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शनिवार, फ़रवरी 5

वेदना के आंसू

आज इस पल इस घडी

स्टूडियो सिसक रहा है

सितार चौधार आंसू बहा रही है

तबले के आंसू सूख गये हैं

वायोलिन को होश में लाने के प्रयास स कौन करे?

ढोलक गुमसुम है 

वीणा स्तब्ध है, पखवाज सदमे में है

माइक मौन साधे खडा है

हां, 

इन सब की आंखों में जो

अपने परिवार के सदस्य से बिछडने की वेदना है

वो भी अपने आप को भावुक होने से रोकने में असमर्थ है

कुमार अहमदाबादी

सवायी बेटी

अपने कक्ष में देवी सरस्वती गुमसुम और उदास बैठी है। सितार को उन्होंने एक तरफ संभालकर रख दिया है। बहुत मुश्किल से अपने आसुओं को रोक रही है। एसे में नारायण नारायण का उच्चारण करते हुये नारदमुनि प्रवेश करते हैं। देवी सरस्वती नारद मुनि को मौन होने के लिये कहती है,

देवी सरस्वती - नारद जी, आइये, आप को एक कार्य करना है। स्वागत की तैयारी करनी है।

नारद जी - किस के स्वागत की तैयारी करनी है माते?

देवी सरस्वती - आज मेरी पुत्री पृथ्वी पर सरगम का अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण कर के वापस लौट रही है। जाओ उस के स्वागत की तैयारी करो। 

नारद जी - आप की आज्ञा का पूर्णतः पालन होगा माते। 

नारद जी स्वागत की तैयारी करने लगते हैं। 


कुछ पल बाद का दृश्य 

माता सरस्वती और पुत्री लता मंगेशकर गले मिली हुयी है। दोनों की आंखों से गंगा जमना बह रही है। 

माता सरस्वती- बेटी, मैं क्या कहूँ, मुझ से तूने जो पाया था, जितना पाया था। उस का कयी गुना तू पृथ्वीवासियों को देकर आयी है। मुझे ही नहीं विश्व की सारी माताओं को इस सत्य पर गर्व होगा की बेटियां भी परिवार का नाम रोशन करती है। 

कुमार अहमदाबादी

शुक्रवार, फ़रवरी 4

हनुमान चालीसा की रचना

(अनुवादक - महेश सोनी)

हनुमान चालीसा की रचना कैसे व कब हुयी?

हनुमान चालीसा की रचना कैसे हुयी?

ये कहानी नही सत्यघटना है। ये बहुत कम लोगों को ये मालूम है।


हनुमान चालीसा गाकर सब पवनपुत्र हनुमान जी की आराधना करते हैं। लेकिन इस को रचना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। 


तुलसीदास जी के जीवन में घटना है। उस समय यानि इ.स. 1600 की घटना है। 

एक बार तुलसीदासजी मथुरा जा रहे थे। रात घिरने लगी थी। उन्होंने उस दिन आग्रा में ठहरने का निर्णय किया। जैसे जैसे लोगों को मालूम होने लगा की तुलसीदासजी मथुरा पधारे हैं। लोगों के समूह के समूह उन के दर्शन करने के लिये आने लगे। 


अकबर को इस घटना का पता चलने पर उसने बीरबल को पूछा 'ये तुलसीदासजी कौन है?' बीरबल ने कहा 'वे रामभक्त हैं। उन्होंने रामचरितमानस की रचना की है। मैं भी उन के दर्शन कर के आया हूँ। तब अकबर ने भी उन के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की। अकबर ने सिपाहियों की टुकडी भेजी। उस के कप्तान ने वहां जाकर तुलसीदासजी को बादशाह का लाल किले में हाजिर होने का फरमान सुनाया। तुलसीदासजी ने कहा 'मैं रामभक्त हूँ। मुझे बादशाह या लाल किले से कोई मतलब नहीं है। मैं लाल किले में नहीं आउंगा। 

सिपाहीयों द्वारा तुलसीदासजी का उत्तर सुनकर बादशाह को बहुत बुरा लगा। वो लालपीला हो गया। लालपीले होकर हुक्म दिया 'तुलसीदास जी को हथकडीयां पहनाकर लाल किले में लेकर आओ।'

तुलसीदासजी को हथकडियां पहनाकर लालकिले में लाया गया। अकबर ने तुलसीदासजी से कहा 'अगर आप चमत्कारी व्यक्ति हो तो कोई चमत्कार कर के दिखाइये।' 

