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बुधवार, नवंबर 5

ईंट थे कल तलक (ग़ज़ल)


ईंट थे कल तलक घर की दीवार थे 

हम कला से सजी छत का आधार थे


दिन थे त्यौहार के आंख में थी नमी

जेब कंगाल थी हम खरीदार थे


एक दिन सेठ साहब थे हम सींध में

तब हमारे करोडों के व्यापार थे


सोचते हैं बता दें की हम भी कभी

कोमलांगी युवा पुष्प का प्यार थे


प्रेम की मौत पर भी रहे आंख में 

वायदा कर चुके अश्रु लाचार थे


आंख वो दृश्य भूली नहीं है ‘कुमार’

डॉक्टर के भी हाथों में हथियार थे

कुमार अहमदाबादी 


 

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