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बुधवार, फ़रवरी 25

आयु का खेल


आयु का खेल

अनुवादक - महेश सोनी 


*“1 ₹ के 6 गोलगप्पे”* से *“30 ₹ के 6 गोलगप्पे होने तक हम बड़े हो गये। 

*“मैदान में आजा”*

और 



*“ऑनलाईन आजा”*

के बीच 

हम बडे हुए हैं।

        

*“होटल में खाने की इच्छा”*

एवं 

*“घर में खाने की इच्छा”*

के बीच हम बड़े हो गये।


*“बहन की पारले की चॉकलेट चुराने”*


और

*“बहन के लिये सिल्क लाने तक”*

हम बडे हो गये।

  

*“मम्मी, बस पांच मिनिट और सोने दे”*    

और

*“snooze बटन दबाने के बीच हम सब बडे हो गये। ये हमें मालूम ही नहीं हुआ।

 


*“टूटी हुई पेन्सिल”*


       

*“टूटे हुए मन”* के बीच हम बड़े हो गये।


*“मैं बडा होना चाहता हूं।”* 

और 

             

*“मैं फिर से बच्चा बनना चाहता हूं"* 

के बीच हम बडे गये।


*“चलिये, मिलकर आयोजन करें”*

से

*“चलिये मिलकर कुछ आयोजन करते हैं”*

इन दो OK के बीच हम बडे हो गये।

   

आखिर में           

*“किसी की तोंद निकल आयी है तो किसी के बाल झड़ गये हैं"*


*“आयु के हमारे साथ खेल कर गयी”*... 



*सब के* 

*क्या सपने थे* 

*और सब क्या बन गये हैं....*

*परिस्थिति अनुसार* 

*सब ने अपने अपने रास्ते चुन लिये हैं..!* 

मंगलवार, फ़रवरी 24

समाज सभ्य हो गया है (अनुदित)

 

अनुवादक - महेश सोनी 

✳️ समय पुराना था ✳️

लोगों के पास तन ढकने के लिये वस्त्र नहीं थे; लेकिन वे तन ढकने का प्रयास करते थे।

आज वस्त्रों के भंडार भरे पडे हैं लेकिन तन का प्रदर्शन करने के प्रयास करते हैं। 

समाज बहुत “सभ्य” हो गया है, है ना!



✳️ समय पुराना था ✳️

आवागमन के साधन मर्यादित थे; लेकिन लोग रिश्तेदारों से मिलने जाते थे। 

आज बेशुमार साधन है लेकिन लोग न मिलने के लिये बहाने बनाते हैं।

समाज बहुत सभ्य” हो गया है, है ना! 


✳️ समय पुराना था ✳️

एक घर की बेटी को पूरा गांव अपनी बेटी मानता था।

आज बेटी पड़ोसी के घर जाए तो भी मन डरता है।

समाज बहुत “सभ्य” हो गया है, है ना! 


✳️ समय पुराना था ✳️

लोग अपने इलाके के बुजुर्गों को हालचाल पूछ लेते थे।

आज लोग स्वयं अपने माता पिता को ही वृद्धाश्रम में भेज देते हैं।

समाज बहुत सभ्य हो गया है, है ना!




✳️ समय पुराना था ✳️

खिलौने सीमीत मात्रा में थे। इलाके के बच्चे साथ मिल जुलकर खेलते थे। आज बच्चे मोबाइल में कैद हो गये हैं।

समाज बहुत “सभ्य” हो गया है,‌ है ना!


✳️ समय पुराना था ✳️

गली के पशुओं को भी रोटी दी जाती थी। गाय और कुत्ते के लिये घर में दो रोटी हमेशा बनती थी।

आज पड़ोसी के बच्चे भूखे सो जाते हैं।

तब मानवता रोने लगती है।

समाज बहुत सभ्य हो गया है।



✳️ समय पुराना था ✳️

लोग पड़ोसी के घर आये मेहमान का हालचाल पूछते थे।

आज पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते।

समाज बहुत सभ्य हो गया है 



👌 वाह रे आधुनिक और सभ्य समाज👌

रविवार, फ़रवरी 22

ढलती आयु में थकान (अनुदित)


अनुवादक - महेश सोनी 


🧡 ढल रही संध्या के समय‌ आकाश का सौंदर्य अपने शिखर पर होता है।

तो फिर….

हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है…?🧡


🧡 अधूरे सपने पूरे करने की आशा इसी दौर में जगती है तो फिर हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है?


🧡 जिम्मेदारीयों से मुक्त होकर स्वयं से मिलने की प्यास जगती है

तो फिर…….

हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है…….? 🧡


🧡 अंधियारी रात को,

पूनम के चांद की रोशनी कितना रोशन कर रही है।

आयु के इस पड़ाव पर जिंदगी के अनुभवों से समझ का एक एहसास जगता है।

तो फिर……

हमें ढल रही आयु की थकान क्यों लगती है 


🧡 सुख दुःख दोनों जीवन के सनातन व अकाट्य सत्य है।🧡

उन्हें एक बार एक किनारे पर रखकर जिंदगी को जीकर देखो….

फिर देखिएगा 





🧡 ज़िंदगी कितनी विशेष लगती है।….....!!!

🧡तन का थक जाना नियती है…

मगर,‌ मन से मत थकना 

दोस्त….

फिर देख लेना.....…

ढलती आयु की

 थकान लगती भी है या नहीं..🧡



 

गुरुवार, फ़रवरी 19

बब्बर शेर(अनुदित)

 


अनुवादक - महेश सोनी 

दो नवयुवतियां सूर्योदय के समय मस्तक पर घडे रखकर जंगल की पगदंडी पर चली जा रही थी। कैसा अनुपम सौंदर्य….


पतली पतली उंगलियां, मोती सरीखे दांत, हंस जैसी उज्ज्वल काया, 

शरद पूनम के चंद्र जैसे उजले दांत, तन-बदन में बिजली की गति


अचानक सिंह की दहाड सुनाई दी। जिसे सुनकर एक बेटी कांपने लगी। लेकिन दूसरी मन व चेहरे पर जूं भी न रेंगी। वो दूसरी का बांह पकड़कर बोली “बहन, डरना मत मै इस जंगल के चप्पे-चप्पे से परिचित हूं।

सिंह के बच्चों के साथ खेल कूदकर बडी हुई हूं। सिंह की इस दहाड़ में किसी का शिकार करने की इच्छा नहीं बल्कि वेदना की कसक है।”


उस बेटी की जानकारी सच थी। वे दोनों जब नदी के तट पर पर थी; तब वहां से थोड़ी दूर एक सिंह पानी पीने आया था। उस के आगेवाले दाएं पैर के पंजे में लंबा कांटा घुस गया था। उस की पीडा उसे सता रही थी; इसलिए उस की दहाड़ में वेदना की कसक थी। 

कांप रही बेटी की बांह को छोडकर दूसरी बेटी ने सिंह की ओर बढने लगी। उस की चाल एसी थी जैसे चोटीला पर्वत से मांँ चामुंडा पत्र रही हो; जैसे पावागढ से काली माता या गब्बर से मांँ अंबा अथवा कडी की माँ मेलडी या हिमालय के शिखर से माता वैष्णोदेवी चल रही हो।


बेटी वीर बहादुर बेटी आसन मुद्रा में सिंह के पास बैठ गयी और सिंह के कंधे पर अयाल(गुजराती में जिसे केशवाळी कहते हैं उसे हिन्दी में अयाल कहते हैं) प्रेम से हाथ घुमाया और पूछा 



"वनराज, बहुत पीडा हो रही है। जरा ठहरो, अभी कांटा निकाल देती हूं।" 

इतना कहकर सिंह का एक पैर अपने आगे के पैरों के घुटनों पर रखकर दोनों हाथों से सिंह का पंजा पकड़कर बबूल के कांटे को दो दांतों के बीच फंसाकर मुंह को जोर का झटका दिया। उस झटके से कांटा निकल गया; रक्त की धार बह गयी। उस धार से बेटी का मुंह लाल लाल हो गया। एसा दृश्य बन गया जैसे अभी अभी भगवती काली ने महिषासुर का वध किया हो।


बेटी ने अपनी ओढनी से रक्त सना चेहरा पोंछा। ओढनी को फाडकर सिंह के पंजे के घाव पर पट्टी के रुप में बांध दिया। उस के बाद सिंह को कहा 

"हे नरसिंह! अब आप वहां जा सकते हैं, जहां से आये हैं। अभी उजाला होगा।‌ गांव की बेटियां पानी भरने के लिये आएंगी। आप को देखकर उन सब के हृदय की गति तेज हो जाएगी।" इतना कहने के बाद हौले से वनराज के मस्तक पर प्रेम से हाथ घुमाया। ये सुनकर सिंह एसे उठा जैसे नन्हा बच्चा माता की आज्ञा सुनकर उठता है।

सिंह उठकर छलांग मारकर सामने स्थित चट्टान पर चढ़ गया और दूसरी ओर उतर गया। दो इंसानों ये पूरा दृश्य देखा। जिस एक राजा और दूसरा साधु था। राजा घोडे पर सवार था और संत पैदल था। बगल में पवन पावडी थी। एक हाथ में कमंडल था। 

साधु ने पूछा “राजन क्या देखा?


