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शुक्रवार, फ़रवरी 13

बेटी….

अनुवादक – महेश सोनी 

१.विवाह के समय सब व्यस्त होते हैं। बेटी की मनःस्थिति के बारे में किसी को मालूम नहीं होता।

३.आमंत्रण पत्रिका में अपने नाम के बाद ब्रेकेट में लिखे नाम को देखकर सोचती है। आज आखिरी बार मेरे नाम से बाद पिता का नाम लिखा गया है। आज के बाद न सिर्फ नाम बल्कि पहचान व वातावरण आदि सब \ बदल जाएंगे।

३.कल तक जो जिद कर के भी अपनी बात मनवाती थी। आज वो इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख जाती है।

४.बेटी किसी से कुछ भी कहना नहीं चाहती। ससुराल से पीहर आने पर अपने पुराने गिलास में पहले मटकी में से पानी लेकर पीती है। उसे घर के किसी कोने में अपना बचपन मिल जाता है। वो आज भी पापा की उंगली पकड़कर घूमना चाहती है। झूले में बैठ कर झूला झूलते हुए साउंट सिस्टम पर उंची आवाज में मनपसंद गीत सुनना चाहती है। लेकिन, अब वो बेटी होने के साथ साथ किसी की पत्नी भी है। कर तक जो जिद कर के भी अपनी अपनी इच्छाएं पूरी करवाती थी। वो इच्छाओं को नियंत्रित कर लेती है। वो अब किसी को कुछ कहना नहीं चाहती। 

५. आंसूओ को लीटर या किसी और तरह से नहीं मापा जा सकता है। नन्हीं नन्हीं हथेलियों से पापा को मनाकर फरमाइश करने के दिन गुजरे कल की बात हो जाती है। जितना कठिन बेटी के लिये अपने ही घर में मेहमान बनकर आना होता है। उतना ही कठिन पिता के लिये बेटी को मेहमान के रुप में देखना होता है।

६.बेटा चाहे कितना भी थककर घर आया हो; वो चाहे जितना बड़ा हो जाए पिता ये सोचकर की वो कर फिर से सो जाएगा; आधी रात को भी उसे जगा कर कोई काम सौंप सकता है। लेकिन अगर बेटी सोई होगी तो पिता उसे जगाने की हिम्मत नहीं करता। बेटे की शादी करते समय बाप पुनः जवान हो जाता है। जब की बेटी की शादी के बाद वो उम्र से ज्यादा बूढा हो जाता है।


बेटी की शादी मतलब नदी को नववधू बनाने के पल…!

(फेसबुक मित्र सिम्मी शाह के पटल पर पढा था। स्मृतियों से भंडार में सहेज कर रखा था। आज सामने आया तो अनुवाद कर के पेश कर दिया।)



गुरुवार, फ़रवरी 12

सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

 सत्तर अस्सी के जमाने की पीढ़ी

(अनूदित)

अनुवादक - महेश सोनी 


ये लेख विशेष रुप से उन के लिये है। जिन का जन्म 1960,1961,1963,1964,1965,1966,1967,1968,1969,1970,

1971,1972,1973,1974,1975,1976,1977,1978,1979,1980 में हुआ है। 

ये पीढ़ी 45 की आयु से आगे बढ़कर अब 65-70 यानि आयु के सातवें व आठवें दशक की ओर बढ़ कही है। 


इस पीढ़ी की सब से बड़ी सफलता ये है। इसने जीवन में बहुत बड़े परिवर्तन देखे हैं;अपनाये भी हैं।


1,2,3,,4,5,10,20,25,50 पैसे के सिक्कों को वित्तीय व्यवहार में देखने वाली ये पीढ़ी बिना हिचकिचाहट मेहमानों से पैसे ले लेती थी।


स्याही, कलम, पेन्सिल, पेन से शुरुआत करने वाली पीढ़ी आज लेपटॉप, कम्प्यूटर का उपयोग भी कुशलता से कर रही है।


जिस पीढ़ी के लिये बचपन में सायकल चलाना भी एक वैभव था। वो पीढ़ी आज स्कूटर, मोटर सायकल,और कार चला रही है।

अच्छे संस्कारों से सिंचित इस पीढ़ी ने कभी चंचल तो कभी गंभीर रहकर बहुत कुछ  ग्रहण किया है, बहुत कुछ भोगा भी है। 


वो भी समय था। जब टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांज़िस्टर अच्छी रइसी के प्रतिक थे।


ये आखिरी पीढ़ी है। जिन का बचपन और गुण पत्रक(मार्क शीट) टेलीविजन के आगमन से बिगडा नहीं।


इस पीढ़ी ने कुकर की रींग्स और पुराने टायर को वाहन समझकर खेलने में कभी शर्मिंदगी का अनुभव नहीं किया।


तीखी नोक वाली लोहे की छोटी सी छडी को जमीन में घोंप कर खेलना भी एक मजेदार खेल था।

 

जिन के लिये “कच्चे आम को तोडना” चोरी नहीं थी।

कोई भी व्यक्ति किसी भी समय किसी के घर के दरवाजे की कुंडी खडका सकता था। उस से किसी को कोई समस्या नहीं होती थी। एसा करना ग़लत भी नहीं माना जाता था।


ये कहने में “मित्र की मम्मी ने खाना खिला दिया” कतई उपकार का भाव नहीं होता था; “उस के पापा ने डांटा” कहने में शिकायती लहजा नहीं होता था। 

कक्षा या पाठशाला में अपनी बहन के साथ मजाक करते हुए सीधा सरल बोलने वाली पीढ़ी।


मित्र अगर दो दिन पाठशाला ना आये तो पाठशाला से छुट्टी होते ही बस्ता लेकर उस के घर पहुंच जाने वाली पीढ़ी।


किसी मित्र से पिता पाठशाला में आ जाए तो –

मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौडते हुए जाकर उसे सूचना देना की

“तेरे पापा आ गये हैं जल्दी चल”

ये उस समय ब्रेकिंग न्यूज़ भी होती थी।


जब मोहल्ले के किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तब अपना काम समझकर आमंत्रण के बिना काम करनेवाली पीढ़ी।


कपिल देव, सुनील गावस्कर, वेंकट राघवन, इरापल्ली प्रसन्ना, स्टेफी ग्राफ और पीट सेम्प्रास, भूपति अगासी के खेल को देखकर आनंदित होनेवाली पीढ़ी।


राज कपूर, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, जितेन्द्र, अमिताभ बच्चन, आमिर, सलमान,शाहरुख, माधुरी दीक्षित इन सब पर फिदा होने वाली पीढ़ी।


पैसे इकट्ठे कर के भाडे पर VCR लाकर एक साथ चार पांच फिल्में देखने वाली पीढ़ी।


असरानी, संजीव कुमार के विनोद पर खिलखिलाकर हंसने वाली,

नाना, ओम पुरी,‌ शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गु दादा, माधुरी, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी 


“शिक्षक से मार खाने” में कुछ भी ग़लत नहीं था। डर इस बात का लगता था कि घर में किसी को मालूम न हो जाए; वर्ना घर में भी जूते पडेंगे।


शिक्षक के सामने आवाज़ व नजर नीची रखने वाली पीढ़ी।


जितनी भी मार खाई हो; दशहरा पर उसे जलाने वाली वाली पीढ़ी; उस समय पढाने वाले शिक्षक व अब सेवा निवृत शिक्षक कहीं मिल जाए तो निःसंकोच नमन करने वाली पीढ़ी।


कॉलेज में छुट्टी ना हो तो यादों में सपने देखने वाली पीढ़ी…..


ना मोबाइल, ना SMS ना What's App

सिर्फ रुबरु मिलने को तत्पर पीढ़ी।


पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुडाया“ सुनकर आंखें नम करने वाली पीढ़ी।


दिपावली के पांचो दिनों का महत्व व कहानी जानने वाली पीढ़ी।


 लिव इन तो दूर, लव मैरिज को भी बहुत बडा साहसिक कदम मानने वाली पीढ़ी।

पाठशाला - कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लडकों को “हिम्मतवाला” मानने वाली पीढ़ी।


आज आंख बंद कर के……

वही दस, बीस….अस्सी, नब्बे….वही सुनहरी स्मृतियां 

उभर आती है।


बीता कल वापस नहीं आता, लेकिन स्मृतियां हमेशा साथ रहती है।

वो नासमझ पीढ़ी इतनी समझदार थी–

वो जानती थी आज के पल कल स्वर्णिम स्मृतियां बनेंगे।


हमारा भी एक जमाना था…..

