बच्चों में संस्कारोँ का सिंचन
आवणारी पेढ़ीओ लणती रहे
सदविचारो जो तमे वावी सको
सुरेश विराणी
कवि कि सुरेश विराणी कि उपरोक्त पंक्तियाँ गहन अर्थ रखती हैं. पहले गुजराती भाषा के इस शेर का भावार्थ स्पष्ट कर दूँ। शेर का भाव है कि अगर आज बोएंगे तो आनेवाली पीढ़ियां सदविचारों कि फसल को काट सकेगी। अगर भावि पीढ़ियों को संस्कारी बनाना है तो आज से ही कार्य शुरू करना होगा। ये बहुत महत्वपूर्ण विचार है। कवि ने खेती के प्रतिक के सहारे दो पंक्तियों में विशाल व गहन अर्थ रखनेवाली बात कही है। ये तो सब चाहते हैं कि मैं बच्चे में सद्विचारों का सिंचन करूँ। मगर कितने लोग सफल होते हैं? कितने लोग बच्चों में संस्कारों का सिंचन करनेवाली सही प्रक्रिया से गुजरते हैं?
कुछ साल पहले मैंने महाराष्ट्र के एक भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश का वक्तव्य सुना था। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि, "पहले माँ बाप बिगड़ते हैं फिर बच्चे बिगड़ते हैं। पहले बीज बिगड़ता है फिर फसल बिगड़ती है,"इस बात के समर्थन में उन्हों ने जो घटना सुनाई वो प्राय हर घर में घटित होती है। जिस से बात न करनी हो ऐसे व्यक्ति का फोन आने पर माता-पिता अक्सर फोन बच्चे के हाथ में पकड़ाकर कहते हैं कि कह दे "पापा घर पर नहीं है या मम्मी घर पर नहीं है" क्या ऐसा कर के माँ बाप बच्चों में गलत संस्कारों के बीज बोने का कार्य नहीं करते हैं? इस तरह की छोटी छोटी कई घटनाओं द्वारा माँ बाप बच्चों में कुसंस्कारों के बीज बोते हैं। जैसे कि "अब की बार मामाजी तुम्हें कुछ कहें तो तुम भी साफ साफ ये कह देना" या खुद कह देते हैं कि "खबरदार जो मेरे बच्चे को कुछ कहा"। कौन सोचता हैं की ऐसा कर के मैं गलत कर रहा हूँ।
बच्चों में संस्कारों एवं सदविचारों का सिंचन करने की प्रक्रिया लम्बी व धैर्य की परीक्षा लेनेवाली प्रक्रिया है। जिस तरह अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए किसान को एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। उसी तरह बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए माता पिता को भी लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ये प्रक्रिया माता पिता के धैर्य की कसोटी करती है। लेकिन ये भी सच है क़ि जिस तरह किसान अच्छी फसल प्राप्त करने की प्रक्रिया से गुजरे बगैर अच्छी फसल प्राप्त कर नहीं सकता। माता पिता भी बच्चों को संस्कारी बनाने क़ि प्रक्रिया से गुजरे बगैर बच्चों को संस्कारी बना नहीं सकते।
फसल प्राप्त करने के लिए किसान पहले खेत जोतता है, फिर बीज बोता है, फिर पानी से सिंचन करता है। बीजों के अंकुरित होने से लेकर कटाई तक तथा जंगली जानवरों एवं शत्रु से फसल को बचाने के लिए निगरानी करता है। फसल को कोई रोग ना लगे, इसलिए कीटनाशक पदार्थों का उपयोग करता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मौसम मेहरबान रहे तो अच्छी फसल तैयार होती है। पूरी प्रक्रिया में कहीं भी थोड़ी सी भी चूक हो जाये तो सारी मेहनत पर पानी फिरने का खतरा रहता है। इसी तरह बच्चों में संस्कारों का सिंचन करना भी पल दो पल या महीने दो महीने की प्रक्रिया नहीं। ये एक लम्बी प्रक्रिया बल्कि कहना चाहिए की एक लम्बी साधना है।
बच्चों द्वारा सिखने की प्रक्रिया गर्भावस्था से ही शुरू हो जाती है। अभिमन्यु ने चक्रव्यूह के बारे में जानकारी कब प्राप्त की थी? अगर अभिमन्यु की कथा इस बात का प्रमाण है क़ि बच्चा गर्भावस्था से ही सीखना, ज्ञान प्राप्त करना शुरू कर देता है। गर्भावस्था के दौरान माँ जो कुछ भी: सुनती हैं, सोचती हैं, समझती हैं , देखती हैं. पढ़ती हैं, खाती हैं, पीती हैं: का असर बच्चे पर पड़ता हैं। माँ अगर धार्मिक ग्रंथ पढ़ती हैं तो बच्चे में धार्मिक संस्कारों के विकसित होने क़ी सम्भावनाएं ज्यादा होती हैं. माँ वाहियात टीवी सीरियलें देखती हैं; तो कुसंस्कारों के बीज विकसित होने क़ि सम्भावनाएं ज्यादा होती हैं। बच्चे के जन्म के बाद संस्कारों के सिंचन की प्रक्रिया आगे बढाती हैं। यूँ समझिये कि वो बीज के अंकुरित होने के बाद की स्थिति होती हैं.
बच्चे कुसंस्कारों का विष पी न जाये। इसलिए टीकाकरण भी जरुरी हैं। बच्चों को ये बताते रहना जरुरी हैं कि कुसंस्कार, अनीति, जूठ,छल, प्रपंच का फल हमेशा बुरा फल मिलता हैं। जब कि सत्य, निष्ठा, ईमानदारी, सद्गुणों का फल हमेशा अच्छा मिलता हैं। बच्चों का 'टीकाकरण' करने के लिए छत्रपति शिवाजी व उन की माता माता जीजाबाई, सरदार वल्लभभाई पटेल, स्वामी विवेकानंद तथा और भी ऐतिहासिक पात्रों कि कथाएं सुनायी जानी चाहिए। इतिहास में ऐसी बहुत सी कहानियां है। जिन का 'टीकाकरण' करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इतिहास की गाथाएं बच्चों को बताएंगी कि कठोर परिश्रम के बिना सफलता नहीं मिलती। कठोर परिश्रम के बाद भी सफलता तब मिलती है जब माता पिता का आशीर्वाद हो। कवि ने दो ही पंक्तियों में खेती के प्रतिकों के सहारे कितना कुछ कह दिया है। वही किसान अच्छी फसल प्राप्त कर सकता है। जो अच्छी फसल प्राप्त करने कि योग्यता रखता हो। वही माता पिता बच्चों को संस्कारी बना सकते हैं। जो पहले खुद संस्कारी बनते हैं।
महेश सोनी
(गुजराती लेखक मंडल के मुखपत्र लेखक अने लेखन में कुछ वर्ष पहले छपा मेरा लेख)
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