"गुरुदेव, सब देखा, लड़की कमाल की है।”


“मैं कौन हूं?” गुरु जी ने फिर पूछा।

“आप मेरे गुरुदेव हैं” राजा ने आश्चर्य के साथ उत्तर दिया।



“मेरी आज्ञा का पालन करोगे?”

“गुरुदेव पहले मैं राजपूत हूं फिर राजा। आप की आज्ञा होगी तो मेरे मस्तक को उतार कर आप के चरणों में रखने में किंचित देर न होगी। लेकिन आप एसे प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं” 


“तो महाराज! इस कन्या से विवाह कर लीजिए” अचानक गुरुदेव ने आज्ञा दे दी। राजा को आश्चर्य हुआ। गुरुदेव ने अचानक से आज्ञा क्यों की?

आश्चर्य चकित राजा ने कहा “गुरुदेव! ये कुछ भी नहीं मालूम, वो कौन है, किस जाति की है, कौन से धर्म की है, किस की बेटी है, विवाह कैसे कर लूं?


गुरुदेव ने दृढ आवाज़ में कहा “राजन! गुरु आज्ञा के पासन से बडा धर्म कोई नहीं है। ये मेरी आज्ञा है।”


“गुरुदेव, आप उस लडकी से विवाह करने के लिये इतना दबाव क्यों लगा रहे हैं।‌” राजा ने फिर प्रश्न पूछा।

“राजन! अभी आपने क्या देखा? गुरु जी ने पूछा।


“जो लड़की निर्भय होकर सिंह के पैर से कांटा निकाल सकती है। उस की कोख से जो बेटे जन्म लेंगे। वे भी बब्बर शेर जैसे ही होंगे। इसी कारण से मैं कह रहा हूं; इस लड़की से विवाह कर ले।” गुरुदेव ने फिर दृढ़ता से कहा। 


राजा ने गुरुदेव की आज्ञा मान ली। उस लड़की से विवाह कर लिया। 

ये राजा थे पूना के महाराज शाहजीराव भोंसले और गुरुदेव थे समर्थ रामदास जी। उस बेटी का नाम था जीजाबाई। जिन की कोख से छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था।


धन्य थी वो कोख जिसने शिवाजी जैसे मानव रत्न को जन्म दिया था। जिन की तलवार की नोंक ने हिन्दू धर्म की रक्षा की। 

धन्य है पुत्र शिवा को ये कहने वाली माता


मरना सिंह मैदान में

इस देश की आर्य रमणी रहे इतिहास में 

मूल गुजराती रचना का अनुवाद 

गुजराती रचनाकार - कवि कान


चूडा पहनुं इन का

जिन की अंखियां रक्तिम

चाहे रहूं पर दो पल सुहागिन 

मेरा पूरा जीवन स्वर्णिम 


शिवाजी महाराज की जन्म जयंती पर कोटि कोटि शुभेच्छाएं 

मेघाणी जी ने जिन की लोरी गायी थी


गगन में खिला है चंद्रमा जीजाबाई ने बालक को जन्म दिया 





बुधवार, फ़रवरी 18

चेतना को सब पता है(ग़ज़ल)

चेतना को सब पता है लालसा क्या चीज है 

लोभ लालच चापलूसी फायदा क्या चीज है 


शब्द तो मालूम था पर अर्थ से परिचित न था 

मौत ने उस की बताया फासला क्या चीज है 


ज़िंदगी में तुम चले हो मखमली पथ पर सदा 

“किस तरह समझाऊं तुम को हादसा क्या चीज है” 


याद आता है मुझे वो दौर स्वर्णिम सेठ जब 

जानते थे शिल्प सी कुंदन कला क्या चीज है 


जानते हैं ना कभी भी जान पाएंगे पुरुष 

औरतें ही जानती है मायका क्या चीज है 


पीर तेरी मैं समझ सकता हूं प्यारे क्योंकि ये 

ये व्यथित दिल जानता है जलजला क्या चीज है 


चाव से श्रम से लगन से जोड़कर तिनके “कुमार”

खग युगल ने ये बताया हौसला क्या चीज है  

फाफडा क्या चीज है (ग़ज़ल)

पूछता है विश्व सारा फाफडा क्या चीज है 
दाल-बाटी रसमलाई गांठिया क्या चीज है 

भारतीयों को पता है जायका क्या चीज है 
नान तंदूरी परांठा रायता क्या चीज है 

दाळिया मिर्ची बडा गट्टा मसाला राजमा 
सेव रतलामी जलेबी बाफला क्या चीज है 

हम चटोरे जानते हैं पावभाजी गोंदपाक 
सेव खमणी ढोकळा औ’ पातरा क्या चीज है 

लापसी घेवर समोसा तिल के लड्डू रामरोट
आमरस कतली कचौरी थेपला क्या चीज है 

राब मोहनथाळ थालीपीट कुल्फी राजभोग
दाल-पूरी पापडी औ’ गुलगुला क्या चीज है 

खीर मोतीपाक लस्सी लापसी मोदक “कुमार”
उंधियू पेडा मठीया खाखरा क्या चीज है 

शुक्रवार, फ़रवरी 13

बेटी….

अनुवादक – महेश सोनी 

१.विवाह के समय सब व्यस्त होते हैं। बेटी की मनःस्थिति के बारे में किसी को मालूम नहीं होता।

३.आमंत्रण पत्रिका में अपने नाम के बाद ब्रेकेट में लिखे नाम को देखकर सोचती है। आज आखिरी बार मेरे नाम से बाद पिता का नाम लिखा गया है। आज के बाद न सिर्फ नाम बल्कि पहचान व वातावरण आदि सब \ बदल जाएंगे।

३.कल तक जो जिद कर के भी अपनी बात मनवाती थी। आज वो इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख जाती है।

४.बेटी किसी से कुछ भी कहना नहीं चाहती। ससुराल से पीहर आने पर अपने पुराने गिलास में पहले मटकी में से पानी लेकर पीती है। उसे घर के किसी कोने में अपना बचपन मिल जाता है। वो आज भी पापा की उंगली पकड़कर घूमना चाहती है। झूले में बैठ कर झूला झूलते हुए साउंट सिस्टम पर उंची आवाज में मनपसंद गीत सुनना चाहती है। लेकिन, अब वो बेटी होने के साथ साथ किसी की पत्नी भी है। कर तक जो जिद कर के भी अपनी अपनी इच्छाएं पूरी करवाती थी। वो इच्छाओं को नियंत्रित कर लेती है। वो अब किसी को कुछ कहना नहीं चाहती। 

५. आंसूओ को लीटर या किसी और तरह से नहीं मापा जा सकता है। नन्हीं नन्हीं हथेलियों से पापा को मनाकर फरमाइश करने के दिन गुजरे कल की बात हो जाती है। जितना कठिन बेटी के लिये अपने ही घर में मेहमान बनकर आना होता है। उतना ही कठिन पिता के लिये बेटी को मेहमान के रुप में देखना होता है।

६.बेटा चाहे कितना भी थककर घर आया हो; वो चाहे जितना बड़ा हो जाए पिता ये सोचकर की वो कर फिर से सो जाएगा; आधी रात को भी उसे जगा कर कोई काम सौंप सकता है। लेकिन अगर बेटी सोई होगी तो पिता उसे जगाने की हिम्मत नहीं करता। बेटे की शादी करते समय बाप पुनः जवान हो जाता है। जब की बेटी की शादी के बाद वो उम्र से ज्यादा बूढा हो जाता है।


बेटी की शादी मतलब नदी को नववधू बनाने के पल…!

(फेसबुक मित्र सिम्मी शाह के पटल पर पढा था। स्मृतियों से भंडार में सहेज कर रखा था। आज सामने आया तो अनुवाद कर के पेश कर दिया।)



गुरुवार, फ़रवरी 12

सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

 सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

(अनूदित)

अनुवादक - महेश सोनी 


ये लेख विशेष रुप से उन के लिये है। जिन का जन्म 1960,1961,1963,1964,1965,1966,1967,1968,1969,1970,

1971,1972,1973,1974,1975,1976,1977,1978,1979,1980 में हुआ है। 

ये पीढ़ी 45 की आयु से आगे बढ़कर अब 65-70 यानि आयु के सातवें व आठवें दशक की ओर बढ़ कही है। 


इस पीढ़ी की सब से बड़ी सफलता ये है। इसने जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन देखे हैं;अपनाये भी हैं।


1,2,3,,4,5,10,20,25,50 पैसे के सिक्कों को वित्तीय व्यवहार में देखने वाली ये पीढ़ी बिना हिचकिचाहट मेहमानों से पैसे ले लेती थी।


स्याही, कलम, पेन्सिल, पेन से शुरुआत करने वाली पीढ़ी आज लेपटॉप, कम्प्यूटर का उपयोग भी कुशलता से कर रही है।


जिस पीढ़ी के लिये बचपन में सायकल चलाना भी एक वैभव था। वो पीढ़ी आज स्कूटर, मोटर सायकल,और कार चला रही है।

अच्छे संस्कारों से सिंचित इस पीढ़ी ने कभी चंचल तो कभी गंभीर रहकर बहुत कुछ  ग्रहण किया है, बहुत कुछ भोगा भी है। 


वो भी समय था। जब टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांज़िस्टर अच्छी रइसी के प्रतिक थे।


ये आखिरी पीढ़ी है। जिन का बचपन और गुण पत्रक(मार्क शीट) टेलीविजन के आगमन से बिगडा नहीं।


इस पीढ़ी ने कुकर की रींग्स और पुराने टायर को वाहन समझकर खेलने में कभी शर्मिंदगी का अनुभव नहीं किया।


तीखी नोक वाली लोहे की छोटी सी छडी को जमीन में घोंप कर खेलना भी एक मजेदार खेल था।

 

जिन के लिये “कच्चे आम को तोडना” चोरी नहीं थी।

कोई भी व्यक्ति किसी भी समय किसी के घर के दरवाजे की कुंडी खडका सकता था। उस से किसी को कोई समस्या नहीं होती थी। एसा करना ग़लत भी नहीं माना जाता था।


ये कहने में “मित्र की मम्मी ने खाना खिला दिया” कतई उपकार का भाव नहीं होता था; “उस के पापा ने डांटा” कहने में शिकायती लहजा नहीं होता था। 

कक्षा या पाठशाला में अपनी बहन के साथ मजाक करते हुए सीधा सरल बोलने वाली पीढ़ी।


मित्र अगर दो दिन पाठशाला ना आये तो पाठशाला से छुट्टी होते ही बस्ता लेकर उस के घर पहुंच जाने वाली पीढ़ी।


किसी मित्र से पिता पाठशाला में आ जाए तो –

मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौडते हुए जाकर उसे सूचना देना की

“तेरे पापा आ गये हैं जल्दी चल”

ये उस समय ब्रेकिंग न्यूज़ भी होती थी।


जब मोहल्ले के किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तब अपना काम समझकर आमंत्रण के बिना काम करनेवाली पीढ़ी।


कपिल देव, सुनील गावस्कर, वेंकट राघवन, इरापल्ली प्रसन्ना, स्टेफी ग्राफ और पीट सेम्प्रास, भूपति अगासी के खेल को देखकर आनंदित होनेवाली पीढ़ी।


राज कपूर, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, जितेन्द्र, अमिताभ बच्चन, आमिर, सलमान,शाहरुख, माधुरी दीक्षित इन सब पर फिदा होने वाली पीढ़ी।


पैसे इकट्ठे कर के भाडे पर VCR लाकर एक साथ चार पांच फिल्में देखने वाली पीढ़ी।


असरानी, संजीव कुमार के विनोद पर खिलखिलाकर हंसने वाली,

नाना, ओम पुरी,‌ शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गु दादा, माधुरी, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी 


“शिक्षक से मार खाने” में कुछ भी ग़लत नहीं था। डर इस बात का लगता था कि घर में किसी को मालूम न हो जाए; वर्ना घर में भी जूते पडेंगे।


शिक्षक के सामने आवाज़ व नजर नीची रखने वाली पीढ़ी।


जितनी भी मार खाई हो; दशहरा पर उसे जलाने वाली वाली पीढ़ी; उस समय पढाने वाले शिक्षक व अब सेवा निवृत शिक्षक कहीं मिल जाए तो निःसंकोच नमन करने वाली पीढ़ी।


कॉलेज में छुट्टी ना हो तो यादों में सपने देखने वाली पीढ़ी…..


ना मोबाइल, ना SMS ना What's App

सिर्फ रुबरु मिलने को तत्पर पीढ़ी।


पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुडाया“ सुनकर आंखें नम करने वाली पीढ़ी।


दिपावली के पांचो दिनों का महत्व व कहानी जानने वाली पीढ़ी।


 लिव इन तो दूर, लव मैरिज को भी बहुत बडा साहसिक कदम मानने वाली पीढ़ी।

पाठशाला - कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लडकों को “हिम्मतवाला” मानने वाली पीढ़ी।


आज आंख बंद कर के……

वही दस, बीस….अस्सी, नब्बे….वही सुनहरी स्मृतियां 

उभर आती है।


बीता कल वापस नहीं आता, लेकिन स्मृतियां हमेशा साथ रहती है।

वो नासमझ पीढ़ी इतनी समझदार थी–

वो जानती थी आज के पल कल स्वर्णिम स्मृतियां बनेंगे।


हमारा भी एक जमाना था…..

तब प्ले स्कूल वगैरह कुछ नहीं था।

6-7 वर्ष के होने पर सीधे पाठशाला में दाखिला होता था।

हम पाठशाला ना जाएं तो भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

सायकल या सीटी बस से आवागमन करते थे।

माता पिता को ये डर नहीं सताता था। बच्चे को अकेला भेजेंगे तो कोई अनहोनी हो जाएगी।


उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण सब चलता था।

परसेन्टज (%) से कोई सीधा लगाव नहीं था।


ट्युशन जाना शरम की बात मानी जाती थी। ट्युशन जाने वाले को “डिब्बा” माना जाता था।

हम किताबों में कापियो में मोर पंख रखते। हम सोचते थे; बल्कि दृढ विश्वास था: एसा करने से हम तेजस्वी विद्यार्थी हो जाएंगे।

कपड़े की थेली में किताबों को रखना।

टीन की पेटी में किताबों को करीने से जमाना हमारी सृजनात्मक सूझ बूझ थी।


हर वर्ष नयी कक्षा में किताबों व कापियों पर खाखी या पुराने अखबार का जिल्द चढाना हमारे लिये वार्षिक उत्सव सा होता था

वर्ष पूरा होने पर पुरानी किताबें बेचनी और नयी जो की वैसे तो पुरानी(यू नो, सेकंड हेन्ड) किताबें खरीदने में हमने कभी भी ग्लानि का अनुभव नहीं किया। 

मित्र की साइकिल के डंडे पर एक और दूसरे को कैरियर पर बैठकर घूमने में क्या लुत्फ आता था। उसे हमारी पीढ़ी ही जानती है। 


पाठशाला में मास्टर जी से मार खाना,

पैर के अंगूठे को पकड़कर खड़ा रहना,

कान खिंच कर लाल हो जाने पर भी कभी भी हमारा ‘इगो” हर्ट नहीं होता था।


दरअसल यह हमें मालूम ही नहीं था। इगो किस चिड़िया का नाम है।

मार खाना तो रोजमर्रा की घटना थी।

मार खाने वाला और मारने वाला दोनों खुश हो जाते थे।

मार खाने वाला इसलिये खुश होता था की “आज कल से कम मार पडा है”  जब की मारने वाला इसलिये खुश होता था की “आज फिर हाथ साफ करने का अवसर प्राप्त हो गया।”

लकड़ी का बैट लेकर नंगे पैर किसी भी गेंद से गलियों में क्रिकेट खेलना सब से बडा सुख था, आनंद था।


हमने कभी भी पॉकेट मनी नहीं मांगी थी; ना ही माता पिता ने कभी दी थी।

हमारी जरुरतें बहुत सीमित थी।

जिसे परिवार पूरा कर देता था।


छह सात महीने में एक बार अगर कुछ चटपटा या नमकीन खाने को मिल जाता तो-

हमारी खुशी छलकने लगती थी।


दिपावली के दिन रंगबिरंगी फूलझडियां जलाकर हमे जो आनंद मिलता था। वो अवर्णनीय है।

नन्हें नन्हें बमों के गुच्छे से एक एक बन के अलग करने के बाद उन्हें एक के बाद एक जलाने में जो सुख मिलता था। उस के बारे में क्या लिखूं! वो मौज अदभुत थी। 


हमने कभी अपने माता-पिता से ये नहीं कहा कि “हम आप से बहुत प्रेम करते हैं”–

क्यों कि हमने कभी “I Love You” कहना या बोलना सीखा ही नहीं।



संघर्ष करते करते आज हम दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं।

कुछ लोगों ने वो प्राप्त कर लिया है। जिसे वे प्राप्त करना चाहते थे।

कुछ आज भी संघर्ष कर रहे हैं– “क्या मालूम….”


पाठशाला के बाहर छत्ते वाले के ठेले पर मित्रों की मेहरबानी से जो मिलता था–

वो कहां खो गया?


हम विश्व के किसी भी कोने में हों,

लेकिन सत्य ये है कि–

हम वास्तविक जीवन जीकर बड़े हुए हैं।

हमने हमेशा यही सोचा है

“वस्त्रों में व संबंधों में कभी भी सिलवट नहीं रहनी चाहिये”


“संबंधों में औपचारिकता रहनी चाहिये” 


जो हमें कभी नहीं आया। 


हमें मालूम ही नहीं था कि सब्जी रोटी बिना भी नाश्ते का डिब्बा हो सकता है।


हमने कभी भी हमारे नसीब को दोष नहीं दिया। 

हम आज भी सपने में जी सकते हैं।

शायद वो सपने ही हमें जीवन के लिये उर्जा प्रदान करते हैं।

हमारे जीवन की वर्तमान के साथ तुलना हो ही नहीं सकती।


हम अच्छे हैं या खराब–

लेकिन हमारा भी एक जमाना था।

रविवार, फ़रवरी 8

रूप को छेड़ना मत (ग़ज़ल)


अनुदित 


मूर्ख मन रूप को छेड़ना मत कभी 
 ज्योत है शांत है फिर भी वो आग है
भस्म कर देगी ज्वाला बनी वो अगर 
उस के मन में धधकता अनुराग है

प्यार देखा है पर डंक देखे नहीं 
स्पर्श करने से पहले तू ये जान ले
झूलती गाल पर इक अलकलट नहीं 
रूप के केफ में डोलता नाग है

है सुधा आंख में औ’ हलाहल भी है 
जांच विष की कभी करनी न चाहिये
शांत सागर है तूफान को मत जगा 
उस के हर ज्वार में मौत का फाग है

कंटकों के अधिकार को जान ले 
फूल को छेडनेवाले ये सोच ले
वो किसी की नहीं है निजी संपदा 
 रात दिन चाकरी कर रहा बाग है
कुमार अहमदाबादी

 


शनिवार, फ़रवरी 7

वरिष्ठ नागरिकों के लिये

 

वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
(अनुदित - अनुवादक - महेश सोनी)

किस में कटौती करें?
१.नमक
२.चीनी
३.सफेद मैदा
४.डेयरी के उत्पाद 
५.प्रोसेस किया गया भोजन
६.वाद विवाद
७.टोका टाकी

क्या खाना चाहिये?
१.सब्जियां
२.दाल सब्जी
३.मूंगफली
४.सूखे मेवे
५.शीतल प्रकृति के तेल (ओलिव, नारियल का तेल)
६.फल
७.किसी के कटु वचन
८.दु:खों को कटक जाना चाहिये


इन तीन बातों को भूलने का प्रयास करना चाहिये

१.आप की आयु

२.आप का भूतकाल
३.आप की शिकायतें
४.रिश्तेदारों द्वारा खडी की गयी अड़चनें       

इन तीनों को सहेज कर रखो
१.आप का परिवार
२.आप के मित्र
३.आप के सकारात्मक विचार
४.स्वच्छ एवं हंसता खेलता घर
५.संभवित कठिन समय के लिये अच्छा खासा धन संभालकर रखना

इन को अपनाइये

१.हमेशा मुस्कान होनी चाहिये
२.कसरत की आदत डाल लेनी चाहिये
३.शारीरिर वजन को नियंत्रित रखिये
४.वाणी में मीठास होनी चाहिये; ना हो तो अपनाइये
५.अन्यों के बातों को सुनने की आदत को विकसित कीजिए

जीवन जीने के इन तरीको का अनुसरण कीजिए  
१.प्यास लगने पर ही पानी पीजिए
२.जब थकें तब नहीं। नियमित रुप से आराम कीजिए
३.बीमार होने पर नहीं; नियमित रुप से जांच करवाइये
४.चमत्कार की प्रतीक्षा मत कीजिये
५.अपने आप पर विश्वास रखिये
६.हमेशा सकारात्मक रहिये। उज्ज्वल भविष्य का ही विचार कीजिए
७.लगातार एक ही स्थान पर बैठे ना रहें
४७ से ९० की आयु के कोई व्यक्ति अगर आप के मित्र हैं? तो ये संदेश उन्हें अवश्य भेजियेगा

वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
हैपी सिनियर सिटीजन वीक

                   🌹
"सब को स्वस्थ, मंगलमय और मौज मस्ती से भरपूर जीवन की शुभकामनाएं" 
                    🙏

बुधवार, फ़रवरी 4

बेटी क्या है? और क्या नहीं?

 

बेटी क्या है? और क्या नहीं?🌹


🌞 सूरज के घर बेटी होती व उसे विदा करने की घडी आयी होती तो सूर्य को पता चलता की अंधकार किसे कहा जाता है ?……

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✍ “बेटी” क्या होती है?"

🌹““बे”” - 👉 हृदय के साथ जुडी अटूट सांस…….

🌹““टि”” - 👉 कस्तूरी के समान हमेशा सुगंधित 

🌹 ""यां"" - 👉 रिद्धि - सिद्धि लानेवाली एवं परिवार को रोशन करने वाली एक परी….🖌🌹❣


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🌹 किसी भी परिवार में पिता को भोजन कराने का अधिकार 

सिर्फ और सिर्फ एक बेटी के पास होता है।

🌹 प्रत्येक बेटी सब से ज्यादा प्रेम अपने पिता से करती है।

🌹 बेटी जानती है। समग्र विश्व में यही एक एसा पुरुष है। जो कभी उसे दुःखी नहीं करेगा।


🌹बेटी दाम्पत्य का दीपक

एक बार एक चर्चा के दौरान एक मित्र ने कहा 


🌹“मैं मेरी पत्नी से ज्यादा प्रेम मेरी बेटी से करता हूं।


🌹आज भी जब भी मैं अस्वस्थ होता हूं तब ससुराल से तुरंत दौडी चली आती है। उस को देखते ही मैं मेरे सारे दुःख भूल जाता हूं।

🌹मुझे लगता है। शायद इसी वजह से उस की बिदाई के पलों में माता से ज्यादा दुःख पिता को होता है।

