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बुधवार, नवंबर 5

ईंट थे कल तलक (ग़ज़ल)


ईंट थे कल तलक घर की दीवार थे 

हम कला से सजी छत का आधार थे


दिन थे त्यौहार के आंख में थी नमी

जेब कंगाल थी हम खरीदार थे


एक दिन सेठ साहब थे हम सींध में

तब हमारे करोडों के व्यापार थे


सोचते हैं बता दें की हम भी कभी

कोमलांगी युवा पुष्प का प्यार थे


प्रेम की मौत पर भी रहे आंख में 

वायदा कर चुके अश्रु लाचार थे


आंख वो दृश्य भूली नहीं है ‘कुमार’

डॉक्टर के भी हाथों में हथियार थे

कुमार अहमदाबादी 


 

मंगलवार, नवंबर 4

बेमौसम बरसात (रुबाई)


जब जब होती है बेमौसम बरसात 

शोले बन जाते हैं मीठे हालात 

कहती है बरसात आओ तुम भीगो

हौले हौले फिर भीगेंगे जज़बात 

कुमार अहमदाबादी

बेटी….

अनुवादक – महेश सोनी  १.विवाह के समय सब व्यस्त होते हैं। बेटी की मनःस्थिति के बारे में किसी को मालूम नहीं होता। ३.आमंत्रण पत्रिका में अपने ना...