साहित्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जहां जीवन की खट्टी मीठी तीखी फीकी सारी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पेश किया जाता है। भावनाओं को सुंदर मनमोहक मन लुभावन शब्दों में पिरोकर पेश करने के लिये लेखक के पास कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। दूसरी तरफ रचना पढ़कर उस का रसास्वादन करने के लिये पाठक के पास भी कल्पना शक्ति होनी जरुरी है। इसीलिये मैंने ब्लॉग का नाम कल्पना लोक रखा है।
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बुधवार, फ़रवरी 18
फाफडा क्या चीज है (ग़ज़ल)
शुक्रवार, फ़रवरी 13
बेटी….
अनुवादक – महेश सोनी
१.विवाह के समय सब व्यस्त होते हैं। बेटी की मनःस्थिति के बारे में किसी को मालूम नहीं होता।
३.आमंत्रण पत्रिका में अपने नाम के बाद ब्रेकेट में लिखे नाम को देखकर सोचती है। आज आखिरी बार मेरे नाम से बाद पिता का नाम लिखा गया है। आज के बाद न सिर्फ नाम बल्कि पहचान व वातावरण आदि सब \ बदल जाएंगे।
३.कल तक जो जिद कर के भी अपनी बात मनवाती थी। आज वो इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख जाती है।
४.बेटी किसी से कुछ भी कहना नहीं चाहती। ससुराल से पीहर आने पर अपने पुराने गिलास में पहले मटकी में से पानी लेकर पीती है। उसे घर के किसी कोने में अपना बचपन मिल जाता है। वो आज भी पापा की उंगली पकड़कर घूमना चाहती है। झूले में बैठ कर झूला झूलते हुए साउंट सिस्टम पर उंची आवाज में मनपसंद गीत सुनना चाहती है। लेकिन, अब वो बेटी होने के साथ साथ किसी की पत्नी भी है। कर तक जो जिद कर के भी अपनी अपनी इच्छाएं पूरी करवाती थी। वो इच्छाओं को नियंत्रित कर लेती है। वो अब किसी को कुछ कहना नहीं चाहती।
५. आंसूओ को लीटर या किसी और तरह से नहीं मापा जा सकता है। नन्हीं नन्हीं हथेलियों से पापा को मनाकर फरमाइश करने के दिन गुजरे कल की बात हो जाती है। जितना कठिन बेटी के लिये अपने ही घर में मेहमान बनकर आना होता है। उतना ही कठिन पिता के लिये बेटी को मेहमान के रुप में देखना होता है।
६.बेटा चाहे कितना भी थककर घर आया हो; वो चाहे जितना बड़ा हो जाए पिता ये सोचकर की वो कर फिर से सो जाएगा; आधी रात को भी उसे जगा कर कोई काम सौंप सकता है। लेकिन अगर बेटी सोई होगी तो पिता उसे जगाने की हिम्मत नहीं करता। बेटे की शादी करते समय बाप पुनः जवान हो जाता है। जब की बेटी की शादी के बाद वो उम्र से ज्यादा बूढा हो जाता है।
बेटी की शादी मतलब नदी को नववधू बनाने के पल…!
(फेसबुक मित्र सिम्मी शाह के पटल पर पढा था। स्मृतियों से भंडार में सहेज कर रखा था। आज सामने आया तो अनुवाद कर के पेश कर दिया।)
गुरुवार, फ़रवरी 12
सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी
सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी
(अनूदित)
अनुवादक - महेश सोनी
ये लेख विशेष रुप से उन के लिये है। जिन का जन्म 1960,1961,1963,1964,1965,1966,1967,1968,1969,1970,
1971,1972,1973,1974,1975,1976,1977,1978,1979,1980 में हुआ है।
ये पीढ़ी 45 की आयु से आगे बढ़कर अब 65-70 यानि आयु के सातवें व आठवें दशक की ओर बढ़ कही है।
इस पीढ़ी की सब से बड़ी सफलता ये है। इसने जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन देखे हैं;अपनाये भी हैं।
1,2,3,,4,5,10,20,25,50 पैसे के सिक्कों को वित्तीय व्यवहार में देखने वाली ये पीढ़ी बिना हिचकिचाहट मेहमानों से पैसे ले लेती थी।
स्याही, कलम, पेन्सिल, पेन से शुरुआत करने वाली पीढ़ी आज लेपटॉप, कम्प्यूटर, टेबलेट का उपयोग भी कुशलता से कर रही है।
जिस पीढ़ी के लिये बचपन में सायकल चलाना भी एक वैभव था। वो पीढ़ी आज स्कूटर, मोटर सायकल,और कार चला रही है।
अच्छे संस्कारों से सिंचित इस पीढ़ी ने कभी चंचल तो कभी गंभीर रहकर बहुत कुछ ग्रहण किया है, बहुत कुछ भोगा भी है।
वो भी समय था। जब टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांज़िस्टर अच्छी रइसी के प्रतिक थे।
ये आखिरी पीढ़ी है। जिन का बचपन और गुण पत्रक(मार्क शीट) टेलीविजन के आगमन से बिगडा नहीं।
इस पीढ़ी ने कुकर की रींग्स और पुराने टायर को वाहन समझकर खेलने में कभी शर्मिंदगी का अनुभव नहीं किया।
तीखी नोक वाली लोहे की छोटी सी छडी को जमीन में घोंप कर खेलना भी एक मजेदार खेल था।
जिन के लिये “कच्चे आम को तोडना” चोरी नहीं थी।
कोई भी व्यक्ति किसी भी समय किसी के घर के दरवाजे की कुंडी खडका सकता था। उस से किसी को कोई समस्या नहीं होती थी। एसा करना ग़लत भी नहीं माना जाता था।
ये कहने में “मित्र की मम्मी ने खाना खिला दिया” कतई उपकार का भाव नहीं होता था; “उस के पापा ने डांटा” कहने में शिकायती लहजा नहीं होता था।
कक्षा या पाठशाला में अपनी बहन के साथ मजाक करते हुए सीधा सरल बोलने वाली पीढ़ी।
मित्र अगर दो दिन पाठशाला ना आये तो पाठशाला से छुट्टी होते ही बस्ता लेकर उस के घर पहुंच जाने वाली पीढ़ी।
किसी मित्र से पिता पाठशाला में आ जाए तो –
मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौडते हुए जाकर उसे सूचना देना की
“तेरे पापा आ गये हैं जल्दी चल”
ये उस समय ब्रेकिंग न्यूज़ भी होती थी।
जब मोहल्ले के किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तब अपना काम समझकर आमंत्रण के बिना काम करनेवाली पीढ़ी।
कपिल देव, सुनील गावस्कर, वेंकट राघवन, इरापल्ली प्रसन्ना, स्टेफी ग्राफ और पीट सेम्प्रास, भूपति अगासी के खेल को देखकर आनंदित होनेवाली पीढ़ी।
राज कपूर, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, जितेन्द्र, अमिताभ बच्चन, आमिर, सलमान,शाहरुख, माधुरी दीक्षित इन सब पर फिदा होने वाली पीढ़ी।
पैसे इकट्ठे कर के भाडे पर VCR लाकर एक साथ चार पांच फिल्में देखने वाली पीढ़ी।
असरानी, संजीव कुमार के विनोद पर खिलखिलाकर हंसने वाली,
नाना, ओम पुरी, शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गु दादा, माधुरी, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी
“शिक्षक से मार खाने” में कुछ भी ग़लत नहीं था। डर इस बात का लगता था कि घर में किसी को मालूम न हो जाए; वर्ना घर में भी जूते पडेंगे।
शिक्षक के सामने आवाज़ व नजर नीची रखने वाली पीढ़ी।
जितनी भी मार खाई हो; दशहरा पर उसे जलाने वाली वाली पीढ़ी; उस समय पढाने वाले शिक्षक व अब सेवा निवृत शिक्षक कहीं मिल जाए तो निःसंकोच नमन करने वाली पीढ़ी।
कॉलेज में छुट्टी ना हो तो यादों में सपने देखने वाली पीढ़ी…..
ना मोबाइल, ना SMS ना What's App
सिर्फ रुबरु मिलने को तत्पर पीढ़ी।
पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुडाया“ सुनकर आंखें नम करने वाली पीढ़ी।
दिपावली के पांचो दिनों का महत्व व कहानी जानने वाली पीढ़ी।
लिव इन तो दूर, लव मैरिज को भी बहुत बडा साहसिक कदम मानने वाली पीढ़ी।
पाठशाला - कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लडकों को “हिम्मतवाला” मानने वाली पीढ़ी।
आज आंख बंद कर के……
वही दस, बीस….अस्सी, नब्बे….वही सुनहरी स्मृतियां
उभर आती है।
बीता कल वापस नहीं आता, लेकिन स्मृतियां हमेशा साथ रहती है।
वो नासमझ पीढ़ी इतनी समझदार थी–
वो जानती थी आज के पल कल स्वर्णिम स्मृतियां बनेंगे।
हमारा भी एक जमाना था…..
तब प्ले स्कूल वगैरह कुछ नहीं था।
6-7 वर्ष के होने पर सीधे पाठशाला में दाखिला होता था।
हम पाठशाला ना जाएं तो भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।
सायकल या सीटी बस से आवागमन करते थे।
माता पिता को ये डर नहीं सताता था। बच्चे को अकेला भेजेंगे तो कोई अनहोनी हो जाएगी।
उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण सब चलता था।
परसेन्टज (%) से कोई सीधा लगाव नहीं था।
ट्युशन जाना शरम की बात मानी जाती थी। ट्युशन जाने वाले को “डिब्बा” माना जाता था।
हम किताबों में कापियो में मोर पंख रखते। हम सोचते थे; बल्कि दृढ विश्वास था: एसा करने से हम तेजस्वी विद्यार्थी हो जाएंगे।
–
कपड़े की थेली में किताबों को रखना।
टीन की पेटी में किताबों को करीने से जमाना हमारी सृजनात्मक सूझ बूझ थी।
हर वर्ष नयी कक्षा में किताबों व कापियों पर खाखी या पुराने अखबार का जिल्द चढाना हमारे लिये वार्षिक उत्सव सा होता था
वर्ष पूरा होने पर पुरानी किताबें बेचनी और नयी जो की वैसे तो पुरानी(यू नो, सेकंड हेन्ड) किताबें खरीदने में हमने कभी भी ग्लानि का अनुभव नहीं किया।
मित्र की साइकिल के डंडे पर एक और दूसरे को कैरियर पर बैठकर घूमने में क्या लुत्फ आता था। उसे हमारी पीढ़ी ही जानती है।
पाठशाला में मास्टर जी से मार खाना,
पैर के अंगूठे को पकड़कर खड़ा रहना,
कान खिंच कर लाल हो जाने पर भी कभी भी हमारा ‘इगो” हर्ट नहीं होता था।
दरअसल यह हमें मालूम ही नहीं था। इगो किस चिड़िया का नाम है।
मार खाना तो रोजमर्रा की घटना थी।
मार खाने वाला और मारने वाला दोनों खुश हो जाते थे।
मार खाने वाला इसलिये खुश होता था की “आज कल से कम मार पडा है” जब की मारने वाला इसलिये खुश होता था की “आज फिर हाथ साफ करने का अवसर प्राप्त हो गया।”
लकड़ी का बैट लेकर नंगे पैर किसी भी गेंद से गलियों में क्रिकेट खेलना सब से बडा सुख था, आनंद था।
हमने कभी भी पॉकेट मनी नहीं मांगी थी; ना ही माता पिता ने कभी दी थी।
हमारी जरुरतें बहुत सीमित थी।
जिसे परिवार पूरा कर देता था।
छह सात महीने में एक बार अगर कुछ चटपटा या नमकीन खाने को मिल जाता तो-
हमारी खुशी छलकने लगती थी।
दिपावली के दिन रंगबिरंगी फूलझडियां जलाकर हमे जो आनंद मिलता था। वो अवर्णनीय है।
नन्हें नन्हें बमों के गुच्छे से एक एक बन के अलग करने के बाद उन्हें एक के बाद एक जलाने में जो सुख मिलता था। उस के बारे में क्या लिखूं! वो मौज अदभुत थी।
हमने कभी अपने माता-पिता से ये नहीं कहा कि “हम आप से बहुत प्रेम करते हैं”–
क्यों कि हमने कभी “I Love You” कहना या बोलना सीखा ही नहीं।
संघर्ष करते करते आज हम दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं।
कुछ लोगों ने वो प्राप्त कर लिया है। जिसे वे प्राप्त करना चाहते थे।
कुछ आज भी संघर्ष कर रहे हैं– “क्या मालूम….”
पाठशाला के बाहर छत्ते वाले के ठेले पर मित्रों की मेहरबानी से जो मिलता था–
वो कहां खो गया?
हम विश्व के किसी भी कोने में हों,
लेकिन सत्य ये है कि–
हम वास्तविक जीवन जीकर बड़े हुए हैं।
हमने हमेशा यही सोचा है
“वस्त्रों में व संबंधों में कभी भी सिलवट नहीं रहनी चाहिये”
“संबंधों में औपचारिकता रहनी चाहिये”
जो हमें कभी नहीं आया।
हमें मालूम ही नहीं था कि सब्जी रोटी बिना भी नाश्ते का डिब्बा हो सकता है।
हमने कभी भी हमारे नसीब को दोष नहीं दिया।
हम आज भी सपने में जी सकते हैं।
शायद वो सपने ही हमें जीवन के लिये उर्जा प्रदान करते हैं।
हमारे जीवन की वर्तमान के साथ तुलना हो ही नहीं सकती।
हम अच्छे हैं या खराब–
लेकिन हमारा भी एक जमाना था।
रविवार, फ़रवरी 8
रूप को छेड़ना मत (ग़ज़ल)
अनुदित
शनिवार, फ़रवरी 7
वरिष्ठ नागरिकों के लिये
वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
(अनुदित - अनुवादक - महेश सोनी)
किस में कटौती करें?
१.नमक
२.चीनी
३.सफेद मैदा
४.डेयरी के उत्पाद
५.प्रोसेस किया गया भोजन
६.वाद विवाद
७.टोका टाकी
क्या खाना चाहिये?
१.सब्जियां
२.दाल सब्जी
३.मूंगफली
४.सूखे मेवे
५.शीतल प्रकृति के तेल (ओलिव, नारियल का तेल)
६.फल
७.किसी के कटु वचन
८.दु:खों को कटक जाना चाहिये
इन तीन बातों को भूलने का प्रयास करना चाहिये
१.आप की आयु
२.आप का भूतकाल
३.आप की शिकायतें
४.रिश्तेदारों द्वारा खडी की गयी अड़चनें
इन तीनों को सहेज कर रखो
१.आप का परिवार
२.आप के मित्र
३.आप के सकारात्मक विचार
४.स्वच्छ एवं हंसता खेलता घर
५.संभवित कठिन समय के लिये अच्छा खासा धन संभालकर रखना
इन को अपनाइये
१.हमेशा मुस्कान होनी चाहिये
२.कसरत की आदत डाल लेनी चाहिये
३.शारीरिर वजन को नियंत्रित रखिये
४.वाणी में मीठास होनी चाहिये; ना हो तो अपनाइये
५.अन्यों के बातों को सुनने की आदत को विकसित कीजिए
जीवन जीने के इन तरीको का अनुसरण कीजिए
१.प्यास लगने पर ही पानी पीजिए
२.जब थकें तब नहीं। नियमित रुप से आराम कीजिए
३.बीमार होने पर नहीं; नियमित रुप से जांच करवाइये
४.चमत्कार की प्रतीक्षा मत कीजिये
५.अपने आप पर विश्वास रखिये
६.हमेशा सकारात्मक रहिये। उज्ज्वल भविष्य का ही विचार कीजिए
७.लगातार एक ही स्थान पर बैठे ना रहें
४७ से ९० की आयु के कोई व्यक्ति अगर आप के मित्र हैं? तो ये संदेश उन्हें अवश्य भेजियेगा
वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
हैपी सिनियर सिटीजन वीक
🌹
"सब को स्वस्थ, मंगलमय और मौज मस्ती से भरपूर जीवन की शुभकामनाएं"
🙏
बुधवार, फ़रवरी 4
बेटी क्या है? और क्या नहीं?
बेटी क्या है? और क्या नहीं?🌹
🌞 सूरज के घर बेटी होती व उसे विदा करने की घडी आयी होती तो सूर्य को पता चलता की अंधकार किसे कहा जाता है ?……
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✍ “बेटी” क्या होती है?"
🌹““बे”” - 👉 हृदय के साथ जुडी अटूट सांस…….
🌹““टि”” - 👉 कस्तूरी के समान हमेशा सुगंधित
🌹 ""यां"" - 👉 रिद्धि - सिद्धि लानेवाली एवं परिवार को रोशन करने वाली एक परी….🖌🌹❣
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🌹 किसी भी परिवार में पिता को भोजन कराने का अधिकार
सिर्फ और सिर्फ एक बेटी के पास होता है।
🌹 प्रत्येक बेटी सब से ज्यादा प्रेम अपने पिता से करती है।
🌹 बेटी जानती है। समग्र विश्व में यही एक एसा पुरुष है। जो कभी उसे दुःखी नहीं करेगा।
🌹बेटी दाम्पत्य का दीपक
एक बार एक चर्चा के दौरान एक मित्र ने कहा
🌹“मैं मेरी पत्नी से ज्यादा प्रेम मेरी बेटी से करता हूं।
🌹आज भी जब भी मैं अस्वस्थ होता हूं तब ससुराल से तुरंत दौडी चली आती है। उस को देखते ही मैं मेरे सारे दुःख भूल जाता हूं।
🌹मुझे लगता है। शायद इसी वजह से उस की बिदाई के पलों में माता से ज्यादा दुःख पिता को होता है।
🌹 क्यों कि माता रो सकती है, पिता आसानी से रो नहीं सकता।
बेटी के बीस बाईस की होने तक माता पिता को उस के प्रेम की लय लग जाती है।
🌹 बेटी कभी माँ बन जाती है तो कभी दादी बन जाती है। कभी मित्र बन जाती है।
🌹सुख के समय बेटी पिता की मुस्कान बन जाती है और
🌹 दुःख के समय में पिता के आंसू पोंछने वाली हथेली बन जाती है।
देखते ही देखते बेटी बडी हो जाती है। एक दिन लाल जोडे में नववधू बनकर विदा हो जाती है।
🌹 जाते समय वो पिता के सीने से लगकर सजल नेत्रों से कहती है।
🌹 पापा, मैं जा रही हूं…. आप मेरी तनिक भी चिंता मत करियेगा।
समय समय पर अपनी दवाइयां लेना मत भूलना।
🌹 उस पल पिता द्वारा आंसूओं को रोकने से अनेक प्रयासों के बावजूद वे की सरहद लांघकर गंगा की तरह बह निकलते हैं।
🌹 कवि कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतल में कण्व ऋषि शकुंतला को विदा करते हुए कहते हैं,
🌹🌹मेरे जैसे संसार का त्याग कर के वनवासी बने व्यक्ति को अगर पुत्री की बिदाई इतनी पीडा दे सकती है तो संसारी व्यक्तिओं की पीडा कितनी गहन होगी?
🌹 मैं एक बार एक शादी में गया था। मित्र की पुत्री की शादी थी।
बेटी को विदा करने के पश्चात वो एकदम पस्त होकर बैठे उस मित्र ने
कहा था : - :
🌹 आज तक मैंने कभी परमात्मा के सामने प्रार्थना नहीं की है। लेकिन आज मन कर रहा है - हर बेटी के बाप को परमात्मा से ये प्रार्थना करनी ही चाहिये-
🙏👏 हे परमात्मा, आप संसार के सारे पुरुषों को बहुत समझदार व विवेकशील बनाना; क्यों कि उन्हीं में से कोई एक मेरी पुत्री का पति बनने वाला है।
🌹 संसार की सारी स्त्रियों को ममतामयी बनाना। उन्हीं में से कोई मेरी बेटी की सास या ननद बनने वाली है।
🌹 भगवान, तुम्हें अगर पूरी सृष्टि का पुनः निर्माण करना पडे तो मेरी बेटी के भाग्य में सुख ही सुख लिखना। दुःख नाम का कहीं उल्लेख मत करना।
🌹 कुछ समय पहले ही सेवा निवृत्त हुए एक आचार्य ने एक बात कही थी:
🌹अगर आप के घर में बेटी ना हो तो पिता पुत्री के संबंध की गहराई को आप कभी जान नहीं पाएंगे।
🌹आप सिर्फ इतना सा करना।
🌹चाहे जैसी परिस्थितियां हो, चाहे जितने आपसी मनमुटाव हो। लेकिन
पुत्रवधू को
उस के पिता के बारे में कभी किसी भी प्रकार के कटु वचन मत सुनाना।
अनुवादक - महेश सोनी
🌹 बेटी भगवान के बारे में कटु वचन सुन सकती है लेकिन अपने पिता के विरुद्ध एक अक्षर नहीं सुन सकती।
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❤️ अगर आप को ये लेख अच्छा लगे तो इसे बेटी के माता पिता, सास ससुर, भाई बहन को अवश्य भेजना।
🌹🌹🌹🌹🌹
मंगलवार, फ़रवरी 3
चार साथी एक बोतल चाहिये (ग़ज़ल)
चार साथी एक बोतल चाहिये
प्लेट में काजू तथा जल चाहिये
ज़िंदगी में रंग भरने के लिये
श्रीमती थोड़ी सी चंचल चाहिये
उच्च स्तर की जब ग़ज़ल लिखनी हो तब
शांत मन में भाव कोमल चाहिये
क्या गज़ब की सोच है मैं क्या कहूं
कोशिशों के बिन तुझे हल चाहिये
जानते हो नृत्य करने के लिये
हो कहीं भी मंच समतल चाहिये
चाहिये ना और कुछ तुम से “कुमार”
प्रेम से परिपूर्ण संबल चाहिये
कुमार अहमदाबादी
लाल दुपट्टा मलमल का
ये गीत क्या करते थे साजना तुम हम से दूर रहकर १९८९ में बनी लाल दुपट्टा मलमल का मूवी का है। ये गीत तब भी सुपर हीट था व आज भी सुपर हीट ...
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स्तब्ध भाव स्तब्ध हो गये शब्द मौन हो गये पीर छलकी नदी सी बाँध गौण हो गये कुमार अहमदाबादी
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आग से यूँ न खेलो सनम हाथ अपना जला लोगे। ईश्क का ईम्तहाँ लेने में प्यार अपना गंवा दोगे॥ हमसफर साथ हो तो कटेगा सफर कामयाबी से। लक्ष्य पाने स...
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मैं जब लगभग चौदह वर्ष का था यानि टीन एज(किशोरावस्था) में प्रवेश कर चुका था। उन दिनों अहमदाबाद के पहले डबल डेकर(आज की भाषा में मल्टीप्लेक्स ...