तब प्ले स्कूल वगैरह कुछ नहीं था।

6-7 वर्ष के होने पर सीधे पाठशाला में दाखिला होता था।

हम पाठशाला ना जाएं तो भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

सायकल या सीटी बस से आवागमन करते थे।

माता पिता को ये डर नहीं सताता था। बच्चे को अकेला भेजेंगे तो कोई अनहोनी हो जाएगी।


उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण सब चलता था।

परसेन्टज (%) से कोई सीधा लगाव नहीं था।


ट्युशन जाना शरम की बात मानी जाती थी। ट्युशन जाने वाले को “डिब्बा” माना जाता था।

हम किताबों में कापियो में मोर पंख रखते। हम सोचते थे; बल्कि दृढ विश्वास था: एसा करने से हम तेजस्वी विद्यार्थी हो जाएंगे।

कपड़े की थेली में किताबों को रखना।

टीन की पेटी में किताबों को करीने से जमाना हमारी सृजनात्मक सूझ बूझ थी।


हर वर्ष नयी कक्षा में किताबों व कापियों पर खाखी या पुराने अखबार का जिल्द चढाना हमारे लिये वार्षिक उत्सव सा होता था

वर्ष पूरा होने पर पुरानी किताबें बेचनी और नयी जो की वैसे तो पुरानी(यू नो, सेकंड हेन्ड) किताबें खरीदने में हमने कभी भी ग्लानि का अनुभव नहीं किया। 

मित्र की साइकिल के डंडे पर एक और दूसरे को कैरियर पर बैठकर घूमने में क्या लुत्फ आता था। उसे हमारी पीढ़ी ही जानती है। 


पाठशाला में मास्टर जी से मार खाना,

पैर के अंगूठे को पकड़कर खड़ा रहना,

कान खिंच कर लाल हो जाने पर भी कभी भी हमारा ‘इगो” हर्ट नहीं होता था।


दरअसल यह हमें मालूम ही नहीं था। इगो किस चिड़िया का नाम है।

मार खाना तो रोजमर्रा की घटना थी।

मार खाने वाला और मारने वाला दोनों खुश हो जाते थे।

मार खाने वाला इसलिये खुश होता था की “आज कल से कम मार पडा है”  जब की मारने वाला इसलिये खुश होता था की “आज फिर हाथ साफ करने का अवसर प्राप्त हो गया।”

लकड़ी का बैट लेकर नंगे पैर किसी भी गेंद से गलियों में क्रिकेट खेलना सब से बडा सुख था, आनंद था।


हमने कभी भी पॉकेट मनी नहीं मांगी थी; ना ही माता पिता ने कभी दी थी।

हमारी जरुरतें बहुत सीमित थी।

जिसे परिवार पूरा कर देता था।


छह सात महीने में एक बार अगर कुछ चटपटा या नमकीन खाने को मिल जाता तो-

हमारी खुशी छलकने लगती थी।


दिपावली के दिन रंगबिरंगी फूलझडियां जलाकर हमे जो आनंद मिलता था। वो अवर्णनीय है।

नन्हें नन्हें बमों के गुच्छे से एक एक बन के अलग करने के बाद उन्हें एक के बाद एक जलाने में जो सुख मिलता था। उस के बारे में क्या लिखूं! वो मौज अदभुत थी। 


हमने कभी अपने माता-पिता से ये नहीं कहा कि “हम आप से बहुत प्रेम करते हैं”–

क्यों कि हमने कभी “I Love You” कहना या बोलना सीखा ही नहीं।



संघर्ष करते करते आज हम दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं।

कुछ लोगों ने वो प्राप्त कर लिया है। जिसे वे प्राप्त करना चाहते थे।

कुछ आज भी संघर्ष कर रहे हैं– “क्या मालूम….”


पाठशाला के बाहर छत्ते वाले के ठेले पर मित्रों की मेहरबानी से जो मिलता था–

वो कहां खो गया?


हम विश्व के किसी भी कोने में हों,

लेकिन सत्य ये है कि–

हम वास्तविक जीवन जीकर बड़े हुए हैं।

हमने हमेशा यही सोचा है

“वस्त्रों में व संबंधों में कभी भी सिलवट नहीं रहनी चाहिये”


“संबंधों में औपचारिकता रहनी चाहिये” 


जो हमें कभी नहीं आया। 


हमें मालूम ही नहीं था कि सब्जी रोटी बिना भी नाश्ते का डिब्बा हो सकता है।


हमने कभी भी हमारे नसीब को दोष नहीं दिया। 

हम आज भी सपने में जी सकते हैं।

शायद वो सपने ही हमें जीवन के लिये उर्जा प्रदान करते हैं।

हमारे जीवन की वर्तमान के साथ तुलना हो ही नहीं सकती।


हम अच्छे हैं या खराब–

लेकिन हमारा भी एक जमाना था।

रविवार, फ़रवरी 8

रूप को छेड़ना मत (ग़ज़ल)


अनुदित 


मूर्ख मन रूप को छेड़ना मत कभी 
 ज्योत है शांत है फिर भी वो आग है
भस्म कर देगी ज्वाला बनी वो अगर 
उस के मन में धधकता अनुराग है

प्यार देखा है पर डंक देखे नहीं 
स्पर्श करने से पहले तू ये जान ले
झूलती गाल पर इक अलकलट नहीं 
रूप के केफ में डोलता नाग है

है सुधा आंख में औ’ हलाहल भी है 
जांच विष की कभी करनी न चाहिये
शांत सागर है तूफान को मत जगा 
उस के हर ज्वार में मौत का फाग है

कंटकों के अधिकार को जान ले 
फूल को छेडनेवाले ये सोच ले
वो किसी की नहीं है निजी संपदा 
 रात दिन चाकरी कर रहा बाग है
कुमार अहमदाबादी

 


शनिवार, फ़रवरी 7

वरिष्ठ नागरिकों के लिये

 

वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
(अनुदित - अनुवादक - महेश सोनी)

किस में कटौती करें?
१.नमक
२.चीनी
३.सफेद मैदा
४.डेयरी के उत्पाद 
५.प्रोसेस किया गया भोजन
६.वाद विवाद
७.टोका टाकी

क्या खाना चाहिये?
१.सब्जियां
२.दाल सब्जी
३.मूंगफली
४.सूखे मेवे
५.शीतल प्रकृति के तेल (ओलिव, नारियल का तेल)
६.फल
७.किसी के कटु वचन
८.दु:खों को कटक जाना चाहिये


इन तीन बातों को भूलने का प्रयास करना चाहिये

१.आप की आयु

२.आप का भूतकाल
३.आप की शिकायतें
४.रिश्तेदारों द्वारा खडी की गयी अड़चनें       

इन तीनों को सहेज कर रखो
१.आप का परिवार
२.आप के मित्र
३.आप के सकारात्मक विचार
४.स्वच्छ एवं हंसता खेलता घर
५.संभवित कठिन समय के लिये अच्छा खासा धन संभालकर रखना

इन को अपनाइये

१.हमेशा मुस्कान होनी चाहिये
२.कसरत की आदत डाल लेनी चाहिये
३.शारीरिर वजन को नियंत्रित रखिये
४.वाणी में मीठास होनी चाहिये; ना हो तो अपनाइये
५.अन्यों के बातों को सुनने की आदत को विकसित कीजिए

जीवन जीने के इन तरीको का अनुसरण कीजिए  
१.प्यास लगने पर ही पानी पीजिए
२.जब थकें तब नहीं। नियमित रुप से आराम कीजिए
३.बीमार होने पर नहीं; नियमित रुप से जांच करवाइये
४.चमत्कार की प्रतीक्षा मत कीजिये
५.अपने आप पर विश्वास रखिये
६.हमेशा सकारात्मक रहिये। उज्ज्वल भविष्य का ही विचार कीजिए
७.लगातार एक ही स्थान पर बैठे ना रहें
४७ से ९० की आयु के कोई व्यक्ति अगर आप के मित्र हैं? तो ये संदेश उन्हें अवश्य भेजियेगा

वरिष्ठ नागरिक सप्ताह की शुभकामनाएं
हैपी सिनियर सिटीजन वीक

                   🌹
"सब को स्वस्थ, मंगलमय और मौज मस्ती से भरपूर जीवन की शुभकामनाएं" 
                    🙏

बुधवार, फ़रवरी 4

बेटी क्या है? और क्या नहीं?

