कितना मदमस्त है सुहाना मौसम
मनमोहक गीत गा रही है शबनम
हम दोनों इस मौसम में खो जाएं
औ’ गाएं प्रेम की सुरीली सरगम
शबनम - ओस, तुषार, सुबह सुबह फूलों पर लगा हुआ पानी
कुमार अहमदाबादी
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
कितना मदमस्त है सुहाना मौसम
मनमोहक गीत गा रही है शबनम
हम दोनों इस मौसम में खो जाएं
औ’ गाएं प्रेम की सुरीली सरगम
शबनम - ओस, तुषार, सुबह सुबह फूलों पर लगा हुआ पानी
कुमार अहमदाबादी
शाम है जाम है और क्या चाहिये
नाम है काम है और क्या चाहिये
जिंदगी चल रही है खुशी से ‘कुमार’
नाम के दाम है और क्या चाहिये
कुमार अहमदाबादी
પ્રવાસી રહ્યો છું સદા કાળથી હું, ધરા પર સતત આવ જા કરી છે
સદીઓ થી મારી ખબર છે દિશાને યુગો થી મને કાફલા ઓળખે છે
'અભણ' છું છતાં શબ્દનો સાથી છું શારદાએ કૃપા દૃષ્ટિ અઢળક કરી છે
અલંકાર કર્તા વિશેષણ ક્રિયાપદ ગઝલ જોડણી કાફિયા મને ઓળખે છે
અભણ થી વધારે નથી શૂન્યની પાસે કોઈ અનોખો છે સંબંધ અમારો
આ સંબંધ ની વાસ્તવિકતા ને આકાશ ધરતી ની આબોહવા ઓળખે છે
ખબર છે સતત તારા સંબંધીઓ સાથે મેં ઓળખાણ વધારી છે માટે
મને તારી આ માંગ સિંદૂર સદીના ગોટા અને આભલા ઓળખે છે
અભણ અમદાવાદી
अनुवादक - महेश सोनी
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ये रिपोर्ट चौंकाने वाली है। दुनिया में प्रत्येक छट्ठा व्यक्ति अकेला है। दुनिया में करोड़ों लोग टूटे रिश्तों और संवादों के कारण अकेले अकेले संपूर्ण मौन का जीवन जी रहे हैं। ये मौन वाणी का नहीं है बल्कि भावनाओं का मौन है। भावनाओं का आदान प्रदान में शून्यावकाश छा गया है। व्यक्ति के भीतर का शून्यावकाश उसे निगल रहा है। जिस की आंखों और पंखों में नवयौवन का जोश उमंग होने चाहिए। वो नौजवान पीढ़ी इस समस्या का सब से ज्यादा शिकार हो रही है। जीवन जटिल हो रहा है। आगे अनेक चुनौतीयां है। विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के विस्तार के साथ साथ दो पीढीयों में दूरियां बढ़ी है। भौतिकवादी विचारों के कारण आकांक्षाएं आसमान को छूने लगी है। परंतु वास्तविकता के साथ संतुलन न होने के कारण हताशा व उदासी बढ़ रही है। एक फूल व कली एवं पेड़ पौधों के प्रित नहीं हो रही। एसे में कला, साहित्य या संगीत की क्या ही बात करनी।
इस समस्या को बढ़ाने में मोबाइल का योगदान बहुत ज्यादा है। चमक दमक से छलकती दुनिया और उस का आकर्षण सुलभ नहीं है। लेकिन सब को लुभा रहा है। उस के कारण लोग निराशा व हताशा के शिकार हो रहे हैं। रानू मंडल व कच्चा बादाम के क़िस्से याद कर लीजिए। कहा जाता है सोशियल है मिडिया क्रांतिकारी ढंग से फैल रहा है। लेकिन वास्तविकता अलग है। व्यक्ति के सोशियल मिडिया पर हजारों मित्र हो सकते हैं। लेकिन वास्तविक जीवन में वह व्यक्ति अकेला होता है। इस सच को साबित करने वाले अनेक किस्से हैं। ये सांप्रत