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शनिवार, नवंबर 10

ध्यान से(ग़ज़ल)

जो कहूँ वो बात सुनना ध्यान से।
बात कहना चाहता हूँ शान से॥

जो न बहके, साथ मेरे तू सनम।
फायदा क्या नैन मदिरा पान से॥

फूल से, माली को डरता देखकर।
आस क्या हो? आज की संतान से ॥

क़त्ल करके आदमी को आदमी।
फिर समाधि स्थल बनाता शान से॥

लूट के सौ आदमी, दे दान फिर।
मूछ देती ताव खुद पर शान से॥

शब्द टेढ़े हैं कटारी धारदार।
लाएँ न बाहर कटारी म्यान से॥

भूल छोटी सी बिगाड़े काम को।
माप ले के चीर फाड़ो थान से॥

फूल पे लाई जवानी वो बाहर।
रूप सारा झांकता परिधान से॥

गम न करना गर कभी जो भूल हो।
गलतियाँ होती यहाँ सुल्तान से॥

बारहा हो राज भटका वो 'कुमार'।
खोजता है रह फिर जी जान से॥
 कुमार अहमदाबादी

गुरुवार, नवंबर 8

सितारा

चाँद से टपककर रेत के कणों से कराती है चाँदनी
कणों से टकराकर दो आँखों में समाती है चाँदनी
नजारा तब रेत का बहुत प्यारा लगता है
एक एक कण रेत का सितारा लगता है
कुमार अमदावादी

मंथन

(1) सागर मंथन मोती देता
मंथन मन का विचार
(2) मंथन ईतना काहे करना
जीना जब दिन चार
(1)धरा का मंथन धान देता
मंथन नभ का विहार
(2) मंथन चाहे जितना कर लो
बस में नहीं कुछ यार

(1)भाव मंथन कविता देता
मंथन कला सिंगार
(2)मंथन में जो डूब जाता
कभी न पाता करार

(1)मंथन पल का सदियाँ देता
मंथन घर की बहार
मंथन जीवन चिंतन है
मंथन से ना बचना यार

(2) सागर मंथन विष भी देता
मंथन बस में रखना यार
मंथन चिंतन हो न हो पर
होती नैया गंगा पार
कुमार अमदावादी
दो पात्रों के बीच की चर्चा को काव्य रुप देने का प्रयास किया है।

उपवन का डर

खाद नहीं खून से सींचा, रिश्ता क्या वो अब टूटेगा?
नए रिश्ते में बँधने से क्या? साथी मेरा अब छुटेगा!!!

साथ जिस का पाकर मैंने, जिंदगी के रस को जाना।
जीवनभर के साथ का; वादा क्या वो अब टूटेगा?

नभ से तारे टूटेंगे व चाँद भी गुम हो जाएगा।
सूरज भी तब बुझ जाएगा; चाँद मेरा जब रुठेगा॥

माना वो भी लाठी है, गुलशन के दो माली की।
फ़र्ज़ अपना वो निभाएँ; हक मेरा ना पर छुटेगा॥

डर डर के ये सोचती हूँ, हाँ कहूँ या ना कहूँ मैं।
बाग अपना तू खिला पर; 'उपवन' से क्या तू रुठेगा?

जिंदगी की जं..ग में, हर पल जिस ने साथ दिया।
खास मोर्..चे पे आके, साथ क्या वो अब छुटेगा?

चाहे जो भी हो ए दोस्त; वादा मेरा तुज से है:
मनमंदिर में तू ही रहेगा, साथ तो तन का छुटेगा॥

जब जरुरत हो मेरी तू: याद मुज को कर लेना।
आउँगी मैं बन के हवा; जग सारा पीछे छुटेगा॥
कुमार अहमदाबादी 

नाकाम जीवन

सफर में हो गया मैं अकेला।
पथ में ठोकर खाने के बाद॥
देह को अब चिता चाहिये।
नाकाम जीवन जीने के बाद॥

खुद से मैं जुदा हो जाता हूँ।
दो घूंट ज़हर पीने के बाद॥
ज़हर से ही मिलेगी मंजिल।
नाकाम जीवन जीने के बाद॥

सच है कि किस्मत खराब है।
स्वीकार है दर्द सहने के बाद॥
सफ़र की तैयारी कर लूँ अब।
नाकाम जीवन जीने के बाद॥

कुछ नहीं कहना अब मुझे।
दिल के छाले फोडने के बाद॥
दुआ चाहिये सफर के लिये।
नाकाम जीवन जीने के बाद॥

किसी से नहीं कोई शिकायत।
अलविदा कह देने के बाद॥
उठाओ यारोँ अर्थी 'कुमार' की।
नाकाम जीवन जीने के बाद॥
कुमार अमदावादी

ईतिहास के छाले

ईस शहर में जीने के अंदाज निराले हैं।
होठोँ पे लतीफे हैं आवाज में छाले हैं॥

एक दो राहे पर यहाँ के जीनेवाले हैं।
दिल में राज है और होठोँ पे ताले हैं॥

त्रिशूल और तारा चल रहें चालें हैं।
जुबाँ पे शहद है विचारों में भाले हैं॥

ईस देश की राजनीती के जो साले हैं।
वोट के पक्के हैं शासन में बेताले हैं॥

जिंदादिली से जीते कुछ एसे जियाले हैं।
भरे दिखते पर खाली जिन के प्याले हैं॥

मेरे वतन के सच्चे जो रखवाले हैँ।
मन में लगन हैं पर पड़ गये ठाले हैं॥

'कुमार' ईलाज है? ये ईतिहास के छाले हैं।
कुछ फूट चुके हैं कुछ फूटनेवाले हैं॥
कुमार अहमदाबादी 

माँ की वेदना

रंग लाया है आज वो बारुद
तुमने जो मेरे सीने में उतारा था।
प्रयोग जिस पे तुमने किये और
सहे जिसने दिल वो हमारा था॥

क्या तुम जानते हो ये हकीकत?
विस्फोट चाहे वो तुम्हारा था।
आग मेरे तन में उतरी थी जब
तुमने 'विज्ञान' को निखारा था॥


न जाने कितने घाव दिये उस
बेटे ने जो सब से दुलारा था।
माँ हूँ ना कई बार किया मैंने
विनाश की ओर ईशारा था॥

मगर हर बार हाँ हर बार
ईतिहास को बेटों ने नकारा था।
ईसीलिये अब भुगतोगे बारहा
सुनामी तो एक छोटा सा नजारा था॥

जैसी करनी वैसी भरनी
घाव बोने का काम तुम्हारा था।
काटनी पड़ेगी वही फ़सल
जैसा खेत तुमने संवारा था॥
कुमार अहमदाबादी   

स्वयं को तुम बदलना सीख लो (मुक्तक)

स्वयं को तुम बदलना सीख लो नये ढांचो में ढलना सीख लो यही सब से बड़ा गुण है “कुमार” समय के साथ चलना सीख लो कुमार अहमदाबादी