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रविवार, मई 12

मीठी वाणी क्यों?

 



कहता हूं मैं भेद गहन खुल्ले आम 

कड़वी वाणी करती है बद से बदनाम 

जग में सब को मीठापन भाता है 

मीठी वाणी से होते सारे काम 

कुमार अहमदाबादी

मीठी वाणी का जीवन

*मीठी वाणी का जीवन*

*पोस्ट लेखक - कुमार अहमदाबादी* 

*नीती शतक से साभार*

 केयूराणि न भूषयन्ति पुरुष हारा न चन्द्रोज्जवला

न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः 

वाण्ये का समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते 

            क्षीयन्ते खामु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्    ।19।

केयूर(बाजूबंध, भुजबंध) और चन्द्रमा के समान ‌उज्वल मोतियों के हार धारण करने और उबटन करने तथा केशों में पुष्प धारण करने से एसी शोभा नहीं हो सकती; जैसी कि संस्कार युक्त अलंकृत वाणी से होती है: क्यों कि अलंकार तो नष्ट हो जाते हैं। लेकिन अलंकृत वाणी अर्थात मीठी वाणी मीठे बोल कभी नष्ट नहीं होते। उन का प्रभाव जीवन के साथ और जीवन के बाद भी रहता है। आदमी संसार से चला जाता है। लेकिन उस की मीठी वाणी यहीं रह जाती है। 



रविवार, मई 5

मुलाकातों की आशा(रुबाई)



मीठी व हंसी रातों की आशा है

रंगीन मधुर बातों की आशा है 

कुछ ख्वाब एसे हैं जिन्हें प्रीतम से

मदमस्त मुलाकातों की आशा है 

कुमार अहमदाबादी


 

स्पेश्यल मैरेज एक्ट १९५४(1954) का फायदा




स्पेश्यल मैरेज एक्ट १९५४(1954) का फायदा

गुजरात समाचार की ता-05-05-2024 रविवार की रविपूर्ति के पांचवे पृष्ठ पर छपे लेख का अनुवाद
अनुवादक - महेश सोनी

स्पेश्यल मैरेज एक्ट १९५४(1954) का सबसे बडा फायदा जानिये।
भारत विविधताओं से भरा राष्ट्र है। यहां भांति भांति के रीत रिवाज संस्कार व संस्कृति को मानने वाले व उस के अनुसार जीने वाली प्रजा है। सरकार ने शादी के हेतु उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये खास कानून बनाएं हैं।
जैसे कि हिन्दू मैरिज एक्ट १९५५(Hindu martige act 1955) हिन्दू की हिन्दू से शादी के बारे में है। मुस्लिमों को शादी(निकाह) करनी हो तो मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) (muslim personal law(shariat) application act 1937) एप्लिकेशन एक्ट १९३७(1937) का पालन करना पड़ता है। ईसाईयों के लिये इन्डियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट १८७२(1872) है। इसी तरह पारसीयों के लिये अलग एक्ट है। जो पारसी मैरिज एन्ड डिवोर्स एक्ट १९३६(1936) का है। सीक्खों के लिये आनंद मैरिज एक्ट  1909 भारत सरकार ने बनाया है।

उपरोक्त सारे कानून उन व्यक्तियों के लिये हैं। जब एक ही धर्म के लडका लडकी की शादी का मामला होता है। इन धर्मों का पालन करने वाले जब एक ही धर्म के होते हैं। तब उपरोक्त कानून असरकर्ता होते हैं। जैसे की अगर कोई लडका हिन्दू मैरिज एक्ट के अनुसार शादी करना चाहता हो तो उस से शादी करने वाली लडकी भी हिन्दू ही होनी चाहिए। मुसलमान लडकी अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार शादी करना चाहती हो तो लडका भी मुस्लिम होना चाहिए। एसा ही अन्य धर्मों के लिये है!
एक उदाहरण देकर समझाउं? अब अगर कोई पारसी लडका हिन्दू लड़की से शादी करना चाहता हो तो उस के सामने कानून के दो विकल्प उपलब्ध हैं। एक हिन्दू मैरिज एक्ट और दूसरा पारसी मैरिज एन्ड डिवोर्स एक्ट; इन दो कानूनों के अंतर्गत वे शादी कर सकते हैं।
लेकिन खूबी की बात ये है। जिस तिस कानून के अंतर्गत शादी करने वाले दोनों व्यक्ति एक ही धर्म का पालन करने वाले होने चाहिये; और अगर दो में से एक व्यक्ति अलग धर्म की हो तो जिस कानून को मानकर उस के अंतर्गत शादी कर रहे हों: पहले उस धर्म का स्वीकार करना पड़ता है। अगर, एक मुस्लिम लड़का इसाइ लडकी से मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत शादी कर रहा हो तो लडका तो मुस्लिम है; लेकिन इसाइ लडकी को भी मुस्लिम धर्म का स्वीकार करना पड़ता है। उस के बाद ही दोनों को मुस्लिम पर्सनल लॉ अपने दायरे में निकाह की मंजूरी देता है।
दूसरी तरफ पति पारसी हो और पति सीक्ख हो तो इन दोनों को कानून श्रेष्ठ विकल्प देता है। इस विकल्प के अनुसार उन दोनों मे से एक को भी अपना धर्म परिवर्तन करने की ज़रुरत नहीं रहती।