सत्य है। वर्चुअल मित्रों के कृत्रिम मैसेज व्यवहार हमारे जीवन की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। कृत्रिम रिश्ते वास्तविक रिश्तों की बुनावट को मजबूत नही कर सकते। कृत्रिम संबंधों में वास्तविक रिश्तों जैसी मजबूती नहीं होती। आज लोगों के मन में ये मान्यता गहरे तक बैठ चुकी है कि जिस के पास पैसे हैं। वो कुछ भी कर सकता है। जब की एसा नहीं है। इस सत्य को तीन उदाहरण से समझ सकते हैं। सुनील गावस्कर, अमिताभ बच्चन एवं सचिन तेंदुलकर तीनों अपने पुत्रों को सफलता नहीं दिला सके। तीनों अपने पुत्रों को सफलता नहीं दिला सके। ये सच नहीं है। जिस के पास पैसा है। वो सबकुछ कर सकता है।
पहले परिवार के बुजुर्ग संकट के समय सदस्यों को संभाल लेते थे। वे एक परिस्थितियों के अनुसार मार्गदर्शन करते थे। सारे सदस्य साथ मिलकर संकट से लड़ते थे। जिस परिवार में पति पत्नि दोनों नौकरी करते हैं। वहां परिस्थितियां और ज्यादा विकट है। उन के बच्चे हॉस्टल में रहते थे। घर पर रहते हों तो भी ज्यादातर समय अकेले ही रहते हैं। कई घरों में माता पिता व बच्चे सिर्फ शनि रवि या छुट्टीयों के दिन ही बातचीत कर सकते हैं। ये परिस्थितियां धीरे धीरे अकेलेपन और डिप्रेशन की ओर ले जाती है।
ये समस्या धीरे धीरे मानसिक बीमारी का रुप ले लेती है। लेकिन लोग मानसिक समस्या को समस्या नहीं मानते। इस का उपचार नहीं करवाते; करवाते भी हैं तो बहुत मुश्किल से। विश्व में प्रत्येक छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन से जूझ रहा है। अकेलापन हर वर्ष अंदाजन आठ लाख जिंदगीयों को निगल रहा है। सच कहें तो ये अधूरी समझ और बौद्धिक इमरजेंसी के चिन्ह है। जिन्हें मूर्खता से दूर होना या रहना नहीं आता। वो एसी भूल बार बार करते हैं। युरोप व अमेरिका में इस भूल के करने वालों की संख्या निरंतर बढ रही है। जो बताता है। व्यक्ति मात्र समाज और उस की आफिस के वातावरण से अलग नहीं है। परंतु परिवार से भी अलग है। कुछ उद्योगपतियों ने कुछ समय पहले आफिसों के कार्यकाल बढाने का आग्रह किया था। एक उद्योगपति ने ये कहा कि क्या कर पर रहकर पत्नी का चेहरा देखना ज्यादा जरुरी है? ये बयान ये सोच एक असंवेदनशील व्यक्ति ही रख सकता है। काम के दबाव के कारण युवा पीढ़ी पहले ही की समस्याओं से जूझ रही है। नयी पीढ़ी के मन में पहले ही काफी गुस्सा अधूरी महत्वाकांक्षाओं की पीडा अनचाही परिस्थितियों व संजोगों के कारण है। एसी स्थिति में सिर्फ और सिर्फ सामाजिक जुड़ाव आपसी बातचीत व तालमेल और संवेदनशीलता ही इस समस्या को दूर कर सकते हैं।
कुल मिलाकर परिवार एवं समाज से जुड़ाव बहुत जरुरी है।
ये ता.28-07-2025 के दिन गुजरात समाचार में छट्ठे पन्ने पर छपे तंत्री लेख का अनुवाद है
ये जमीं जिस कदर सजाई गई
जिंदगी की तड़प बढ़ाई गई
साहिर लुधियानवी
