Translate

शुक्रवार, जनवरी 2

आवारा से लेकर धुरंधर तक


इन दिनों धुरंधर मूवी के कारण खासी हलचल मची हुई है। मोदी विरोधी लॉबी विशेष रुप से इसे सरकार की प्रोपेगंडा मूवी यानि सरकारी नीतियों को सही बताने वाली मूवी बता रही है। जब की ये मूवी वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। चालीस वर्ष से ज्यादा की आयु वाले लोगों को सब घटनाएं अच्छी तरह याद होगी। 

अब मुख्य मुद्दा लिखता हूं। 

हां, चलो मान लेते हैं। ये मूवी सरकार की नीतियों पर आधारित है। क्या इस से पहले कभी सरकार की नीतियों पर आधारित मूवी बनी नहीं है? सरकार की नीतियों के विरोध और समर्थन में कई मूवियां बनी है। स्वतंत्रता से पहले से ये हो रहा है। लगभग वर्ष 1943 में बनी किस्मत मूवी में अंग्रेजी शासन का विरोध था

 उस मूवी का गीत “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है” बहुत लोकप्रिय हुआ था। वो गीत इतना लोकप्रिय हुआ था कि किस्मत मूवी कोलकाता के थिएटर में साढे तीन या चार वर्ष चली थी।


ये कौन जानता नहीं आवारा और श्री 420 कम्युनिस्ट सोवियत संघ और सरकार की नीतियों से प्रभावित थी।

1966-67 या 1967-68 में मनोज कुमार ने लाल बहादुर शास्त्री जी के नारे जय जवान जय किसान पर आधारित उपकार मूवी बनाई थी। उसी मनोज कुमार ने लगभग 1973-74 में सरकारी नीतियों के विरोध में रोटी कपडा और मकान बनाई थी। वर्ष 1975-76 या 1976-77 में ए निर्माता (लगभग अमृत नाहटा) ने किस्सा कुर्सी का मूवी बनाई थी। नाहटा ने ये मूवी या तो शायद दो बार बनाई थी; क्यों कि एक बार संजय गांधी के कार्यकर्ताओं द्वारा मूवी के सारे प्रिन्ट जला दिए गए थे। उस मूवी में शबाना आज़मी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 

तो, 

एसा नही है की ये पहली मूवी है। जो सरकारी नीतियों पर है। तो फिर इस का इतना विरोध क्यों? वो इसलिए की ये मूवी एसे समय खंड यानि एसे दौर में बनी है। जब सोश्यल मिडीया बहुत शक्तिशाली है। जब एक लोकप्रिय नेता देश का प्रधानमंत्री है। एसा प्रधानमंत्री जो किसी के दबाव में नहीं आता। विपक्ष लाख कोशिशों के बाद भी चुनावों और रणनीतिक तौर पर प्रधानमंत्री को पराजित करने में सफल नहीं हो रहा है। 

एसे में विपक्ष से जुडा हर व्यक्ति सरकार की प्रत्येक नीती का विरोध कर के अपनी उतार रहा है। 

कुमार अहमदाबादी 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

बब्बर शेर(अनुदित)

  अनुवादक - महेश सोनी  दो नवयुवतियां सूर्योदय के समय मस्तक पर घडे रखकर जंगल की पगदंडी पर चली जा रही थी। कैसा अनुपम सौंदर्य…. पतली पतली उंगलि...