परिवार तोडिये बाज़ार बनाइये
आप को इस का रतीभर भी एहसास नहीं है कि कौन हम सब को कठपुतली की नचा रहा है।
1)
जब विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं तब होशियार विद्यार्थी को मल्टीनेशनल कंपनी तुरंत बडे पैकेज के साथ नौकरी दे देती है..! साथ ही साथ उस का तबादला होता रहता है। विदेश जाना भी होता है।
2)
विश्व सुंदरी के पुरस्कार द्वारा प्रचार + फिल्मों के माध्यम से + फिटनेस का उन्माद एवं विज्ञापन द्वारा श्रंगार बाजार का निर्माण कर के उस की तरफ चुंबक सा खिंचाव पैदा जाता है।
3)
प्रत्येक व्यक्ति के पास मोबाइल+ वाहन =एक बड़ा बाजार
4)
ब्रांडेड उपकरण को एक आकर्षण पैदा कर के आप के सामने ऑनलाइन सस्ते दामों का लालच देकर परोसा जाता है।
5)
प्राइवेसी शादीशुदा जोडों का अधिकार है; कहकर पारिवारिक वातावरण को दूषित किया जाता है। लेकिन लोग ये नहीं समझ सकते की ये संयुक्त परिवार को खंडित करने का षडयंत्र है।
6)
हम दो हमारे दो…जैसी भावना में बहकर और देर से शादी करने के चक्रव्यूह में फंसा हिन्दू भविष्य के 100 वर्ष बाद के हिन्दूओं के लिये गुलामी का प्रबंध कर रहा है।
7)
बच्चों को सात्विक लड्डू + घर का भोजन + घरेलू मिठाइयों से दूर करने वाले विज्ञापन + सोशियल मिडिया की रील से युवा पीढी को वैचारिक दृष्टिकोण से कमजोर किया जा रहा है।
8)
टुरिज्म के क्षेत्र में परोक्ष रुप से भारतीय त्यौहारों के प्रति उदासीनता निरसता फैलाकर संस्कृति से दूर करने का षडयंत्र कितने लोगों को समझ में आ रहा है।
9)
वातानुकूलित(एयर कंडीशंड) ऑफिस की लालच ने नौजवानों को परावलंबी(दूसरों पर निर्भर) कर दिया है। नौकरी कर के प्राइवेट बैंक से लोन लेकर वैभवशाली जीवन जीने की मानसिकता के फलस्वरूप विदेशी बाजारों ने भारतीयों को घेर लिया है; बल्कि कहना चाहिए जकड़ लिया है।
10)
स्वदेशी उपकरण + स्वदेशी सामग्री को तुच्छ माना जाता है। जब की विदेशी उपकरण + सामग्री को श्रेष्ठ माना जाता है। जब की इस अवधारणा ये सोच से भारतीय कौशल + स्वावलंबी + आत्मनिर्भरता से विपरीत आचरण किया जा रहा है।
11)
सतीत्व + पवित्रता + प्रामाणिकता को तिलांजली देकर लिव इन रिलेशन वाला समाज हमारे बन रहा है। अनैतिक संबंध, अन्यत्र संबंध मनोरंजन के किसी प्रकार की नैतिक सोच से हटकर बन रहे हैं।
एसे अनेक शकुनि की चाल जैसे पासे हमारी सभ्यता, संस्कृति, संस्कारों के नष्ट करने के लिये फेंके गये हैं; और आज भी फेंके जा रहे हैं। जिन का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, सभ्यता को जडों सहित उखाडने का है। ये विदेशी शक्तियों द्वारा भारतीयों को मानसिक + सामाजिक रुप से विकलांग व गुलाम बनाने की एसी रणनीति है। जो 99.99 प्रतिशत हिन्दूओं को समझ में नहीं आ रही है। एसा नहीं है की मैं ये षडयंत्र समझ सका हूं इसलिए मैं ही विद्वान हूं। प्रत्येक व्यक्ति ये समझता है लेकिन स्वीकार नहीं करता। स्वयं को आधुनिक विचारधारा वाला मानते हैं। मेरे जैसों को संकीर्ण मानसिकता + गंवार + अज्ञानी आदि आदि मानते हैं; एवं स्वयं बाजार का प्यादा बनकर गर्वान्वित महसूस करते हैं।
अब ये हम सब को यानि आप को मुझ को इस को उस को सब को मिलकर विचार + विमर्श + विवेक से ये तय करना है। भारत के भविष्य को बाज़ार का खिलौना बनने से कैसे रोका जाए? मैं शत प्रतिशत विश्वास से कह सकता हूं। एक एक भारतीय की यही इच्छा व राय होगी। भारत के भविष्य के बाजार को विदेशी हाथों का खिलौना बनने से रोकना है।
जय श्री कृष्णा
भारत माता की जय
वंदे मातरम्….
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