 🌹 क्यों कि माता रो सकती है, पिता आसानी से रो नहीं सकता।

बेटी के बीस बाईस की होने तक माता पिता को उस के प्रेम की लय लग जाती है। 

🌹 बेटी कभी माँ बन जाती है तो कभी दादी बन जाती है। कभी मित्र बन जाती है।


🌹सुख के समय बेटी पिता की मुस्कान बन जाती है और 

🌹 दुःख के समय में पिता के आंसू पोंछने वाली हथेली बन जाती है।

देखते ही देखते बेटी बडी हो जाती है। एक दिन लाल जोडे में नववधू बनकर विदा हो जाती है। 


🌹 जाते समय वो पिता के सीने से लगकर सजल नेत्रों से कहती है।

🌹 पापा, मैं जा रही हूं…. आप मेरी तनिक भी चिंता मत करियेगा।

समय समय पर अपनी दवाइयां लेना मत भूलना।



🌹 उस पल पिता द्वारा आंसूओं को रोकने से अनेक प्रयासों के बावजूद वे की सरहद लांघकर गंगा की तरह बह निकलते हैं। 

🌹 कवि कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतल में कण्व ऋषि शकुंतला को विदा करते हुए कहते हैं,

🌹🌹मेरे जैसे संसार का त्याग कर के वनवासी बने व्यक्ति को अगर पुत्री की बिदाई इतनी पीडा दे सकती है तो संसारी व्यक्तिओं की पीडा कितनी गहन होगी?


🌹 मैं एक बार एक शादी में गया था। मित्र की पुत्री की शादी थी।

बेटी को विदा करने के पश्चात वो एकदम पस्त होकर बैठे उस मित्र ने 

कहा था : - : 


🌹 आज तक मैंने कभी परमात्मा के सामने प्रार्थना नहीं की है। लेकिन आज मन कर रहा है - हर बेटी के बाप को परमात्मा से ये प्रार्थना करनी ही चाहिये- 

🙏👏 हे परमात्मा, आप संसार के सारे पुरुषों को बहुत समझदार व विवेकशील बनाना; क्यों कि उन्हीं में से कोई एक मेरी पुत्री का पति बनने वाला है।


🌹 संसार की सारी स्त्रियों को ममतामयी बनाना। उन्हीं में से कोई मेरी बेटी की सास या ननद बनने वाली है।


🌹 भगवान, तुम्हें अगर पूरी सृष्टि का पुनः निर्माण करना पडे तो मेरी बेटी के भाग्य में सुख ही सुख लिखना। दुःख नाम का कहीं उल्लेख मत करना।


🌹 कुछ समय पहले ही सेवा निवृत्त हुए एक आचार्य ने एक बात कही थी:

🌹अगर आप के घर में बेटी ना हो तो पिता पुत्री के संबंध की गहराई को आप कभी जान नहीं पाएंगे। 


 🌹आप सिर्फ इतना सा करना।


🌹चाहे जैसी परिस्थितियां हो, चाहे जितने आपसी मनमुटाव हो। लेकिन 


पुत्रवधू को


उस के पिता के बारे में कभी किसी भी प्रकार के कटु वचन मत सुनाना।

अनुवादक - महेश सोनी 


🌹 बेटी भगवान के बारे में कटु वचन सुन सकती है लेकिन अपने पिता के विरुद्ध एक अक्षर नहीं सुन सकती।

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टी के माता पिता, सास ससुर, भाई बहन को अवश्य भेजना।

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मंगलवार, फ़रवरी 3

चार साथी एक बोतल चाहिये (ग़ज़ल)


चार साथी एक बोतल चाहिये 

प्लेट में काजू तथा जल चाहिये 


ज़िंदगी में रंग भरने के लिये 

श्रीमती थोड़ी सी चंचल चाहिये 


उच्च स्तर की जब ग़ज़ल लिखनी हो तब

शांत मन में भाव कोमल चाहिये 


क्या गज़ब की सोच है मैं क्या कहूं 

कोशिशों के बिन तुझे हल चाहिये 


जानते हो नृत्य करने के लिये 

हो कहीं भी मंच समतल चाहिये 


चाहिये ना और कुछ तुम से “कुमार”

प्रेम से परिपूर्ण संबल चाहिये 


कुमार अहमदाबादी  

આપણી ૧૪૮ જાતોનું વર્ણન

કોપી પેસ્ટ બ્રાહ્મણની રસોઈ ને રાજપૂતની રીત, વાણિયાનો વેપાર ને પારસીની પ્રીત, નાગરની મુત્સદી ને વ્યાસની ભવાઈ, લોહાણાની હુંસાતુંસી ને ભાટિયાની...