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रविवार, अक्टूबर 7

आजकल [ग़ज़ल]


खतरे में हम हैं घंटी बजाते हैं आजकल
खंजर से प्यार करना सिखाते हैं आजकल


तलवार को खुशी हो रही है मिलेगा काम
इंसान तेज धार लगाते हैं आजकल


बुलेटप्रूफ कमरों में बैठे हैं शख्स वे
खतरों से खेलना जो सिखाते हैं आजकल

सब कुछ बड़ा हो ज्यादा हो है सूत्र आज का
बम द्वारा खून ज्यादा बहाते हैं आजकल


जाने न गाँव को धरा को इंसा को मगर
राष्ट्रीय नीतियाँ वे बनाते हैं आजकल

मालीपने को भूल गये माली इसलिए
फूलों को छोड़ काँटे खिलाते हैं आजकल


डो, रे, मी के अलावा जिसे कुछ न भाता है
सब को स्वदेशी राग सुनाते हैं आजकल
कुमार अहमदाबादी

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