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मंगलवार, अक्टूबर 29

खिलखिलाहट (ग़ज़ल)



चाँद को जब मुस्कुराना आ गया
फूल को भी खिलखिलाना आ गया
 
चाँदनी को पुष्परस में घोलकर
पान करना लड़खड़ाना आ गया

गूँथकर माला में तारेँ, रूपसी
रात को दुल्हन बनाना आ गया

क्या जरूरत बोतलों की है भला
होश को जब गडबडाना आ गया

 
आसमाँ की जगमगाहट देखकर
स्वप्न को भी जगमगाना आ गया

 
 सोलवें में चाँद के सिंगार को
देख दरपन को लजाना आ गया

चाँदनी के एक पल के संग से
बादलों को चमचमाना आ गया
 
चाँदनी को छेड़ने की सोच से
पास मेरे खुद बहाना आ गया



रात बोली पूर्णिमा की ए 'कुमार'
चाँदनी का अब जमाना आ गया
.............................................................
कुमार अहमदाबादी

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