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शुक्रवार, अगस्त 14

जिंदगी में चाहता कुछ भी नहीं (ग़ज़ल)

 
जिंदगी में चाहता कुछ भी नहीं 
वो किसी से मांगता कुछ भी नहीं

छोड़नी ना चाहिए जूठन कभी
प्लेट में वो छोड़ता कुछ भी नहीं

जाम का पूरा मजा लेता है जो 
जाम में वो छोड़ता कुछ भी हो 

क्या गज़ब का आदमी है यार वो
बोलता है सोचता कुछ भी नहीं

तृप्त शायद हो गया है इसलिए 
मन किसी से पूछता कुछ भी नहीं

मौन धारण कर लिया है शब्द ने
आज कल वो बोलता कुछ भी नहीं

बन गया है मानसिक रोगी 'कुमार'
आजकल तू भूलता कुछ भी नहीं
 
शांति में वैराग्य बसता है 'कुमार'
शांत मानव चाहता कुछ भी नहीं
कुमार अहमदाबादी 

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