 

बेटी क्या है? और क्या नहीं?🌹


🌞 सूरज के घर बेटी होती व उसे विदा करने की घडी आयी होती तो सूर्य को पता चलता की अंधकार किसे कहा जाता है ?……

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✍ “बेटी” क्या होती है?"

🌹““बे”” - 👉 हृदय के साथ जुडी अटूट सांस…….

🌹““टि”” - 👉 कस्तूरी के समान हमेशा सुगंधित 

🌹 ""यां"" - 👉 रिद्धि - सिद्धि लानेवाली एवं परिवार को रोशन करने वाली एक परी….🖌🌹❣


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🌹 किसी भी परिवार में पिता को भोजन कराने का अधिकार 

सिर्फ और सिर्फ एक बेटी के पास होता है।

🌹 प्रत्येक बेटी सब से ज्यादा प्रेम अपने पिता से करती है।

🌹 बेटी जानती है। समग्र विश्व में यही एक एसा पुरुष है। जो कभी उसे दुःखी नहीं करेगा।


🌹बेटी दाम्पत्य का दीपक

एक बार एक चर्चा के दौरान एक मित्र ने कहा 


🌹“मैं मेरी पत्नी से ज्यादा प्रेम मेरी बेटी से करता हूं।


🌹आज भी जब भी मैं अस्वस्थ होता हूं तब ससुराल से तुरंत दौडी चली आती है। उस को देखते ही मैं मेरे सारे दुःख भूल जाता हूं।

🌹मुझे लगता है। शायद इसी वजह से उस की बिदाई के पलों में माता से ज्यादा दुःख पिता को होता है।

 🌹 क्यों कि माता रो सकती है, पिता आसानी से रो नहीं सकता।

बेटी के बीस बाईस की होने तक माता पिता को उस के प्रेम की लय लग जाती है। 

🌹 बेटी कभी माँ बन जाती है तो कभी दादी बन जाती है। कभी मित्र बन जाती है।


🌹सुख के समय बेटी पिता की मुस्कान बन जाती है और 

🌹 दुःख के समय में पिता के आंसू पोंछने वाली हथेली बन जाती है।

देखते ही देखते बेटी बडी हो जाती है। एक दिन लाल जोडे में नववधू बनकर विदा हो जाती है। 


🌹 जाते समय वो पिता के सीने से लगकर सजल नेत्रों से कहती है।

🌹 पापा, मैं जा रही हूं…. आप मेरी तनिक भी चिंता मत करियेगा।

समय समय पर अपनी दवाइयां लेना मत भूलना।



🌹 उस पल पिता द्वारा आंसूओं को रोकने से अनेक प्रयासों के बावजूद वे की सरहद लांघकर गंगा की तरह बह निकलते हैं। 

🌹 कवि कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतल में कण्व ऋषि शकुंतला को विदा करते हुए कहते हैं,

🌹🌹मेरे जैसे संसार का त्याग कर के वनवासी बने व्यक्ति को अगर पुत्री की बिदाई इतनी पीडा दे सकती है तो संसारी व्यक्तिओं की पीडा कितनी गहन होगी?


🌹 मैं एक बार एक शादी में गया था। मित्र की पुत्री की शादी थी।

बेटी को विदा करने के पश्चात वो एकदम पस्त होकर बैठे उस मित्र ने 

कहा था : - : 


🌹 आज तक मैंने कभी परमात्मा के सामने प्रार्थना नहीं की है। लेकिन आज मन कर रहा है - हर बेटी के बाप को परमात्मा से ये प्रार्थना करनी ही चाहिये- 

🙏👏 हे परमात्मा, आप संसार के सारे पुरुषों को बहुत समझदार व विवेकशील बनाना; क्यों कि उन्हीं में से कोई एक मेरी पुत्री का पति बनने वाला है।


🌹 संसार की सारी स्त्रियों को ममतामयी बनाना। उन्हीं में से कोई मेरी बेटी की सास या ननद बनने वाली है।


🌹 भगवान, तुम्हें अगर पूरी सृष्टि का पुनः निर्माण करना पडे तो मेरी बेटी के भाग्य में सुख ही सुख लिखना। दुःख नाम का कहीं उल्लेख मत करना।


🌹 कुछ समय पहले ही सेवा निवृत्त हुए एक आचार्य ने एक बात कही थी:

🌹अगर आप के घर में बेटी ना हो तो पिता पुत्री के संबंध की गहराई को आप कभी जान नहीं पाएंगे। 


 🌹आप सिर्फ इतना सा करना।


🌹चाहे जैसी परिस्थितियां हो, चाहे जितने आपसी मनमुटाव हो। लेकिन 


पुत्रवधू को


उस के पिता के बारे में कभी किसी भी प्रकार के कटु वचन मत सुनाना।

अनुवादक - महेश सोनी 


🌹 बेटी भगवान के बारे में कटु वचन सुन सकती है लेकिन अपने पिता के विरुद्ध एक अक्षर नहीं सुन सकती।

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❤️ अगर आप को ये लेख अच्छा लगे तो इसे बे

टी के माता पिता, सास ससुर, भाई बहन को अवश्य भेजना।

🌹🌹🌹🌹🌹

मंगलवार, फ़रवरी 3

चार साथी एक बोतल चाहिये (ग़ज़ल)


चार साथी एक बोतल चाहिये 

प्लेट में काजू तथा जल चाहिये 


ज़िंदगी में रंग भरने के लिये 

श्रीमती थोड़ी सी चंचल चाहिये 


उच्च स्तर की जब ग़ज़ल लिखनी हो तब

शांत मन में भाव कोमल चाहिये 


क्या गज़ब की सोच है मैं क्या कहूं 

कोशिशों के बिन तुझे हल चाहिये 


जानते हो नृत्य करने के लिये 

हो कहीं भी मंच समतल चाहिये 


चाहिये ना और कुछ तुम से “कुमार”

प्रेम से परिपूर्ण संबल चाहिये 


कुमार अहमदाबादी  

शनिवार, जनवरी 31

छाछ मांगने में लोटा खोया

 हिन्दी में एक कहावत छाछ मांगने गयी थी लेकिन लोटा खोकर आयी है


सब को नहीं मालूम की तजाकिस्तान में भारत का एयरबेस(हवाई थाना) है। भारत उस के लिये काफी बडी रकम चुकाता है। 


मगर अब तजाकिस्तान में वो एयरबेस नहीं है। 

पाकिस्तान उस एयरबेस से बहुत परेशान रहता था। भारत के लडाकू फाइटर हवाई जहाज लगातार उस के सिर पर सवार से रहते थे।

पाकिस्तान ने तजाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिये तुर्की और कतर का संपर्क किया। उन के कहा वे भारत के एयरबेस बंद करवाये। 

तजाकिस्तान ने उन के पर भारत पर दबाव बनाया। 


पाकिस्तान खुश था क्यों कि अब लहंगा फाड़ना बाकी रहा था। 


जैसे ही तालिबान को इस मामले का पता चला। उन्होंने अपना बगराम एयरबेस भारत को देने का प्रस्ताव रखा। भारत ने प्रस्ताव पर तुरंत स्वीकृति की मोहर लगा दी। यहां पाकिस्तान के लिये वो कहावत *लेने गयी पूत खो आई खसम* (बेटा पैदा करने के चक्कर में पति को खो दिया) सटीक बैठती है। अब भारत तजाकिस्तान के एयर बेज से सारे साजो सामान बगराम में ले जा रहा है।  

