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गुरुवार, फ़रवरी 12

सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

 सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

(अनूदित)

अनुवादक - महेश सोनी 


ये लेख विशेष रुप से उन के लिये है। जिन का जन्म 1960,1961,1963,1964,1965,1966,1967,1968,1969,1970,

1971,1972,1973,1974,1975,1976,1977,1978,1979,1980 में हुआ है। 

ये पीढ़ी 45 की आयु से आगे बढ़कर अब 65-70 यानि आयु के सातवें व आठवें दशक की ओर बढ़ कही है। 


इस पीढ़ी की सब से बड़ी सफलता ये है। इसने जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन देखे हैं;अपनाये भी हैं।


1,2,3,,4,5,10,20,25,50 पैसे के सिक्कों को वित्तीय व्यवहार में देखने वाली ये पीढ़ी बिना हिचकिचाहट मेहमानों से पैसे ले लेती थी।


स्याही, कलम, पेन्सिल, पेन से शुरुआत करने वाली पीढ़ी आज लेपटॉप, कम्प्यूटर का उपयोग भी कुशलता से कर रही है।


जिस पीढ़ी के लिये बचपन में सायकल चलाना भी एक वैभव था। वो पीढ़ी आज स्कूटर, मोटर सायकल,और कार चला रही है।

अच्छे संस्कारों से सिंचित इस पीढ़ी ने कभी चंचल तो कभी गंभीर रहकर बहुत कुछ  ग्रहण किया है, बहुत कुछ भोगा भी है। 


वो भी समय था। जब टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांज़िस्टर अच्छी रइसी के प्रतिक थे।


ये आखिरी पीढ़ी है। जिन का बचपन और गुण पत्रक(मार्क शीट) टेलीविजन के आगमन से बिगडा नहीं।


इस पीढ़ी ने कुकर की रींग्स और पुराने टायर को वाहन समझकर खेलने में कभी शर्मिंदगी का अनुभव नहीं किया।


तीखी नोक वाली लोहे की छोटी सी छडी को जमीन में घोंप कर खेलना भी एक मजेदार खेल था।

 

जिन के लिये “कच्चे आम को तोडना” चोरी नहीं थी।

कोई भी व्यक्ति किसी भी समय किसी के घर के दरवाजे की कुंडी खडका सकता था। उस से किसी को कोई समस्या नहीं होती थी। एसा करना ग़लत भी नहीं माना जाता था।


ये कहने में “मित्र की मम्मी ने खाना खिला दिया” कतई उपकार का भाव नहीं होता था; “उस के पापा ने डांटा” कहने में शिकायती लहजा नहीं होता था। 

कक्षा या पाठशाला में अपनी बहन के साथ मजाक करते हुए सीधा सरल बोलने वाली पीढ़ी।


मित्र अगर दो दिन पाठशाला ना आये तो पाठशाला से छुट्टी होते ही बस्ता लेकर उस के घर पहुंच जाने वाली पीढ़ी।


किसी मित्र से पिता पाठशाला में आ जाए तो –

मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौडते हुए जाकर उसे सूचना देना की

“तेरे पापा आ गये हैं जल्दी चल”

ये उस समय ब्रेकिंग न्यूज़ भी होती थी।


जब मोहल्ले के किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तब अपना काम समझकर आमंत्रण के बिना काम करनेवाली पीढ़ी।


कपिल देव, सुनील गावस्कर, वेंकट राघवन, इरापल्ली प्रसन्ना, स्टेफी ग्राफ और पीट सेम्प्रास, भूपति अगासी के खेल को देखकर आनंदित होनेवाली पीढ़ी।


राज कपूर, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, जितेन्द्र, अमिताभ बच्चन, आमिर, सलमान,शाहरुख, माधुरी दीक्षित इन सब पर फिदा होने वाली पीढ़ी।


पैसे इकट्ठे कर के भाडे पर VCR लाकर एक साथ चार पांच फिल्में देखने वाली पीढ़ी।


असरानी, संजीव कुमार के विनोद पर खिलखिलाकर हंसने वाली,

नाना, ओम पुरी,‌ शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गु दादा, माधुरी, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी 


“शिक्षक से मार खाने” में कुछ भी ग़लत नहीं था। डर इस बात का लगता था कि घर में किसी को मालूम न हो जाए; वर्ना घर में भी जूते पडेंगे।


शिक्षक के सामने आवाज़ व नजर नीची रखने वाली पीढ़ी।


जितनी भी मार खाई हो; दशहरा पर उसे जलाने वाली वाली पीढ़ी; उस समय पढाने वाले शिक्षक व अब सेवा निवृत शिक्षक कहीं मिल जाए तो निःसंकोच नमन करने वाली पीढ़ी।


कॉलेज में छुट्टी ना हो तो यादों में सपने देखने वाली पीढ़ी…..


ना मोबाइल, ना SMS ना What's App

सिर्फ रुबरु मिलने को तत्पर पीढ़ी।


पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुडाया“ सुनकर आंखें नम करने वाली पीढ़ी।


दिपावली के पांचो दिनों का महत्व व कहानी जानने वाली पीढ़ी।


 लिव इन तो दूर, लव मैरिज को भी बहुत बडा साहसिक कदम मानने वाली पीढ़ी।

पाठशाला - कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लडकों को “हिम्मतवाला” मानने वाली पीढ़ी।


आज आंख बंद कर के……

वही दस, बीस….अस्सी, नब्बे….वही सुनहरी स्मृतियां 

उभर आती है।


बीता कल वापस नहीं आता, लेकिन स्मृतियां हमेशा साथ रहती है।

वो नासमझ पीढ़ी इतनी समझदार थी–

वो जानती थी आज के पल कल स्वर्णिम स्मृतियां बनेंगे।


हमारा भी एक जमाना था…..

