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गुरुवार, अक्टूबर 11

नाग हो तुम,


 जानता हूँ मैं सनम ये नाग हो तुम
डंख मारे चोंच से वो काग हो तुम

खोखला दावा वफ़ा का है तुम्हारा
एक पल मैं बैठ जाता झाग हो तुम


चाँद का दर्जा दिया है तुमने मुज को
श्वेत दामन में लगा इक दाग हो तुम


  जो गिराएँ एक पल में लाख लाशें
खून पी के जो पला वो भाग हो तुम

 जब सुनें तो झुंझलायें कोषिकाएँ
लय से भटका बेसुरा इक राग हो तुम

 घर हजारों खाक तुमने कर दिए हैं
रूप की तीली में सिमटी आग हो तुम


 कोख को बरसात में भी भर सके ना,
खिल सका ना जो कभी वो बाग़ हो तुम.
कुमार अहमदाबादी

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मेरा परिचय

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