अनुवादक - महेश सोनी
🧡 ढल रही संध्या के समय आकाश का सौंदर्य अपने शिखर पर होता है।
तो फिर….
हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है…?🧡
🧡 अधूरे सपने पूरे करने की आशा इसी दौर में जगती है तो फिर हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है?
🧡 जिम्मेदारीयों से मुक्त होकर स्वयं से मिलने की प्यास जगती है
तो फिर…….
हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है…….? 🧡
🧡 अंधियारी रात को,
पूनम के चांद की रोशनी कितना रोशन कर रही है।
आयु के इस पड़ाव पर जिंदगी के अनुभवों से समझ का एक एहसास जगता है।
तो फिर……
हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है
🧡 सुख दुःख दोनों जीवन के सनातन व अकाट्य सत्य है।🧡
उन्हें एक बार एक किनारे पर रखकर जिंदगी को जीकर देखो….
फिर देखिएगा
🧡 ज़िंदगी कितनी विशेष लगती है।….....!!!
🧡तन का थक जाना नियती है…
मगर, मन से मत थकना
दोस्त….
फिर देख लेना.....…
ढलती आयु की
थकान लगती भी है या नहीं..🧡
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