कुमार अहमदाबादी
प्रस्तुत एक घटना छोटे से नगर की गळी की है; जो की अंदाजन १८० से २०० वर्ष पुरानी है।
नगर में एक गळी थी। उस गळी के अंदर भी एक छोटी संकरी गळी थी। उस संकरी गली में एक घर में एक बुजुर्ग व्यक्ति रहता था। वो अकेला ही था। रहन-सहन से वो गळी के अन्य लोगों से गरीब ही लगता था। लेकिन गळीवाले उस का ध्यान रखते है, रोज किसी न किसी एक घर से उस के लिये भोजन पहुंच जाता था।
कुछ वर्ष बाद वो गुजर गया। परिवार में दूर दूर तक कोई नहीं था। गळीवालों ने ही पैसे इकट्ठे कर के उस का अग्नि संस्कार किया। अब क्या किया जाए के मुद्दे पर उसी शाम गळी के बड़े बुजुर्गो की मीटिंग हुई। तय हुआ की एक बार उस के घर की पूरी तरह तलाशी ली जाए। शायद किसी रिश्तेदार का पता ठिकाना मालूम हो जाए।
सो,
घर की तलाशी ली गयी। तलाशी में ज्यादा कुछ न मिला। लोहे की एक पेटी मिली। गळी के पंचों ने वो पेटी खोली। वो पेटी गत्ते की छोटी छोटी माचिस के साइज जितनी अनेक डिबिया से भरी थी। उन डिबियाओं को खोल कर देखा तो प्रत्येक डिब्बी में सौ रुपए का नोट था। गळीवाले हैरान हो गये।
खैर,
और खोज बीन की। लेकिन किसी परिवार जन या नजदीक या दूर के किसी रिश्तेदार का कोई सुराग नहीं मिला।
आखिर में गळी के बड़े बुजुर्गों ने सलाह मशविरा कर के उस धन से तेरह दिन किये। जिस में पूरी गली ने तेरह दिन खाना खाया।
शायद इसीलिये कहा जाता है। ये कोई नहीं जानता। कौन किस के लिये कमा रहा है या कौन किस के भाग्य से खा रहा है।
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