शायरों के भाव मंथन से जनमती है ग़ज़ल
रागिणी का साथ मिलने पर थिरकती है ग़ज़ल
तृप्त जब होती है शायर की अधूरी आरज़ू
कल्पनाओं के क्षितिज पर तब उभरती है ग़ज़ल
मेनका मदमस्त होकर नृत्य जब करती है तब
उस की हर मुद्रा से टप टप टप टपकती है ग़ज़ल
काव्य के आकाश में लाखों सितारे हैं मगर
काव्य-नभ में ध्रुव सितारे सी चमकती है ग़ज़ल
अर्क छिड़के कागज़ों पर जब लिखी जाती है ये
कल्पना कहती है पुष्पों सी महकती है ग़ज़ल
शौक है इस को भी सजने का संवरने का ‘कुमार’
प्रास अलंकारों से नित सिंगार करती है ग़ज़ल
कुमार अहमदाबादी
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