कभी भी झुका ना सकेगी कमर कोगरीबी झुका ना सकेगी नजर कोकहेंगे गरम सूर्य औ’ चंद्र शीतलहराया है उस ने समय के सफर कोन जाने कहां से आयी है ये लेकिनसमय झूठ साबित करेगा खबर कोबहुत हो चुका मौन अब तोड़ना हैकरेंगे खतम बोलीवुड के असर कोकहां तक गिरेंगे, हवस के कीड़े नेसीमा पार खंडित किया है कबर कोकुमार अहमदाबादी
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
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बुधवार, मार्च 22
झुका न सकेगी कमर को(गज़ल)
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