कोर जिस की फट गयी
उस की कीमत घट गयी
थी बहुत काली मगर
रात आखिर कट गयी
विघ्न क्यों बनती मैं सो
रास्ते से हट गयी
साथ देने के लिये
मोरचे पर डट गयी
मैं गयी ना साथ पर
साथ मेरी लट गयी
आज तक पूछा नहीं
बात से क्यों नट गयी
जब पटाया प्रेम से
मुस्कुराकर पट गयी
देखते ही देखते
चंद सांसे घट गयी
छोड दे आलस “कुमार”
जाग जा पौ फट गयी
कुमार अहमदाबादी
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