तब प्ले स्कूल वगैरह कुछ नहीं था।

6-7 वर्ष के होने पर सीधे पाठशाला में दाखिला होता था।

हम पाठशाला ना जाएं तो भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

सायकल या सीटी बस से आवागमन करते थे।

माता पिता को ये डर नहीं सताता था। बच्चे को अकेला भेजेंगे तो कोई अनहोनी हो जाएगी।


उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण सब चलता था।

परसेन्टज (%) से कोई सीधा लगाव नहीं था।


ट्युशन जाना शरम की बात मानी जाती थी। ट्युशन जाने वाले को “डिब्बा” माना जाता था।

हम किताबों में कापियो में मोर पंख रखते। हम सोचते थे; बल्कि दृढ विश्वास था: एसा करने से हम तेजस्वी विद्यार्थी हो जाएंगे।

कपड़े की थेली में किताबों को रखना।

टीन की पेटी में किताबों को करीने से जमाना हमारी सृजनात्मक सूझ बूझ थी।


हर वर्ष नयी कक्षा में किताबों व कापियों पर खाखी या पुराने अखबार का जिल्द चढाना हमारे लिये वार्षिक उत्सव सा होता था

वर्ष पूरा होने पर पुरानी किताबें बेचनी और नयी जो की वैसे तो पुरानी(यू नो, सेकंड हेन्ड) किताबें खरीदने में हमने कभी भी ग्लानि का अनुभव नहीं किया। 

मित्र की साइकिल के डंडे पर एक और दूसरे को कैरियर पर बैठकर घूमने में क्या लुत्फ आता था। उसे हमारी पीढ़ी ही जानती है। 


पाठशाला में मास्टर जी से मार खाना,

पैर के अंगूठे को पकड़कर खड़ा रहना,

कान खिंच कर लाल हो जाने पर भी कभी भी हमारा ‘इगो” हर्ट नहीं होता था।


दरअसल यह हमें मालूम ही नहीं था। इगो किस चिड़िया का नाम है।

मार खाना तो रोजमर्रा की घटना थी।

मार खाने वाला और मारने वाला दोनों खुश हो जाते थे।

मार खाने वाला इसलिये खुश होता था की “आज कल से कम मार पडा है”  जब की मारने वाला इसलिये खुश होता था की “आज फिर हाथ साफ करने का अवसर प्राप्त हो गया।”

लकड़ी का बैट लेकर नंगे पैर किसी भी गेंद से गलियों में क्रिकेट खेलना सब से बडा सुख था, आनंद था।


हमने कभी भी पॉकेट मनी नहीं मांगी थी; ना ही माता पिता ने कभी दी थी।

हमारी जरुरतें बहुत सीमित थी।

जिसे परिवार पूरा कर देता था।


छह सात महीने में एक बार अगर कुछ चटपटा या नमकीन खाने को मिल जाता तो-

हमारी खुशी छलकने लगती थी।


दिपावली के दिन रंगबिरंगी फूलझडियां जलाकर हमे जो आनंद मिलता था। वो अवर्णनीय है।

नन्हें नन्हें बमों के गुच्छे से एक एक बन के अलग करने के बाद उन्हें एक के बाद एक जलाने में जो सुख मिलता था। उस के बारे में क्या लिखूं! वो मौज अदभुत थी। 


हमने कभी अपने माता-पिता से ये नहीं कहा कि “हम आप से बहुत प्रेम करते हैं”–

क्यों कि हमने कभी “I Love You” कहना या बोलना सीखा ही नहीं।



संघर्ष करते करते आज हम दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं।

कुछ लोगों ने वो प्राप्त कर लिया है। जिसे वे प्राप्त करना चाहते थे।

कुछ आज भी संघर्ष कर रहे हैं– “क्या मालूम….”


पाठशाला के बाहर छत्ते वाले के ठेले पर मित्रों की मेहरबानी से जो मिलता था–

वो कहां खो गया?


हम विश्व के किसी भी कोने में हों,

लेकिन सत्य ये है कि–

हम वास्तविक जीवन जीकर बड़े हुए हैं।

हमने हमेशा यही सोचा है

“वस्त्रों में व संबंधों में कभी भी सिलवट नहीं रहनी चाहिये”


“संबंधों में औपचारिकता रहनी चाहिये” 


जो हमें कभी नहीं आया। 


हमें मालूम ही नहीं था कि सब्जी रोटी बिना भी नाश्ते का डिब्बा हो सकता है।


हमने कभी भी हमारे नसीब को दोष नहीं दिया। 

हम आज भी सपने में जी सकते हैं।

शायद वो सपने ही हमें जीवन के लिये उर्जा प्रदान करते हैं।

हमारे जीवन की वर्तमान के साथ तुलना हो ही नहीं सकती।


हम अच्छे हैं या खराब–

लेकिन हमारा भी एक जमाना था।

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