तुम समझो भोलेनाथ
मैं एक नारी हूँ
नारी मन को व्यक्त करने के लिये
किसी शब्द का प्रयोग नहीं करती
वो हमेशा संकेतों का सहारा लेती है
मंद मंद मुस्कराना,
नजर चुराते हुये नजर मिलाना
शरमाना, न शरमाते हुये भी शरमाना,
आंख झुकाना, चूडी बजाना
पायल छनकाना, प्यारा गीत गुनगुनाना
अब इतना कहने पर भी नहीं समझे
तो मुझे लगता है
तुम सचमुच भोले हो
*कुमार अहमदाबादी*
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
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बुधवार, जनवरी 5
नारी की भाषा
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