साहिर लुधियानवी को बागी शायर कहा जाता है। ये शेर साबित करता है की गलत नहीं कहा है। साहिर ने हिन्दी फिल्मों के लिये अनेक यादगार गीत लिखे हैं। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाजार दिया जैसे गीत उन के मिजाज को लेखनी की धार को अच्छी तरह व्यक्त करते हैं।
उस शेर में भी शायर ने बताया है। उन के विद्रोही मिजाज की धार कितनी तीखी है।
साहिर कहते हैं। आज तक मानव ने जिस तरह से विकास किया है। जो विकास किया है। उसने जीवन को मुश्किल बनाया है। मानव ने विकास के नाम पर भौतिक सुविधाओं में वृद्धि की है। हुआ ये है की मानव ने जिन भौतिक सुख सुविधाओं में बढ़ोतरी की है। उस बढ़ोतरी ने मानव के जीवन को दुविधाएं, शारीरिक व मानसिक समस्याएं पैदा की है। दस मानवों का काम जब एक यंत्र करने लगा तो स्वाभाविक है; नौ मानव बेकार हो गये। इसी बेकारी फिर दूसरी समस्याएं पैदा की है। बेकार आदमी को भी अपना और परिवार का पेट तो भरना है। सही रास्ते से रोजगार ना मिलने पर बेकार इंसान गैरकानूनी, अनैतिक रास्ता अपनाने पर मजबूर हो जाएगा। आपने अपने आसपास के सामाजिक वातावरण में एसे इंसान अवश्य देखे होंगे। जो काम करना चाहते हैं। लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा है; और काम क्यों नहीं मिल रहा है? क्यों कि एक यंत्र दस बीस इंसानों का काम कर रहा है।
ये सच है। जीवन जितना सरल होगा। जीवन में संघर्ष जितना कम होगा। अन्य समस्याएं उतनी ही ज्यादा होगी।
यांत्रिक विकास की नकारात्मक असरों को देखना हो तो; आजकल के बच्चों के शरीर को देख लीजिए। आप को १० में से ३ से ४ बच्चे अन्य बच्चों से मोटे दिख जाएंगे। बच्चों में बढ़ रहे मोटापे के मूल में यांत्रिक विकास है। आजकल बच्चे खेल के मैदान में कितना समय बिताते हैं? बहुत ही कम समय बिताते हैं। ज्यादातर बच्चे शिक्षा के कार्य में व्यस्त रहते हैं। उस से फुरसद मिले तो मोबाइल या कम्प्यूटर गेम लेकर बैठ जाते हैं।
इसी वजह से समाज में चश्मा पहनने वाले व्यक्तियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है।
इंसान ने भौतिक सुख सुविधाओं को विकास का मापदंड मान लिया है। घर में फ्रीज, एयरकंडीशन एवं अन्य आधुनिक उपकरणों का होना विकास का पैमाना माना जाता है। लोग लोन लेकर भी आधुनिक उपकरण बसाते हैं। लोन का चक्कर एक बार शुरु होने के बाद रुकने का नाम नहीं लेता। अब तो परिस्थितियां इतनी बिगड चुकी है। लोन की भरपाई ना कर सकने के कारण पूरे के पूरे परिवार द्वारा सामूहिक आत्महत्या करने की घटनाएं भी घट चुकी है।
ता.11-03-2012 रविवार के दिन गुजराती अखबार जयहिंद में मेरी कॉलम ‘अर्ज करते हैं’ में छपे लेख का
भावानुवाद
आज तेरा व मेरा दुलारा गया जेब से माल सारा का सारा गया जून के गर्म मौसम में था हाल ये “रात काटी गयी दिन गुजारा गया” प्रेम का दौर यूं भी बिता...