स्वयं को न पहचान पाया जो; वो भाग हूँ मैं।
पड़ा महँगा ये भूल जाना मुझे; नाग हूँ मैं॥
जला सकती हूँ बेवफ़ा को, स्वयं जल रही हूँ।
शमा के मुलायम ह्रदय में लगी, आग हूँ मैं॥
अहिंसा के कारन, खो दी; चार सिंहो ने ताकत।
था उपवन कभी, आज; उजडा हुआ बाग हूँ मैं॥
मिटा दो सभी पर्व भारत के; जारी है षड़यंत्र।
विरासत के वटवृक्ष से, झड रहा फ़ाग हूँ मैं॥
लड़ाई लड़ी ना कभी, जो करे आर या पार।
हुआ बारहा मैं अधिन, सच कहूँ; झाग हूँ मैं॥
परायों के कब्जे में हूँ, ये तडप मेरी; समझो।
छुडाओ मुझे, क्योँ कि: भारत का भू-भाग हूँ मैं॥
कुमार अमदावादी
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
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बुधवार, जून 13
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