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शुक्रवार, दिसंबर 2

भावानुवादित मुक्तक


द्वेष का हलाहल है प्रेम की कटोरी है
विश्व तेरी ये हरकत एकदम छिछोरी है
बोझ वासना का है सांस के भरोसे पर
कौन ये कहे मन को टूटी प्रेम डोरी है
कुमार अहमदाबादी

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