मोर नाचे नाचसी
मन री बायड काढसी
मोती सच्चा लाधसी
भाग थारा जागसी
बात मन री जे हुवे
तूं बणाये लापसी
संचसी नहीं पाणी तो
धूड मिट्टी फाकसी
आयी है लछमी घरे
धोए मुंढो आळसी?
पीड थारी एक दिन
काळजे ने बाळसी
फूंक मत घर कोइ रो
हाय बीरी लागसी
कुमार अहमदाबादी
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
आज तेरा व मेरा दुलारा गया जेब से माल सारा का सारा गया जून के गर्म मौसम में था हाल ये “रात काटी गयी दिन गुजारा गया” प्रेम का दौर एसे बिताया ...
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