"बानरा" ने स्वयं बगराम एयरबेस पर कब्जा करने का प्रयास किया होने के कारण उसे मालूम था। पाकिस्तानी सुअरों ने उस में दखल दी है। उन को फंसाकर अपना खेल बिगाड़ने के बाद उसने इन सुअरों को फिर से FATF की ग्रे सूचि में डाल दिया है; और अब वो विश्व बैंक द्वारा मिलने वाली लोन की किस्त भी को भी अटका देगा। 


इस सब के दरमियान भारत के जो लडाकू जहाज तजाकिस्तान से हट गये थे। वे अब बगराम में जैसे एकदम उन की छाती पर तैनात है।


एक दूसरी बात: "एसे समाचार हैं कि बगराम के बदले में भारत अफगानिस्तान सात एसे नोन रिफंडेबल प्रोजेक्ट में धन की आपूर्ति करेगा। एसा सुनने में आया है कि उन प्रोजेक्ट्स में एक प्रोजेक्ट एक एसी नदी उश पर बांध बांधने का है। जिस का लगभग पूरा पानी बहकर पाकिस्तान में जाता है। 


अब मुझे बताइये मुनीर और शाहबाज का लहंगा फटा है या नहीं फटा? 🤷🏻‍♂️

अद्वितीय रामभद्राचार्य (अनुदित)

दुनिया उन को अंधा कहती है

अभी माघ मेले में दो करोड़ की कार में घूमने वाले बकरा कट दाढ़ीवाले शंकराचार्य ने पूज्य रामभद्राचार्य के बारे में अभद्र टिप्पणी की है। इस नालायक को सपा+खांग्रेस(मुस्लिम लीग) ने 2027 के चुनावों के लिए किराए पर रखा है। (सुप्रीम कोर्ट का अभ्यास करना))📚 


मगर सत्य ये की उन्होंने जो देखा है उसे आंखों वाले भी नहीं देख सकते।

आज वे 75 वर्ष के है

जन्म से अंध

लेकिन उन के ज्ञान के सूर्य की रोशनी अद्वितीय है।

उन का नाम है—

जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य


बचपन से ही उन का जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं रहा है


पाठशाला में किसी भी कक्षा में 99 प्रतिशत से कम गुण नहीं आये


दुनिया उन को अंध कहती थी। लेकिन‌ वे शास्त्रों से रोशनी प्राप्त करते रहे।

 

230 से ज्यादा किताबें


संस्कृत, वेद, रामायण, दर्शन शास्त्र, व्याकरण प्रत्येक क्षेत्र में हस्ताक्षर किये।


कई युनिवर्सिटीयों ने उन्हें महामहोपाध्याय एवं जगद्गुरु की पदवीयां प्रदान की।

परंतु इतिहास उन्हें श्री राम जन्मभूमि केस के लिये याद रखेगा।


जब एक संत अदालत में खडे थे।


इलाहाबाद हाईकोर्ट


तीन सौ वकीलों से भरी हुई अदालत


दलीलें, कोलाहल, राजनीति और अविश्वास से भरा हुआ वातावरण


और बीच मे खडे -


एक अंध संत


उन्हें पूछा गया “क्या रामचरितमानस में राम के जन्म स्थान का कोई उल्लेख है?


उन्होंने एक भी पल हिचकिचाए बिना तुलसीदास जी का दोहा पढा।

*तुरंत दूसरा आक्रमण हुआ-*

“क्या वेदों में कोई साक्ष्य है। जो ये सिद्ध कर की श्री राम का जन्म यहां हुआ था”


इस बार उत्तर और भी गहन था।


उन्होंने कहा, “अथर्व वेद, दसवें अध्याय के इकत्तीसवें मंत्र में स्पष्ट रुप से उल्लेख है”


अदालत स्तब्ध हो गयी

उस के बाद न्यायाधीशों की बेंच में से-

जिस में एक मुस्लिम न्यायाधीश भी थे - का वो ऐतिहासिक निवेदन आया।


साहब, आप एक दिव्य आत्मा हो


सुबूत के 441 टुकड़े


अदालत ने उन में से 437 को मान्य रखा


कल्पना कीजिए–


दुनिया जिसे अंध कहती है।


वो भारत के सब से ज्यादा विवादास्पद इतिहास को सुबूतों को साथ देख रहे थे



एक बार जाने कौन से राजनीतिक लाभ के लिये ये कदम भी उठाया गया था


जब एक राजनीतिक सौगंध पत्र में कहा गया कि,


“राम का जन्म हुआ ही नहीं था”


तब ये संत ने मुंह पर ताला लगा लिया था


उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखा—और सिर्फ एक वाक्य ने सब को मौन कर दिया था।


“आप के गुरु ग्रंथ साहिब में,


राम नाम का 5600 बार उल्लेख हुआ है।


ये तर्क नहीं था


ये सांस्कृतिक स्मृति थी


क्या वे सचमुच अंध हैं?


प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने एक बार उन से कहा था “मैं आप के उपचार और दर्शन की व्यवस्था कर सकती हूं।


संत ने हंसकर कहा था “मैं इस दुनिया को नहीं देखना चाहता”


एक बार उन्होंने कहा था “मैं अंध नहीं हूं”


मैंने अंध होने का कभी भी लाभ नहीं लिया है


मैं भगवान श्री राम को बहुत नजदीक से देखता हूं


उसी क्षण उन के मन में एक बात घर कर गयी


आंखों से देखना और दर्शन करना दो अलग अलग घटनाएं हैं


सनातन की जीती जागती मशाल


एसे संत शास्त्रों में नहीं, वास्तव में और ऐतिहासिक काल में जन्म लेते हैं। इन का अस्तित्व चमत्कार करने के लिये नहीं; बल्कि सभ्यता को दर्पन दिखाने के लिये होता है।

आज अगर सनातन संस्कृति सांस ले रही है, जीवंत है तो एसे मौन तपस्वीओं के कारण सांस ले रही है, जीवंत है।

उन्हें अंध कहना हमारे अंधत्व को दर्शाता है।

एसे संतों को वंदन

एसी चेतना को वंदन


जय श्री राम 🚩🙏

अनुवादक - कुमार अहमदाबादी 

सोमवार, जनवरी 26

परिवार तोडिये बाज़ार बनाइये

 परिवार तोडिये बाज़ार बनाइये

आप को इस का रतीभर भी एहसास नहीं है कि कौन हम सब को कठपुतली की नचा रहा है।

1)

जब विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं तब होशियार विद्यार्थी को मल्टीनेशनल कंपनी तुरंत बडे पैकेज के साथ नौकरी दे देती है..! साथ ही साथ उस का तबादला होता रहता है। विदेश जाना भी होता है।

2)

विश्व सुंदरी के पुरस्कार द्वारा प्रचार + फिल्मों के माध्यम से + फिटनेस का उन्माद एवं विज्ञापन द्वारा श्रंगार बाजार का निर्माण कर के उस की तरफ चुंबक सा खिंचाव पैदा जाता है।

3)

प्रत्येक व्यक्ति के पास मोबाइल+ वाहन =एक बड़ा बाजार 

4)

ब्रांडेड उपकरण को एक आकर्षण पैदा कर के आप के सामने ऑनलाइन सस्ते दामों का लालच देकर परोसा जाता है। 

5)

प्राइवेसी शादीशुदा जोडों का अधिकार है; कहकर पारिवारिक वातावरण को दूषित किया जाता है। लेकिन लोग ये नहीं समझ सकते की ये संयुक्त परिवार को खंडित करने का षडयंत्र है। 

6)

हम दो हमारे दो…जैसी भावना में बहकर और देर से शादी करने के चक्रव्यूह में फंसा हिन्दू भविष्य के 100 वर्ष बाद के हिन्दूओं के लिये गुलामी का प्रबंध कर रहा है।

7)

बच्चों को सात्विक लड्डू + घर का भोजन + घरेलू मिठाइयों से दूर करने वाले विज्ञापन + सोशियल मिडिया की रील से युवा पीढी को वैचारिक दृष्टिकोण से कमजोर किया जा रहा है। 

