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मंगलवार, दिसंबर 30

सुनो क्या ये धुरंधर बोलते हैं (ग़ज़ल)

सुनो क्या ये धुरंधर बोलते हैं

कहानी क्या है मंजर बोलते हैं 


वहां सब मौन हो जाते हैं प्यारे

जहां खामोश खंजर बोलते हैं


मिलेंगे सीप मोती खोजने पर

हमें अक्सर समंदर बोलते हैं


न जाने क्यों एवं कब से प्रजा की

जुबां खामोश है डर बोलते हैं


यहां कुछ भी न तेरा है न मेरा 

गृहस्थी को कलंदर बोलते हैं 


वो बरमूडा है मत जाओ वहां तुम

जहाजों से समंदर बोलते हैं 


किया क्या है कुमार जीवन में तुमने 

मुझे वक्ती सिकंदर बोलते हैं 

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