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शुक्रवार, नवंबर 1

मन गाये (भजन)

 
झूम झूम के मन ये गाये
मात् के चरणोँ में शीश झुकाये
शरण में ले ले चाहे मेरी
बिगड़ी बनाये या न बनाये..झूम

शरण में तेरी आया हूँ मैं
सबकुछ पीछे छोड़कर माँ
क्या था मेरा जो लाता मैं
आया हूँ मैं खुद को तुम से जोड़कर माँ..झूम

क्या बतलाउँ क्या पाऊँगा
सब कुछ पाकर खोना है
जीवन ये यूँ जीना है कि
हँसना है पलपल इक पल भी न रोना है..झूम
कुमार अहमदाबादी

संस्कार सिंचन

  बच्चों में संस्कारोँ का सिंचन आवणारी पेढ़ीओ लणती रहे सदविचारो जो तमे वावी सको सुरेश विराणी कवि कि सुरेश विराणी कि उपरोक्त पंक्तियाँ गहन अर्...