8)

टुरिज्म के क्षेत्र में परोक्ष रुप से भारतीय त्यौहारों के प्रति उदासीनता निरसता फैलाकर संस्कृति से दूर करने का षडयंत्र कितने लोगों को समझ में आ रहा है। 

9)

वातानुकूलित(एयर कंडीशंड) ऑफिस की लालच ने नौजवानों को परावलंबी(दूसरों पर निर्भर) कर दिया है। नौकरी कर के प्राइवेट बैंक से लोन लेकर वैभवशाली जीवन जीने की मानसिकता के फलस्वरूप विदेशी बाजारों ने भारतीयों को घेर लिया है; बल्कि कहना चाहिए जकड़ लिया है।

10)

स्वदेशी उपकरण + स्वदेशी सामग्री को तुच्छ माना जाता है। जब की विदेशी उपकरण + सामग्री को श्रेष्ठ माना जाता है। जब की इस अवधारणा ये सोच से भारतीय कौशल + स्वावलंबी + आत्मनिर्भरता से विपरीत आचरण किया जा रहा है। 

11)

सतीत्व + पवित्रता + प्रामाणिकता को तिलांजली देकर लिव इन रिलेशन वाला समाज हमारे बन रहा है। अनैतिक संबंध, अन्यत्र संबंध मनोरंजन के किसी प्रकार की नैतिक सोच से हटकर बन रहे हैं। 


एसे अनेक शकुनि की चाल जैसे पासे हमारी सभ्यता, संस्कृति, संस्कारों के नष्ट करने के लिये फेंके गये हैं; और आज भी फेंके जा रहे हैं।‌ जिन का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, सभ्यता को जडों सहित उखाडने का है। ये विदेशी शक्तियों द्वारा भारतीयों को मानसिक + सामाजिक रुप से विकलांग व गुलाम बनाने की एसी रणनीति है। जो 99.99 प्रतिशत हिन्दूओं को समझ में नहीं आ रही है। एसा नहीं है की मैं ये षडयंत्र समझ सका हूं इसलिए मैं ही विद्वान हूं। प्रत्येक व्यक्ति ये समझता है लेकिन स्वीकार नहीं करता। स्वयं को आधुनिक विचारधारा वाला मानते हैं। मेरे जैसों को संकीर्ण मानसिकता + गंवार + अज्ञानी आदि आदि मानते हैं; एवं स्वयं बाजार का प्यादा बनकर गर्वान्वित महसूस करते हैं। 


अब ये हम सब को यानि आप को मुझ को इस को उस को सब को मिलकर विचार + विमर्श + विवेक से ये तय करना है। भारत के भविष्य को बाज़ार का खिलौना बनने से कैसे रोका जाए? मैं शत प्रतिशत विश्वास से कह सकता हूं। एक एक भारतीय की यही इच्छा व राय होगी। भारत के भविष्य के बाजार को विदेशी हाथों का खिलौना बनने से रोकना है।


जय श्री कृष्णा

 

भारत माता की जय 

वंदे मातरम्….






भाव मंथन से जनमती है ग़ज़ल (ग़ज़ल)


शायरों के भाव मंथन से जनमती है ग़ज़ल 

रागिणी का साथ मिलने पर थिरकती है ग़ज़ल 


तृप्त जब होती है शायर की अधूरी आरज़ू 

कल्पनाओं के क्षितिज पर तब उभरती है ग़ज़ल 


मेनका मदमस्त होकर नृत्य जब करती है तब 

उस की हर मुद्रा से टप टप टप टपकती है ग़ज़ल 


काव्य के आकाश में लाखों सितारे हैं मगर

काव्य-नभ में ध्रुव सितारे सी चमकती है ग़ज़ल


अर्क छिड़के कागज़ों पर जब लिखी जाती है ये 

कल्पना कहती है पुष्पों सी महकती है ग़ज़ल 


शौक है इस को भी सजने का संवरने का ‘कुमार’

प्रास अलंकारों से नित सिंगार करती है ग़ज़ल

कुमार अहमदाबादी 

गुरुवार, जनवरी 22

अनेकार्थक शब्द



- *पट* – वस्त्र, पर्दा, दरवाजा, स्थान, चित्र का आधार।


- *पत्र* – चिट्ठी, पत्ता, रथ, बाण, शंख, पुस्तक का पृष्ठ।


- *पद्म* – कमल, सर्प विशेष, एक संख्या।


- *पद* – पाँव, चिह्न, विशेष, छन्द का चतुर्थाँश, विभक्ति युक्त शब्द, उपाधि, स्थान, ओहदा, कदम।


- *पतंग* – पतिँगा, सूर्य, पक्षी, नाव, उड़ाने का पतंग।


- *पय* – दूध, अन्न, जल।


- *पयोधर* – बादल, स्तन, पर्वत, गन्ना, तालाब।


- *पानी* – जल, मान, चमक, जीवन, लज्जा, वर्षा, स्वाभिमान।


- *पुष्कर* – तालाब, कमल, हाथी की सूँड, एक तीर्थ, पानी मद।


• *पृष्ठ* – पीठ, पीछे का भाग, पुस्तक का पेज।


- *प्रत्यक्ष* – आँखोँ के सामने, सीधा, साफ।


- *प्रकृति* – स्वभाव, वातावरण, मूलावस्था, कुदरत, धर्म, राज्य, खजाना, स्वामी, मित्र।


- *कल* – मशीन, आराम, सुख, पुर्जा, मधुर ध्वनि, शान्ति, बीता हुआ दिन, आने वाला दिन।


- *कक्ष* – काँख, कमरा, कछौटा, सूखी घास, सूर्य की कक्षा।


- *कर्ता* – स्वामी, करने वाला, बनाने वाला, ग्रन्थ निर्माता, ईश्वर, पहला कारक, परिवार का मुखिया।


- *कलम* – लेखनी, कूँची, पेड़-पौधोँ की हरी लकड़ी, कनपटी के बाल।


- *कलि* – कलड, दुःख, पाप, चार युगोँ मेँ चौथा युग।


- *कशिपु* – चटाई, बिछौना, तकिया, अन्न, वस्त्र, शंख।


- *काल* – समय, मृत्यु, यमराज, अकाल, मुहूर्त, अवसर, शिव, युग।


- *काम* – कार्य, नौकरी, सिलाई आदि धंधा, वासना, कामदेव, मतलब, कृति।


- *किनारा* – तट, सिरा, पार्श्व, हाशिया।


- *कुल* – वंश, जोड़, जाति, घर, गोत्र, सारा।


- *कुशल* – चतुर, सुखी, निपुण, सुरक्षित।


- *कुंजर* – हाथी, बाल।


- *कूट* – नीति, शिखर, श्रेणी, धनुष का सिरा।


- *कोटि* – करोड़, श्रेणी, धनुष का सिरा।


- *कोष* – खजाना, फूल का भीतरी भाग।


- *क्षुद्र* – नीच, कंजूस, छोटा, थोड़ा।


- *खंड* – टुकड़े करना, हिस्सोँ मेँ बाँटना, प्रत्याख्यान, विरोध।


- *खग* – पक्षी, बाण, देवता, चन्द्रमा, सूर्य, बादल।


- *खर* – गधा, तिनका, दुष्ट, एक राक्षस, तीक्ष्ण, धतूरा, दवा कूटने की खरल।


- *खत* – पत्र, लिखाई, कनपटी के बाल।


- *खल* – दुष्ट, चुगलखोर, खरल, तलछट, धतूरा।


- *खेचर* – पक्षी, देवता, ग्रह।


- *गंदा* – मैला, अश्लील, बुरा।


- *गड* – ओट, घेरा, टीला, अन्तर, खाई।


- *गण* – समूह, मनुष्य, भूतप्रेत, शिव के अनुचर, दूत, सेना।


- *गति* – चाल, हालत, मोक्ष, रफ्तार।


- *गद्दी* – छोटा गद्दा, महाजन की बैठकी, शिष्य परम्परा, सिँहासन।


- *गहन* – गहरा, घना, दुर्गम, जटिल।


- *ग्रहण* – लेना, सूर्य व चन्द ग्रहण।


- *गुण* – कौशल, शील, रस्सी, स्वभाव, विशेषता, हुनर, महत्त्व, तीन गुण (सत, तम व रज), प्रत्यंचा (धनुष की डोरी)।