अगर पति पत्नी दोनों के धर्म अलग हों और दोनों को धर्म परिवर्तन किये बिना शादी करनी हो तो  वे स्पेशियल मैरिज एक्ट १९५४(1954) की कानूनी सुविधा के अंतर्गत शादी कर सकते हैं। उन के लिये यही एकमात्र विकल्प है। स्पेश्यल मैरिज एक्ट १९५४(1954) का यही विशेष लाभ है कि उस के अंतर्गत दोनों अपना अपना धर्म बदले बिना पति पत्नि के संबंध से जुड सकते हैं। दूसरे कानूनों की तरह ये कानून शादी से पहले धर्म परिवर्तन के लिये बाध्य नहीं करता। इस के अंतर्गत शादी करने वालों को अपना धर्म बदलने की जरुरत नहीं पडती।

गुजरात समाचार की ता05-05-2024 रविवार की रविपूर्ति के पांचवे पृष्ठ पर छपे लेख का अनुवाद
अनुवादक - महेश सोनी


गुरुवार, मई 2

हो गया है प्यार (मुक्तक)


 

સ્વપ્નને સાકાર કરવાની કળા (ગીત)


સ્વપ્નને સાકાર કરવાની કળા ગુજરાત જાણે છે

માટે આજે  નર્મદાના નીરને સાબરમાં વહાવે છે............સ્વપ્ન




આંધી કે  તોફાન કે વરસાદ કે હો રેત ધગધગતી

સંકટોથી બાથ ભીડીને ચરણ આગળ ધપાવે છે

લક્ષ્ય મોટાં કોઈ દિ' સહેલાઈથી મળતા નથી જગમાં

ઠેસ અઢળક વાગે તોપણ ગુરુશિખર પર જઈને આવે છે..સ્વપ્ન



જન્મ પામે  છે અહીં વનરાજને સરદાર, ગાંધી જે

રાષ્ટ્રનાં નિર્માણ માટે જાનની બાજી લગાવે છે

શૂન્ય, પ્રેમાનંદ, અખો, નરસિંહ,કલાપી, કાન્ત કે શામળ

ગીત, ગરબા, છપ્પા, દુહાને ગઝલ-ગંગા વહાવે છે........સ્વપ્ન




આ ધરાના માનવી જ્યાં જાય છે વસવાટ માટે ત્યાં

ઓગળે છે ખાંડ થઈને દુધને ગળ્યું બનાવે છે

કાનુડાએ આ ધરા પર દ્વારકા નગરી વસાવી છે

આ ધરાનો જાદુ અદ્ભુત કહાનને જે ખેંચી લાવે છે.........સ્વપ્ન


ગુર્જરો ઝંખે સફળતા આ જીવનમાં ડગલેને પગલે

ગુર્જરોની હામને દુનિયા સદીયોથી વખાણે છે

વિશ્વની ગુજરાતના વિકાસપથ પર છે નજર આજે

ગુર્જરો આ વિશ્વને વેપારની કેડી બતાવે છે.................સ્વપ્ન

અભણ અમદાવાદી

स्वप्न को वास्तविकता बनाते हैं(गीत)

 दोस्तों, कल गुजरात दिवस यानि गुजरात का स्थापना दिवस था. इस अवसर पर मैं मेरा लिखा एक हिंदी गीत पेश कर रहा हूं. आशा है आप को पसंद आएगा.


स्वप्न को हम वास्तविकता यूँ बनाते हैं,

नर्मदा का नीर साबर में बहाते हैं.             

स्वप्न को….


हो सुलगती रेत या फिर बर्फ या पानी,

संकटो में पांव हिम्मत से बढ़ाते हैं.

लक्ष्य ऊँचे प्राप्त करने है कहाँ आसान,

गुरुशिखर तक ठोकरें खाकर भी जाते हैं, 

स्वप्न को….


अमरीका या अफरीका या पूर्व या पच्छम,

दूध में चीनी से हम घुलमील जाते हैं,

खींच लाया इस जमीं का जादू कान्हा को,

जो यहाँ पर द्वारिका नगरी बसाते हैं,         

स्वप्न को….


भूमि ये वनराज की, सरदार, गाँधी की,

राष्ट्र का जो नव-सृजन कर के दिखाते हैं,

शून्य, प्रेमानंद, अखो, नरसिंह, कलापी से,

काव्य-धारा भिन्न छंदों में बहाते हैं,             

स्वप्न को…


गुर्जरों के हौसले को दाद देता जग,

आम-जन भी खेल ऊँचा खेल जाते हैं,

खून की होली जो खेले उन से ये कह दो,

हम दशानन को दशहरे पर जलाते हैं,     

स्वप्न को….



वनराज चावड़ा सदियों पहले हुआ एक गुजराती विजेता योद्धा है. जिसे गुजरात का पहला विजेता माना जाता है। इस के अलावा गुजरात के सासण गिर के बब्बर शेर भी विख्यात है। एशिया में शेरों की आबादी अब सिर्फ सासण गिर के वन में ही बची है। गुजरात में बब्बर शेरों को वनराज यानि वनों का राजा कहा जाता है। 

*कुमार अहमदाबादी*

स्वयं को तुम बदलना सीख लो (मुक्तक)

स्वयं को तुम बदलना सीख लो नये ढांचो में ढलना सीख लो यही सब से बड़ा गुण है “कुमार” समय के साथ चलना सीख लो कुमार अहमदाबादी