बाँहों में आकर प्यास बहक जाती है
ज्यों आग हो चूल्हे की दहक जाती है
फिर प्रेम की गंगा में निरंतर बहकर
संतृप्त निशा रानी महक जाती है
कुमार अहमदाबादी
संतृप्त मतलब तृप्त, जिस की प्यास मिट गयी है, जो तृप्त हो गया हो
साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
n t s o o S e p d 3 9 Shared with On मेरा नाम महेश सोनी है। गुजराती माध्यम में कक्षा 11 तक शिक्षा प्राप्त की है। जडतर ज्वैलरी का कलाकार था...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें