कर्म कर इंसान है तू कर्म करकर्म करने में कभी ना शर्म करफल मिलेगा क्या मिलेगा की नहींसोच मत ये तू सदा सत्कर्म करसोचकर तू कर रहा है पाप हैसोचकर तू ना कभी दुष्कर्म करउग्र मत हो मामला नाजुक है यारगर्म सांसों को जरा सा नर्म करसार गीता का सरल व साफ हैजिंदगी में तू सदा सत्कर्म करआज तेरे शब्द सादे हैं ‘कुमार’शब्द में पैदा जरा सा मर्म करकुमार अहमदाबादी
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
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रविवार, मार्च 26
कर्म कर(ग़ज़ल)
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