- *गुरु* – शिक्षक, बड़ा, भारी, श्रेष्ठ, बृहस्पति, द्विमात्रिक अक्षर, पूज्य, आचार्य, अपने से बड़े।


- *गौ* – गाय, बैल, इन्द्रिय, भूमि, दिशा, बाण, वज्र, सरस्वती, आँख, स्वर्ग, सूर्य।


- *घट* – घड़ा, हृदय, कम, शरीर, कलश, कुंभ राशि।


- *घर* – मकान, कुल, कार्यालय, अंदर समाना।


- *घन* – बादल, भारी हथौड़ा, घना, छः सतही रेखागणितीय आकृति।


- *घोड़ा* – एक प्रसिद्ध चौपाया, बंदूक का खटका, शतरंज का एक मोहरा।


- *अंक* – संख्या के अंक, नाटक के अंक, गोद, अध्याय, परिच्छेद, चिह्न, भाग्य, स्थान, पत्रिका का नंबर।


- *अंग* – शरीर, शरीर का कोई अवयव, अंश, शाखा।


- *अंचल* – सिरा, प्रदेश, साड़ी का पल्लू।


- *अंत* – सिरा, समाप्ति, मृत्यु, भेद, रहस्य।


- *अंबर* – आकाश, वस्त्र, बादल, विशेष सुगन्धित द्रव जो जलाया जाता है।


- *अक्षर* – नष्ट न होने वाला, अ, आ आदि वर्ण, ईश्वर, शिव, मोक्ष, ब्रह्म, धर्म, गगन, सत्य, जीव।


- *अर्क* – सूर्य, आक का पौधा, औषधियोँ का रस, काढ़ा, इन्द्र, स्फटिक, शराब।


- *अकाल* – दुर्भिक्ष, अभाव, असमय।


- *अज* – ब्रह्मा, बकरा, शिव, मेष राशि, जिसका जन्म न हो (ईश्वर)।


- *अर्थ* – धन, ऐश्वर्य, प्रयोजन, कारण, मतलब, अभिप्रा, हेतु (लिए)।


- *अक्ष* – धुरी, आँख, सूर्य, सर्प, रथ, मण्डल, ज्ञान, पहिया, कील।


- *अजीत* – अजेय, विष्णु, शिव, बुद्ध, एक विषैला मूषक, जैनियोँ के दूसरे तीर्थँकर।


- *अतिथि* – मेहमान, साधु, यात्री, अपरिचित व्यक्ति, अग्नि।


*🏆 

मंगलवार, जनवरी 20

कोमल है प्यारी है (रुबाई)


 ये भोली कोमल और संस्कारी है
रिश्तेदारों को मन से प्यारी है 
जल सी चंचल सागर सी गहरी औ'
गंगा सी पावन ये सन्नारी है
कुमार अहमदाबादी 

शनिवार, जनवरी 17

वेनेजुएला का पतन (अनुदित)

अनुवादक - महेश सोनी 

पीढीयों तक फैला एक मानसिक गुनाह --

भारत के लिये एक भयानक चेतावनी 


ये कोई एसे देश की कहानी नहीं है जो टूट गया।


ये एक एसे समाज की कहानी है। जिस की मानसिक रुप से हत्या की गयी। 


जब वेनेजुएला का विचार आता है, तब सब एक ही बात कहते हैं - अमेरिका दोषी है।


हां....इस में कोई दो राय नहीं की वो है।

परंतु वास्तविक प्रश्न ये है।

👉 वेनेजुएला इतना कमजोर क्यों हुआ? 

एक एक श्रीमंत राष्ट्र ने कैसे अपने ही लोगों के हाथों अपना सर्वनाश कर लिया।


जवाब --

एक मानसिक गुनाह जो पीढीयों तक होता रहा। 

एक भयानक राजकीय कहानी जिसने पूरे देश का भाग्य बदल दिया। 

🌴एक समय था वेनेजुएला स्वर्ग था।

लेटिन अमरीका में सब से ज्यादा तेजी से विकसित हो रहा देश था। 

विश्व की पहली दस अर्थव्यवस्था में शामिल देश था।

देश के समंदर किनारे सैलानीओं से भरे रहते थे।

एसा देश जिसने सब से ज्यादा मिस वर्ल्ड और मिस युनिवर्स को जन्म दिया।

पूरे विश्व के युवाओं का ये स्वप्न होता था कि वे वेनेजुएला में काम करें, करियर बनाएं।


इसीलिए उस देश में विनाश के बीज बोये गये।


*बीज का फैलाने का पहला दौर*

लोगों के मन में जहर फैलाना

ह्युगो चावेज नाम के नेता का उदय हुआ 

उस का पहला निवेदन था "बड़े उद्योगपति देश को लूट रहे हैं" 


ये आर्थिक विश्लेषण नहीं था बल्कि भावनात्मक चालाकी थी। 


जिस तरह आज भारत में अंबानी व अदानी की राजकीय आलोचना हो रही है। उसी तरह चावेज ने वेनेजुएला की आठ बडी तेल कंपनियों को प्रजा की दुश्मन बताना शुरु किया। 


"तेल के सारे कुएं प्रजा के क्यों न नहीं होने चाहिये?" 


उस ने लोगों के मन में ईर्ष्या, गुस्से, और नफरत के बीज बो दिये।


यहां से मानसिक अपराध आरंभ होते हैं। 


लोगों के मन में शत्रुओं की जरुरत पैदा होती है।


🎭 दूसरा दौर: फर्जी मसीहा का भ्रम 


एसी परिस्थितियों में एक एसा नेता उभरता है। जो कहता है "मैं आप के लिये लडूंगा" 


लोग उस पर विश्वास करने लगते हैं। लोग उसे संकटमोचक के रुप में देखने लगते हैं। 


यह वो स्थान है जहां लोकशाही धीमे धीमे मृत्यु को प्राप्त होती है।


💸 तीसरा दौर: मुफ्त खोरी का नशा - नर्वस सिस्टम पर हमला


चावेज ने प्रजा को एक स्वप्न दिखाया।


हमारे पास बहुत तेल है। हम अपने देश में उसे आधा पैसा प्रति लीटर के भाव से बेचेंगे।


प्रत्येक परिवार को हर महीने 10,000 बोलिवर मिलेंगे।

वो भी घर बैठे।


लोग मंत्रमुग्ध हो गये।


ये उसी प्रकार के वचन थे। जिस प्रकार के हमने सुन रहे हैं।


"खटाखट खटाखट" 


ये नीति नहीं है। ये लोगों के नर्व सिस्टम पर कबजा है। सरल भाषा में कहें तो लोगों के मानस अर्थात दिलो दिमाग को कंट्रोल में करना है। 


काम और पुरस्कार के बीच की कडी टूट गयी है।


श्रम का मूल्य समाप्त हो जाता है।


देश अस्तित्व में अवश्य रहता है लेकिन सोचना छोड़ देता है।


चावेज सत्ता पर आया। 


 🏭 चौथा दौर : अर्थ तंत्र का विसर्जन 


सारी प्राइवेट कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।


निवेशक देश से भाग गये।


लोगों को मुफ्त पैसा मिलने से काम की ज़रूरत न रही।


📉 उत्पादन घटा

📉 GDP टूट गयी

📈 मुद्रा स्फीति आकाश को छू गयी


🖨️ पांचवां दौर: भ्रामक धारणाएं - आर्थिक आत्महत्या 


जैसे ही अर्थ व्यवस्था टूटी, चावेज ने निर्णय किया।

"हम ज्यादा नोट छापेंगे। उस से गरीबी गायब हो जाएगी" 


भूतकाल में राहुल गांधी और पत्रकार रविश कुमार ने भी समान विचार पेश किये थे। 


इस ख़तरनाक विचार को अमल में लाया गया। 

परिणाम?

