मत करना।


🌹 कुछ समय पहले ही सेवा निवृत्त हुए एक आचार्य ने एक बात कही थी:

🌹अगर आप के घर में बेटी ना हो तो पिता पुत्री के संबंध की गहराई को आप कभी जान नहीं पाएंगे। 


 🌹आप सिर्फ इतना सा करना।


🌹चाहे जैसी परिस्थितियां हो, चाहे जितने आपसी मनमुटाव हो। लेकिन 


पुत्रवधू को


उस के पिता के बारे में कभी किसी भी प्रकार के कटु वचन मत सुनाना।

अनुवादक - महेश सोनी 


🌹 बेटी भगवान के बारे में कटु वचन सुन सकती है लेकिन अपने पिता के विरुद्ध एक अक्षर नहीं सुन सकती।

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❤️ अगर आप को ये लेख अच्छा लगे तो इसे बे

टी के माता पिता, सास ससुर, भाई बहन को अवश्य भेजना।

🌹🌹🌹🌹🌹

मंगलवार, फ़रवरी 3

चार साथी एक बोतल चाहिये (ग़ज़ल)


चार साथी एक बोतल चाहिये 

प्लेट में काजू तथा जल चाहिये 


ज़िंदगी में रंग भरने के लिये 

श्रीमती थोड़ी सी चंचल चाहिये 


उच्च स्तर की जब ग़ज़ल लिखनी हो तब

शांत मन में भाव कोमल चाहिये 


क्या गज़ब की सोच है मैं क्या कहूं 

कोशिशों के बिन तुझे हल चाहिये 


जानते हो नृत्य करने के लिये 

हो कहीं भी मंच समतल चाहिये 


चाहिये ना और कुछ तुम से “कुमार”

प्रेम से परिपूर्ण संबल चाहिये 


कुमार अहमदाबादी  

शनिवार, जनवरी 31

छाछ मांगने में लोटा खोया

 हिन्दी में एक कहावत छाछ मांगने गयी थी लेकिन लोटा खोकर आयी है


सब को नहीं मालूम की तजाकिस्तान में भारत का एयरबेस(हवाई थाना) है। भारत उस के लिये काफी बडी रकम चुकाता है। 


मगर अब तजाकिस्तान में वो एयरबेस नहीं है। 

पाकिस्तान उस एयरबेस से बहुत परेशान रहता था। भारत के लडाकू फाइटर हवाई जहाज लगातार उस के सिर पर सवार से रहते थे।

पाकिस्तान ने तजाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिये तुर्की और कतर का संपर्क किया। उन के कहा वे भारत के एयरबेस बंद करवाये। 

तजाकिस्तान ने उन के पर भारत पर दबाव बनाया। 


पाकिस्तान खुश था क्यों कि अब लहंगा फाड़ना बाकी रहा था। 


जैसे ही तालिबान को इस मामले का पता चला। उन्होंने अपना बगराम एयरबेस भारत को देने का प्रस्ताव रखा। भारत ने प्रस्ताव पर तुरंत स्वीकृति की मोहर लगा दी। यहां पाकिस्तान के लिये वो कहावत *लेने गयी पूत खो आई खसम* (बेटा पैदा करने के चक्कर में पति को खो दिया) सटीक बैठती है। अब भारत तजाकिस्तान के एयर बेज से सारे साजो सामान बगराम में ले जा रहा है।  

"बानरा" ने स्वयं बगराम एयरबेस पर कब्जा करने का प्रयास किया होने के कारण उसे मालूम था। पाकिस्तानी सुअरों ने उस में दखल दी है। उन को फंसाकर अपना खेल बिगाड़ने के बाद उसने इन सुअरों को फिर से FATF की ग्रे सूचि में डाल दिया है; और अब वो विश्व बैंक द्वारा मिलने वाली लोन की किस्त भी को भी अटका देगा। 


इस सब के दरमियान भारत के जो लडाकू जहाज तजाकिस्तान से हट गये थे। वे अब बगराम में जैसे एकदम उन की छाती पर तैनात है।


एक दूसरी बात: "एसे समाचार हैं कि बगराम के बदले में भारत अफगानिस्तान सात एसे नोन रिफंडेबल प्रोजेक्ट में धन की आपूर्ति करेगा। एसा सुनने में आया है कि उन प्रोजेक्ट्स में एक प्रोजेक्ट एक एसी नदी उश पर बांध बांधने का है। जिस का लगभग पूरा पानी बहकर पाकिस्तान में जाता है। 


अब मुझे बताइये मुनीर और शाहबाज का लहंगा फटा है या नहीं फटा? 🤷🏻‍♂️

अद्वितीय रामभद्राचार्य (अनुदित)

