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मंगलवार, दिसंबर 30

सुनो क्या ये धुरंधर बोलते हैं (ग़ज़ल)

सुनो क्या ये धुरंधर बोलते हैं

कहानी क्या है मंजर बोलते हैं 


वहां सब मौन हो जाते हैं प्यारे

जहां खामोश खंजर बोलते हैं


मिलेंगे सीप मोती खोजने पर

हमें अक्सर समंदर बोलते हैं


न जाने क्यों एवं कब से प्रजा की

जुबां खामोश है डर बोलते हैं


यहां कुछ भी न तेरा है न मेरा 

गृहस्थी को कलंदर बोलते हैं 


वो बरमूडा है मत जाओ वहां तुम

जहाजों से समंदर बोलते हैं 


किया क्या है कुमार जीवन में तुमने 

मुझे वक्ती सिकंदर बोलते हैं 

शनिवार, दिसंबर 27

मुस्कुरा रही है कब से (रुबाई)


 मन ही मन मुस्कुरा रही है कब से 
आंखें भी पट पटा रही है कब से 
मौसम का है नशा या है यौवन का
मछली सी छटपटा रही है कब से 
कुमार अहमदाबादी 

गुरुवार, दिसंबर 25

अखे के छप्पे का भावार्थ


अनुवादक - कुमार अहमदाबादी


ओछुं पात्र ने अदकुं भण्यो, वढकणी वहु ए दीकरो जण्यो

मारकणो सांढ चोमासुं माल्यो, करडकणो कूतरो हडकवा हाल्यो

मरकट ने वळी मदिरा पीवे, अखा एथी सौ कोई बीवे

अखो


ओछुं भण्यो यानि अल्प योग्यता वाला इंसान एवं अधूरा ज्ञान रखने वाला इंसान समाज के लिये उतना ही हानिकारक होता है। जितना हानिकारक झगड़ालू बहु का पुत्र परिवार के लिये होता है। जिस तरह एक हिंसक बैल बरसात के मौसम में खुला छोड़ दें तो वो विनाशकारी साबित होता है।‌ जिस तरह कुत्ता पागल होने पर किसी को भी काट सकने के कारण सब उस से बच के रहते हैं। उसी तरह पागल सनकी इंसान के हर व्यक्ति बच के रहता है; उस से दूर ही रहता है। पागल सनकी इंसान की सनक जितनी ज्यादा होती है। वो उतना ही खतरनाक होता है। बंदर वैसे भी बहुत चंचल व शरारती होते हैं। कई बार यूं ही उल्टी सीधी शरारतें करते हैं। एसे में अगर कोई बंदर मदिरा पी ले; फिर तो कहना ही क्या! फिर तो वो जितना तूफान मचाए वो कम होता है। इंसान को वो खानपान कतई नहीं करना चाहिए। जो इस के भीतर की विध्वंसक शक्तियों को जागृत कर दे। कम योग्यता या बिना योग्यता वाले इंसान के पास शक्तियों का होना। समाज के लिये हमेशा घातक साबित होता है। शक्तियां सकारात्मक इंसान के पास हो तो समाज व इंसान के प्रगति का और नकारात्मक इंसान के पास हो तो अधोगति का निमित्त बनती है।

शुक्रवार, दिसंबर 19

सब पीते हैं कहती है(रुबाई)


 सब पीते हैं कहती है मधुशाला 

सारे होते हैं तृप्त पीकर प्याला

हां, होता है समय अलग मक़सद भी

करती है शांत हर अगन को हाला

कुमार अहमदाबादी 



गुरुवार, दिसंबर 11

चल जल्दी चल (रुबाई)

 

चल रे मन चल जल्दी तू मधुशाला 

जाकर भर दे प्रेम से खाली प्याला

मत तड़पा राह देखने वाली को 

करती है इंतजार प्यासी बाला

 कुमार अहमदाबादी

बुधवार, दिसंबर 3

किसी को पर नहीं मिलते किसी को (ग़ज़ल)



किसी को पर नहीं मिलते किसी को घर नहीं मिलता 

किसी को ज़र नहीं मिलता किसी को वर नहीं मिलता 


मैं अपनी जिंदगी का नीम सा सच कह रहा हूं, सुन

मुझे हक है कि मुस्काउँ मगर अवसर नहीं मिलता 


परम सुख शांति परमात्मा सृजन क्षमता अलौकिक मौन

अगर खोजें तो फिर क्या क्या हमें भीतर नहीं मिलता 


अगर सागर को पाना है तो आकर डूब जा मुझ में 

किनारे पर खड़े इंसान को सागर नहीं मिलता


यहां धनवान को मिलता है बिन मांगे मगर निर्धन

गुणी सज्जन सरल इंसान को आदर नहीं मिलता 


न भूला हूं न भूलुंगा महात्मा की कही ये बात

हमें देकर जो मिलता है कभी लेकर नहीं मिलता 

कुमार अहमदाबादी 

रुबाइयां फोटो पर








 

यौवन तेरा हरा भरा(फोटो रुबाई)


 

कहता हूं मैं भेद गहन खुल्लेआम (फोटो रुबाई)


 

मौसम के गीतों को गाना सीखो (रुबाई ऑन फोटो)


 

આપણી ૧૪૮ જાતોનું વર્ણન

કોપી પેસ્ટ બ્રાહ્મણની રસોઈ ને રાજપૂતની રીત, વાણિયાનો વેપાર ને પારસીની પ્રીત, નાગરની મુત્સદી ને વ્યાસની ભવાઈ, લોહાણાની હુંસાતુંસી ને ભાટિયાની...