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शनिवार, जनवरी 31

अद्वितीय रामभद्राचार्य (अनुदित)

दुनिया उन को अंधा कहती है

अभी माघ मेले में दो करोड़ की कार में घूमने वाले बकरा कट दाढ़ीवाले शंकराचार्य ने पूज्य रामभद्राचार्य के बारे में अभद्र टिप्पणी की है। इस नालायक को सपा+खांग्रेस(मुस्लिम लीग) ने 2027 के चुनावों के लिए किराए पर रखा है। (सुप्रीम कोर्ट का अभ्यास करना))📚 


मगर सत्य ये की उन्होंने जो देखा है उसे आंखों वाले भी नहीं देख सकते।

आज वे 75 वर्ष के है

जन्म से अंध

लेकिन उन के ज्ञान के सूर्य की रोशनी अद्वितीय है।

उन का नाम है—

जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य


बचपन से ही उन का जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं रहा है


पाठशाला में किसी भी कक्षा में 99 प्रतिशत से कम गुण नहीं आये


दुनिया उन को अंध कहती थी। लेकिन‌ वे शास्त्रों से रोशनी प्राप्त करते रहे।

 

230 से ज्यादा किताबें


संस्कृत, वेद, रामायण, दर्शन शास्त्र, व्याकरण प्रत्येक क्षेत्र में हस्ताक्षर किये।


कई युनिवर्सिटीयों ने उन्हें महामहोपाध्याय एवं जगद्गुरु की पदवीयां प्रदान की।

परंतु इतिहास उन्हें श्री राम जन्मभूमि केस के लिये याद रखेगा।


जब एक संत अदालत में खडे थे।


इलाहाबाद हाईकोर्ट


तीन सौ वकीलों से भरी हुई अदालत


दलीलें, कोलाहल, राजनीति और अविश्वास से भरा हुआ वातावरण


और बीच मे खडे -


एक अंध संत


उन्हें पूछा गया “क्या रामचरितमानस में राम के जन्म स्थान का कोई उल्लेख है?


उन्होंने एक भी पल हिचकिचाए बिना तुलसीदास जी का दोहा पढा।

*तुरंत दूसरा आक्रमण हुआ-*

“क्या वेदों में कोई साक्ष्य है। जो ये सिद्ध कर की श्री राम का जन्म यहां हुआ था”


इस बार उत्तर और भी गहन था।


उन्होंने कहा, “अथर्व वेद, दसवें अध्याय के इकत्तीसवें मंत्र में स्पष्ट रुप से उल्लेख है”


अदालत स्तब्ध हो गयी

उस के बाद न्यायाधीशों की बेंच में से-

जिस में एक मुस्लिम न्यायाधीश भी थे - का वो ऐतिहासिक निवेदन आया।


साहब, आप एक दिव्य आत्मा हो


सुबूत के 441 टुकड़े


अदालत ने उन में से 437 को मान्य रखा


कल्पना कीजिए–


दुनिया जिसे अंध कहती है।


वो भारत के सब से ज्यादा विवादास्पद इतिहास को सुबूतों को साथ देख रहे थे



एक बार जाने कौन से राजनीतिक लाभ के लिये ये कदम भी उठाया गया था


जब एक राजनीतिक सौगंध पत्र में कहा गया कि,


“राम का जन्म हुआ ही नहीं था”


तब ये संत ने मुंह पर ताला लगा लिया था


उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखा—और सिर्फ एक वाक्य ने सब को मौन कर दिया था।


“आप के गुरु ग्रंथ साहिब में,


राम नाम का 5600 बार उल्लेख हुआ है।


ये तर्क नहीं था


ये सांस्कृतिक स्मृति थी


क्या वे सचमुच अंध हैं?


प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने एक बार उन से कहा था “मैं आप के उपचार और दर्शन की व्यवस्था कर सकती हूं।


संत ने हंसकर कहा था “मैं इस दुनिया को नहीं देखना चाहता”


एक बार उन्होंने कहा था “मैं अंध नहीं हूं”


मैंने अंध होने का कभी भी लाभ नहीं लिया है


मैं भगवान श्री राम को बहुत नजदीक से देखता हूं


उसी क्षण उन के मन में एक बात घर कर गयी


आंखों से देखना और दर्शन करना दो अलग अलग घटनाएं हैं


सनातन की जीती जागती मशाल


एसे संत शास्त्रों में नहीं, वास्तव में और ऐतिहासिक काल में जन्म लेते हैं। इन का अस्तित्व चमत्कार करने के लिये नहीं; बल्कि सभ्यता को दर्पन दिखाने के लिये होता है।

आज अगर सनातन संस्कृति सांस ले रही है, जीवंत है तो एसे मौन तपस्वीओं के कारण सांस ले रही है, जीवंत है।

उन्हें अंध कहना हमारे अंधत्व को दर्शाता है।

एसे संतों को वंदन

एसी चेतना को वंदन


जय श्री राम 🚩🙏

अनुवादक - कुमार अहमदाबादी 

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