💵 आखिर कार 1000 करोड़ की बोलिवर नोट छापनी पड़ी।

🧹 करेंसी के नोट कचरे की तरह गलियों में बिखर गयी।

🚛 म्युनिसिपल कर्मचारियों ने उन्हें ट्रक में डालकर कूड़ेदान के हवाले कर दी।


ये आर्थिक नाकामी नहीं थी। 


ये राष्ट्र की बुद्धि का पतन था।


 🧬 छट्ठा दौर: पीढी दर पीढी की मानसिक विरासत

इस नीति के अंतर्गत बड़े होनेवाले बच्चे ये सीखते हैं।


मुफ्त पाना मेरा हक है।

कड़ी मेहनत मूर्खता है।

प्रश्न पूछना विश्वासघात है।


ये सब मस्तिष्क को नुक्सान करते हैं।


🪦 सातवां दौर: राजवंशीय सरमुखत्यार शाही 

अपने मृत्यु से पहले चावेज ने निकोलस मादुरो को अपने अनुगामी नियुक्त कर दिया।


चावेज > मादुरो

नेहरु > इन्दिरा > राजीव > राहुल 

वेनेजुएला में भी इसी तरह की राजकीय डीेएनए अस्तित्व में था।


योग्यता का कोई महत्व नहीं था।

किसी एक बडे परिवार में जन्म लेना ही सत्ता प्राप्त करने की योग्यता मान ली जाती है।


पारिवारिक शासन स्वाभाविक लगता है। 


चुनाव गैरजरूरी लगते हैं।


ये कोई राजनीतिक व्यवस्था नहीं है बल्कि एक मायाजाल है।


मादुरो अपने मार्गदर्शक चावेज से एक कदम आगे बढ़ गये। 


जिस तरह राहुल गांधी हिन्दू मतो को आकर्षित करने के लिये चुनावों के दौरान मंदिरों में जाते हैं। उसी तरह साम्यवादी मादुरो लोगों को भ्रमित करने के लिये चर्च जाने लगे।


मादुरो सत्ता पर काबिज होने के बाद भ्रष्टाचार व अराजकता चरम सीमा पर पहुंच गयी।


चुनाव रद्द किये गये। विरोध पक्ष को दबाया गया। 


खुद को देश का प्रमुख घोषित कर दिया।


🚨 आज वेनेजुएला की लगभग 80% आबादी कोलंबिया, ब्राजील व अर्जेंटीना में शरणार्थी बनकर जी रही है।


खाना नहीं है।

रोजगार नहीं है।

कोई गौरव नहीं है।


जो देश एक समय सुंदरता और समृद्धि का ठिकाना था। वो भूखमरी व कंगाली में सांस ले रहा है।


एक समय का स्वर्ग आज जीवंत नर्क है।


🇮🇳 भविष्य का भारत - भविष्यवाणी नहीं पर चेतावनी 


वेनेजुएला का इतिहास एक बोधपाठ है।


👉 लोगों के मन को कैद करना काफी है।

वो वास्तव में पीढीयों तक फैला मानसिक गुनाह है।


ये कोई राजनीतिक भाषण नहीं है। 


इतिहास द्वारा दी गयी चेतावनी है।


आप से करबद्ध विनती है। आप अपने राष्ट्र से प्रेम करते हों तो इसे कम से कम 10 समूहों (ग्रुप) में एवं अपने परिचितों को भेजिये।

मंगलवार, जनवरी 13

संगीत द्वारा रोगों का उपचार


(कॉपी पेस्ट)

संगीत द्वारा बहुत सी बीमारियों का उपचार संभव है, चिकित्सा विज्ञान मानता हैं। प्रतिदिन २० मिनट मन पसंद संगीत सुनने से बहुत रोगों से बचा जा सकता है। रोग का संबंध किसी ना किसी ग्रह विशेष से होता हैं,उसी प्रकार संगीत के सुरों व रागों का संबंध भी किसी ना किसी ग्रह से होता हैं। जातक को जिस ग्रह विशेष से संबन्धित रोग हो और उसे उस ग्रह से संबन्धित राग, सुर अथवा गीत सुनाये जायें तो जातक शीघ्र स्वस्थ होता हैं| जिन शास्त्रीय रागों का उल्लेख किया है उन रागों मे कोई भी गीत, भजन या वाद्य यंत्र बजाया या सुना जा सकता हैं। (सुर व राग से संबन्धित फिल्मी गीत उदाहरण के लिए)

ध्रुव वैद्य

1. हृदय रोग (cardiac care)

राग दरबारी व राग सारंग से संबन्धित संगीत सुनना लाभदायक है। इनसे संबन्धित गीत हैं :-

* तोरा मन दर्पण कहलाए (काजल),

* राधिके तूने बंसरी चुराई (बेटी बेटे ),

* झनक झनक तोरी बाजे पायलिया ( मेरे हुज़ूर ),

* बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम (साजन),

* जादूगर सइयां छोड़ मोरी (फाल्गुन),

* ओ दुनिया के रखवाले (बैजू बावरा ),

* मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोये (मुगले आजम )

2. अनिद्रा (insomania)

राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता है, जिनके प्रमुख गीत हैं :-

* रात भर उनकी याद आती रही (गमन),

* नाचे मन मोरा (कोहिनूर),

* मीठे बोल बोले बोले पायलिया (सितारा),

* तू गंगा की मौज मैं यमुना (बैजु बावरा),

* ऋतु बसंत आई पवन (झनक झनक पायल बाजे),

* सावरे सावरे (अनुराधा),

* चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम),

* छम छम बजे रे पायलिया (घूँघट ),

* झूमती चली हवा (संगीत सम्राट तानसेन ),

* कुहू कुहू बोले कोयलिया (सुवर्ण सुंदरी )

3. एसिडिटी (acidity)

होने पर राग खमाज सुनने से लाभ मिलता है | इस राग के प्रमुख गीत हैं :-

* ओ रब्बा कोई तो बताए प्यार (संगीत),

* आयो कहाँ से घनश्याम (बुड्ढा मिल गया),

* छूकर मेरे मन को (याराना),

* कैसे बीते दिन कैसे बीती रतिया (अनुराधा),

* तकदीर का फसाना गाकर किसे सुनाये ( सेहरा ),

* रहते थे कभी जिनके दिल मे (ममता ),

* हमने तुमसे प्यार किया हैं इतना (दूल्हा दुल्हन ),

* तुम कमसिन हो नादां हो (आई मिलन की बेला)

4. दुर्बलता (weakness)

यह शारीरिक शक्तिहीनता से संबन्धित है| व्यक्ति कुछ कर पाने मे स्वयं को असमर्थ अनुभव करता है। इस में राग जयजयवंती सुनना या गाना लाभदायक है। इस राग के प्रमुख गीत हैं :-

* मनमोहना बड़े झूठे (सीमा),

* बैरन नींद ना आए (चाचा ज़िंदाबाद),

* मोहब्बत की राहों मे चलना संभलके (उड़न खटोला ),

* साज हो तुम आवाज़ हूँ मैं (चन्द्रगुप्त ),

* ज़िंदगी आज मेरे नाम से शर्माती हैं (दिल दिया दर्द लिया ),

* तुम्हें जो भी देख लेगा किसी का ना (बीस साल बाद )

5. स्मरण (memory loss)

जिनका स्मरण क्षीण हो रहा हो, उन्हे राग शिवरंजनी सुनने से लाभ मिलता है | इस राग के प्रमुख गीत है -

* ना किसी की आँख का नूर हूँ (लालकिला),

* मेरे नैना (मेहेबूबा),

* दिल के झरोखे मे तुझको (ब्रह्मचारी),

* ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम (संगम ),

* जीता था जिसके (दिलवाले),

* जाने कहाँ गए वो दिन (मेरा नाम जोकर )

6. रक्त की कमी (animia)

होने पर व्यक्ति का मुख निस्तेज व सूखा सा रहता है। स्वभाव में भी चिड़चिड़ापन होता है। ऐसे में राग पीलू से संबन्धित गीत सुनें :-

