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शुक्रवार, अक्टूबर 10

मुंह मत फुलाया कर (ग़ज़ल)


न मानुं बात तो मुंह मत फुलाया कर 

कभी तो बात मेरी मान जाया कर


कसम से मैं सदा तैयार रहता हूं

कभी सजनी मुझे तू भी मनाया कर 


नयी साड़ी दिला दूंगा मगर एसे

जरा सी बात में मुंह मत चढाया कर 


सनम दरखास्त है ये बेतहाशा तू

सताया कर मगर कह कर सताया कर 


ये अंतिम मांग है सप्ताह में इक बार 

मसालेदार खाना भी बनाया कर


शिकायत कर रही है क्यों ‘कुमार’ को अब

कहा था सब्र को मत आजमाया कर


कुमार अहमदाबादी 



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