दुनिया उन को अंधा कहती है

अभी माघ मेले में दो करोड़ की कार में घूमने वाले बकरा कट दाढ़ीवाले शंकराचार्य ने पूज्य रामभद्राचार्य के बारे में अभद्र टिप्पणी की है। इस नालायक को सपा+खांग्रेस(मुस्लिम लीग) ने 2027 के चुनावों के लिए किराए पर रखा है। (सुप्रीम कोर्ट का अभ्यास करना))📚 


मगर सत्य ये की उन्होंने जो देखा है उसे आंखों वाले भी नहीं देख सकते।

आज वे 75 वर्ष के है

जन्म से अंध

लेकिन उन के ज्ञान के सूर्य की रोशनी अद्वितीय है।

उन का नाम है—

जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य


बचपन से ही उन का जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं रहा है


पाठशाला में किसी भी कक्षा में 99 प्रतिशत से कम गुण नहीं आये


दुनिया उन को अंध कहती थी। लेकिन‌ वे शास्त्रों से रोशनी प्राप्त करते रहे।

 

230 से ज्यादा किताबें


संस्कृत, वेद, रामायण, दर्शन शास्त्र, व्याकरण प्रत्येक क्षेत्र में हस्ताक्षर किये।


कई युनिवर्सिटीयों ने उन्हें महामहोपाध्याय एवं जगद्गुरु की पदवीयां प्रदान की।

परंतु इतिहास उन्हें श्री राम जन्मभूमि केस के लिये याद रखेगा।


जब एक संत अदालत में खडे थे।


इलाहाबाद हाईकोर्ट


तीन सौ वकीलों से भरी हुई अदालत


दलीलें, कोलाहल, राजनीति और अविश्वास से भरा हुआ वातावरण


और बीच मे खडे -


एक अंध संत


उन्हें पूछा गया “क्या रामचरितमानस में राम के जन्म स्थान का कोई उल्लेख है?


उन्होंने एक भी पल हिचकिचाए बिना तुलसीदास जी का दोहा पढा।

*तुरंत दूसरा आक्रमण हुआ-*

“क्या वेदों में कोई साक्ष्य है। जो ये सिद्ध कर की श्री राम का जन्म यहां हुआ था”


इस बार उत्तर और भी गहन था।


उन्होंने कहा, “अथर्व वेद, दसवें अध्याय के इकत्तीसवें मंत्र में स्पष्ट रुप से उल्लेख है”


अदालत स्तब्ध हो गयी

उस के बाद न्यायाधीशों की बेंच में से-

जिस में एक मुस्लिम न्यायाधीश भी थे - का वो ऐतिहासिक निवेदन आया।


साहब, आप एक दिव्य आत्मा हो


सुबूत के 441 टुकड़े


अदालत ने उन में से 437 को मान्य रखा


कल्पना कीजिए–


दुनिया जिसे अंध कहती है।


वो भारत के सब से ज्यादा विवादास्पद इतिहास को सुबूतों को साथ देख रहे थे



एक बार जाने कौन से राजनीतिक लाभ के लिये ये कदम भी उठाया गया था


जब एक राजनीतिक सौगंध पत्र में कहा गया कि,


“राम का जन्म हुआ ही नहीं था”


तब ये संत ने मुंह पर ताला लगा लिया था


उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखा—और सिर्फ एक वाक्य ने सब को मौन कर दिया था।


“आप के गुरु ग्रंथ साहिब में,


राम नाम का 5600 बार उल्लेख हुआ है।


ये तर्क नहीं था


ये सांस्कृतिक स्मृति थी


क्या वे सचमुच अंध हैं?


प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने एक बार उन से कहा था “मैं आप के उपचार और दर्शन की व्यवस्था कर सकती हूं।


संत ने हंसकर कहा था “मैं इस दुनिया को नहीं देखना चाहता”


एक बार उन्होंने कहा था “मैं अंध नहीं हूं”


मैंने अंध होने का कभी भी लाभ नहीं लिया है


मैं भगवान श्री राम को बहुत नजदीक से देखता हूं


उसी क्षण उन के मन में एक बात घर कर गयी


आंखों से देखना और दर्शन करना दो अलग अलग घटनाएं हैं


सनातन की जीती जागती मशाल


एसे संत शास्त्रों में नहीं, वास्तव में और ऐतिहासिक काल में जन्म लेते हैं। इन का अस्तित्व चमत्कार करने के लिये नहीं; बल्कि सभ्यता को दर्पन दिखाने के लिये होता है।

आज अगर सनातन संस्कृति सांस ले रही है, जीवंत है तो एसे मौन तपस्वीओं के कारण सांस ले रही है, जीवंत है।

उन्हें अंध कहना हमारे अंधत्व को दर्शाता है।

एसे संतों को वंदन

एसी चेतना को वंदन


जय श्री राम 🚩🙏

अनुवादक - कुमार अहमदाबादी 

सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

 सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी (अनूदित) अनुवादक - महेश सोनी  ये लेख विशेष रुप से उन के लिये है। जिन का जन्म 1960,1961,1963,1964,1965,1966,19...