तुलसीदासजी ने कहा 'मैं तो भगवान रामचंद्र जी का भक्त मात्र हूँ। कोई जादूगर नहीं हूँ कि जादू के खेल या कोई चमत्कार कर के दिखाउं।' ये सुनकर अकबर क्रोधित हो गया। क्रोधित होकर फरमान जारी कर दिया कि 'इसे हथकडियां पहनाकर कालकोठरी में कैद कर दो' 

दूसरे दिन आग्रा के उस लाल किले में न जाने कहां से सैंकडों की संख्या में बंदर आ गये। उन्होंने पूरे लालकिले को अस्तव्यस्त कर दिया। जैसी तबाही हनुमान जी ने अशोक वाटिका में मचायी थी। वैसी तबाही मचा दी। तबाही देखते हुये अकबर ने बीरबल से पूछा 'ये सब क्या हो रहा है? 

बीरबल ने कहा 'हुजूर, आप को चमत्कार देखना था ना! देख लीजिये।'

अकबर ने तुरंत हुक्म देखर तुलसीदासजी को कालकोठरी से मुक्त कर दिया; बेड़ियां खोल दी। तुलसीदासजी ने बीरबल से कहा 'मुझ कोई अपराध किये बिना दंड मिला है। मैं उस कोठरी में श्री रामचंद्रजी और हनुमान जी का स्मरण कर रहा था। आंखों से अश्रु झर रहे थे। हनुमान जी की प्रेरणा से मेरी कलम अपने आप चलने लगी थी। हनुमानजी की प्रेरणा से ही चालीस चौपाईयां लिख दी है। 

जो भी व्यक्ति संकट या पीडा में होगा। वो जब इस का पाठ करेगा। उस के सारे संकट सारी पीडा दूर हो जायेंगे। इसे हनुमान चालीसा कहा जायेगा। 

अकबर बहुत शरमिंदा हुआ। उसने तुलसीदासजी से माफी मांगी। उन्हें पूरे मान सम्मान और सैन्य के पहेरे के मथुरा की ओर साथ विदा किया। 

हनुमान जी इसीलिये संकटमोचन कहे जाते हैं। आज सब हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। 


बोलो जय श्री राम

बोलो श्री हनुमान दादा जी की जय हो

अनुवादक - महेश सोनी

गुरुवार, फ़रवरी 3

जैन सर की यादगार टिप्पणी



 

प्यास का सुख

 जिंदगी में कभी 

प्यासा होने का सुख भोगा है

तुम सोचोगे! प्यासा होने का सुख 

प्यास का ना मिटना भी एक सुख देता है

ये सुख का एसा पौधा है 

जो अतृप्ति के आंगन खिलता है

जिस पर छटपटाहट के फूल लगते है

आंसू जेठ की तपती दोपहरी बन जाते है

और मन?

एसा रेगिस्तान बन जाता है

जिस में दूर तक पानी की एक बूंद दिखायी नहीं देती

पानी बूंद हा हा, हाहाहाहा

पानी बूंद सही समय पर सही जगह पर बरस जाये

तो रेगिस्तान का सृजन ही नहीं होता

पर अफसोस 

हर जगह बूंद नहीं बरसती

इसलिये धरा अतृप्त ही रह जाती है

और प्यास को भी सुख समझ लेती है

कुमार अहमदाबादी

यादगार टिप्पणी



 

बुधवार, फ़रवरी 2

मीठी क्षणों के सपने

तने से लिपटी ये बेल 
बहुत बेचैन करती है
नभ में लहराता बादल
किनारों से खेलता सागर
थिरकता मचलता बहकता
गुनगुनाता मदमस्त आंचल
ये बसंत ये बहार नस नस
में उठी मदहोश तरंगे
 ये उच्छृंखल भावनाएं
सब तृप्ति की बांहों में 
मसले जाने के लिये
संघर्ष की मीठी क्षणों से
गुजरने के लिये
और उस के बाद पागल होकर
झूमने के लिये बेचैन है
कुमार अहमदाबादी

લેખન માં અલંકાર

અલંકાર (કોપી પેસ્ટ) અલંકાર એટલે :- સાહિત્યમાં વાણીને શોભામાં અને પ્રભાવમાં વધારો કરે તેવા ભાષાકીય રૂપોનો જે પ્રયોજન કરવામાં આવે છે તેને અલંક...