अनुदित
मूर्ख मन रूप को छेड़ना मत कभी
ज्योत है शांत है फिर भी वो आग है
भस्म कर देगी ज्वाला बनी वो अगर
उस के मन में धधकता अनुराग है
कुमार अहमदाबादी
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी (अनूदित) अनुवादक - महेश सोनी ये लेख विशेष रुप से उन के लिये है। जिन का जन्म 1960,1961,1963,1964,1965,1966,19...
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