* आज सोचा तो आँसू भर आए (हँसते जख्म), * नदिया किनारे (अभिमान),

* खाली हाथ शाम आई है (इजाजत),

* तेरे बिन सूने नयन हमारे (लता रफी),

* मैंने रंग ली आज चुनरिया (दुल्हन एक रात की),

* मोरे सैयाजी उतरेंगे पार (उड़न खटोला),

7. मनोरोग अथवा अवसाद (psycho or depression)

राग बिहाग व राग मधुवंती सुनना लाभदायक है। इन रागों के प्रमुख गीत है :-

* तुझे देने को मेरे पास कुछ नही (कुदरत नई), * तेरे प्यार मे दिलदार (मेरे महबूब),

* पिया बावरी (खूबसूरत पुरानी),

* दिल जो ना कह सका (भीगी रात),

* तुम तो प्यार हो (सेहरा),

* मेरे सुर और तेरे गीत (गूंज उठी शहनाई ),

* मतवारी नार ठुमक ठुमक चली जाये मोहे (आम्रपाली),

* सखी रे मेरा तन उलझे मन डोले (चित्रलेखा)

8. रक्तचाप (blood pressure)

ऊंचे रक्तचाप मे धीमी गति और निम्न रक्तचाप मे तीव्र गति का गीत संगीत लाभ देता है। शास्त्रीय रागों मे राग भूपाली को विलंबित व तीव्र गति से सुना या गाया जा सकता है। -----ऊंचे रक्तचाप मे (high BP)

* चल उडजा रे पंछी कि अब ये देश (भाभी),

* ज्योति कलश छलके (भाभी की चूड़ियाँ ),

* चलो दिलदार चलो (पाकीजा ),

* नीले गगन के तले (हमराज़)

-----निम्न रक्तचाप मे (low BP)

* ओ नींद ना मुझको आए (पोस्ट बॉक्स न. 909),

* बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना (जिस देश मे गंगा बहती हैं ),

* जहां डाल डाल पर ( सिकंदरे आजम ),

* पंख होते तो उड़ आती रे (सेहरा )

9. अस्थमा (asthma)

आस्था तथा भक्ति पर आधारित गीत संगीत सुनने व गाने से लाभ राग मालकँस व राग ललित से संबन्धित गीत सुने जा सकते हैं। जिनमें प्रमुख गीत :-

* तू छुपी हैं कहाँ (नवरंग),

* तू है मेरा प्रेम देवता (कल्पना),

* एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल (लीडर),

* मन तड़पत हरी दर्शन को आज (बैजू बावरा ), आधा है चंद्रमा ( नवरंग )

10. शिरोवेदना (headache)

राग भैरव सुनना लाभदायक होता है। इस राग के प्रमुख गीत :-

मोहे भूल गए सावरियाँ (बैजू बावरा),

 राम तेरी गंगा मैली (शीर्षक),

 पूछों ना कैसे मैंने रैन बिताई (तेरी सूरत मेरी आँखें),

 सोलह बरस की बाली उमर को सलाम (एक दूजे के लिए) 

सोमवार, जनवरी 5

पूर्व प्राथमिक शिक्षा क्यों जरुरी है

 अनुवादक – महेश सोनी

ये बिल्कुल जरुरी नहीं है। बच्चा पहली कक्षा में प्रवेश करे उस से पहले उसे विधिसर पढ़ाया जाये। आज से वर्षों पहले प्ले ग्रुप या नर्सरी वगैरह नहीं होते थे। इस के बावजूद बच्चे शिक्षा प्राप्त में पिछड़ते नहीं थे। कुछ अनुभव एसे हैं। जो बच्चे द्वारा विधिवत शिक्षा प्राप्त करने से पहले प्राप्त करने जरुरी है। बच्चा इन अनुभवों को प्राप्त करता भी है। उदाहरण......पांच वर्ष की उम्र तक बच्चा किसी प्ले ग्रुप या बाल शिशु मंदिर में गये बिना अंदाजन 2500 शब्दों का भंडार इकट्ठा कर लेता है। जब कि नये क्षमताधिष्ठित अभ्यासक्रम में ये अपेक्षा रखी गयी है। बच्चे में पहली कक्षा के बाद 1500 शब्दों के अर्थ को ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिये। इस सोच के अनुसार बच्चा पहली कक्षा में आने तक रोजमर्रा के जीवन में वाणी और व्यवहार से इतना शब्द भंडार प्राप्त कर लेता है। एसे में ये होता है। बच्चे को अंग्रेजी माध्यम की पाठशाला में दाखिला दिलाया जाने पर उसे शिक्षा प्राप्त करने की शुरुआत जीरो से करनी पड़ती है। 


बचपन के प्रथम पांच वर्ष बच्चे के व्यक्तित्व के विकास के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। बच्चा उन पांच वर्षों के दौरान प्रति पल कुछ न कुछ सीखता है। हर घड़ी वो कुछ न कुछ शिक्षा प्राप्त करता है। उस के विकास की गति बहुत तेज होती है। बाल मनोविज्ञानियों का मानना है कि इंसान जन्म से लेकर मृत्यु तक जितना सीखता है। उस में से आधा तो तीन वर्ष की आयु तक सीख लेता है। मनुष्य हलन चलन, भाषा, स्वभाव, वृत्तियां बर्ताव आदि जीवन के पहले तीन वर्षों में सीख जाता है। हालांकि तब वो शारीरिक रुप से पूर्ण विकसित नहीं होता। बच्चा उम्र के चौथे वर्ष तक बच्चे के शरीर के स्नायु यानि की मांसपेशियों को सही तरीके से चलाना नहीं सीखता। उसे सही तरीके से संकलित करना नहीं आता। पेन या पेंसिल पकड़कर लिखने के लिये उस के हाथ तैयार नहीं होते। उस समय उस से जबरदस्ती लिखवाने से ये खतरा रहता है। जीवनभर वो स्वच्छ व सुंदर अक्षरों में लिख नहीं सकता। उस की लिखावट जीवनभर के लिये खराब रहती है। उस उमर में बच्चे कपड़े पहन सकता है। लेकिन बटन सही तरीके से बंध नहीं कर सकता। वो जूते के फीते सही तरीके से बांध नहीं सकता। वो छोटे छोटे स्नायुओं पर आयु के पांचवें वर्ष में नियंत्रण प्राप्त करता है। पांच वर्ष का होते होते वो शारीरिक रुप से स्वतंत्र हो जाता है। वो अपनी दैनिक क्रियाओं के लिये निर्भर नहीं रहता। जैसे पहले होता है। उदाहरण देखें तो, पहले पहले कपड़े भी माता पिता या काका बुआ आदि पहनाते हैं। 

इसीलिये पांच वर्ष पूरे होने से पहले बच्चे का विधिवत शिक्षण शुरु नहीं होना चाहिये। ये ही वो कारण है कि बच्चों को पहली कक्षा में प्रवेश की आयु मर्यादा पांच वर्ष पूरे होने के बाद की तय की गयी है। 

लेकिन माता पिता ये अपेक्षाएं रखने लगे हैं। उन का बच्चा नर्सरी या बालमंदिर यानि से ही पेन पकड़कर लिखने लगे या किताब को हाथ में रखकर पढ़ने लगे। कई माता–पिता शिक्षकों को ये कहते हैं कि *"हमारे बच्चे को लिखना पढ़ना क्यों नहीं आता?"* लेकिन ये एकदम गलत अवैज्ञानिक अभिगम है। सही बात ये है। आयु के प्रथम पांच वर्षों के दौरान बच्चे का सही व पूर्ण विकास माता पिता की मीठी प्रेम दृष्टि की छत्रछाया में ही होता है। 

हिम्मतभाई महेता लिखित पुस्तक *बाल्यावस्था व कुमारावस्था की शिक्षा समस्याएं* (प्रकाशक –बालविनोद प्रकाशन द्वारा प्रकाशित) किताब के पहले प्रकरण *पूर्व प्राथमिक शिक्षा केटलुं जरुरी?* के कुछ पेरेग्राफ का अनुवाद

अनुवादक – महेश सोनी

बेटी….

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