अनुवादक - महेश सोनी
पीढीयों तक फैला एक मानसिक गुनाह --
भारत के लिये एक भयानक चेतावनी
ये कोई एसे देश की कहानी नहीं है जो टूट गया।
ये एक एसे समाज की कहानी है। जिस की मानसिक रुप से हत्या की गयी।
जब वेनेजुएला का विचार आता है, तब सब एक ही बात कहते हैं - अमेरिका दोषी है।
हां....इस में कोई दो राय नहीं की वो है।
परंतु वास्तविक प्रश्न ये है।
👉 वेनेजुएला इतना कमजोर क्यों हुआ?
एक एक श्रीमंत राष्ट्र ने कैसे अपने ही लोगों के हाथों अपना सर्वनाश कर लिया।
जवाब --
एक मानसिक गुनाह जो पीढीयों तक होता रहा।
एक भयानक राजकीय कहानी जिसने पूरे देश का भाग्य बदल दिया।
🌴एक समय था वेनेजुएला स्वर्ग था।
लेटिन अमरीका में सब से ज्यादा तेजी से विकसित हो रहा देश था।
विश्व की पहली दस अर्थव्यवस्था में शामिल देश था।
देश के समंदर किनारे सैलानीओं से भरे रहते थे।
एसा देश जिसने सब से ज्यादा मिस वर्ल्ड और मिस युनिवर्स को जन्म दिया।
पूरे विश्व के युवाओं का ये स्वप्न होता था कि वे वेनेजुएला में काम करें, करियर बनाएं।
इसीलिए उस देश में विनाश के बीज बोये गये।
*बीज का फैलाने का पहला दौर*
लोगों के मन में जहर फैलाना
ह्युगो चावेज नाम के नेता का उदय हुआ
उस का पहला निवेदन था "बड़े उद्योगपति देश को लूट रहे हैं"
ये आर्थिक विश्लेषण नहीं था बल्कि भावनात्मक चालाकी थी।
जिस तरह आज भारत में अंबानी व अदानी की राजकीय आलोचना हो रही है। उसी तरह चावेज ने वेनेजुएला की आठ बडी तेल कंपनियों को प्रजा की दुश्मन बताना शुरु किया।
"तेल के सारे कुएं प्रजा के क्यों न नहीं होने चाहिये?"
उस ने लोगों के मन में ईर्ष्या, गुस्से, और नफरत के बीज बो दिये।
यहां से मानसिक अपराध आरंभ होते हैं।
लोगों के मन में शत्रुओं की जरुरत पैदा होती है।
🎭 दूसरा दौर: फर्जी मसीहा का भ्रम
एसी परिस्थितियों में एक एसा नेता उभरता है। जो कहता है "मैं आप के लिये लडूंगा"
लोग उस पर विश्वास करने लगते हैं। लोग उसे संकटमोचक के रुप में देखने लगते हैं।
यह वो स्थान है जहां लोकशाही धीमे धीमे मृत्यु को प्राप्त होती है।
💸 तीसरा दौर: मुफ्त खोरी का नशा - नर्वस सिस्टम पर हमला
चावेज ने प्रजा को एक स्वप्न दिखाया।
हमारे पास बहुत तेल है। हम अपने देश में उसे आधा पैसा प्रति लीटर के भाव से बेचेंगे।
प्रत्येक परिवार को हर महीने 10,000 बोलिवर मिलेंगे।
वो भी घर बैठे।
लोग मंत्रमुग्ध हो गये।
ये उसी प्रकार के वचन थे। जिस प्रकार के हमने सुन रहे हैं।
"खटाखट खटाखट"
ये नीति नहीं है। ये लोगों के नर्व सिस्टम पर कबजा है। सरल भाषा में कहें तो लोगों के मानस अर्थात दिलो दिमाग को कंट्रोल में करना है।
काम और पुरस्कार के बीच की कडी टूट गयी है।
श्रम का मूल्य समाप्त हो जाता है।
देश अस्तित्व में अवश्य रहता है लेकिन सोचना छोड़ देता है।
चावेज सत्ता पर आया।
🏭 चौथा दौर : अर्थ तंत्र का विसर्जन
सारी प्राइवेट कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
निवेशक देश से भाग गये।
लोगों को मुफ्त पैसा मिलने से काम की ज़रूरत न रही।
📉 उत्पादन घटा
📉 GDP टूट गयी
📈 मुद्रा स्फीति आकाश को छू गयी
🖨️ पांचवां दौर: भ्रामक धारणाएं - आर्थिक आत्महत्या
जैसे ही अर्थ व्यवस्था टूटी, चावेज ने निर्णय किया।
"हम ज्यादा नोट छापेंगे। उस से गरीबी गायब हो जाएगी"
भूतकाल में राहुल गांधी और पत्रकार रविश कुमार ने भी समान विचार पेश किये थे।
इस ख़तरनाक विचार को अमल में लाया गया।
परिणाम?
💵 आखिर कार 1000 करोड़ की बोलिवर नोट छापनी पड़ी।
🧹 करेंसी के नोट कचरे की तरह गलियों में बिखर गयी।
🚛 म्युनिसिपल कर्मचारियों ने उन्हें ट्रक में डालकर कूड़ेदान के हवाले कर दी।
ये आर्थिक नाकामी नहीं थी।
ये राष्ट्र की बुद्धि का पतन था।
🧬 छट्ठा दौर: पीढी दर पीढी की मानसिक विरासत
इस नीति के अंतर्गत बड़े होनेवाले बच्चे ये सीखते हैं।
मुफ्त पाना मेरा हक है।
कड़ी मेहनत मूर्खता है।
प्रश्न पूछना विश्वासघात है।
ये सब मस्तिष्क को नुक्सान करते हैं।
🪦 सातवां दौर: राजवंशीय सरमुखत्यार शाही
अपने मृत्यु से पहले चावेज ने निकोलस मादुरो को अपने अनुगामी नियुक्त कर दिया।
चावेज > मादुरो
नेहरु > इन्दिरा > राजीव > राहुल
वेनेजुएला में भी इसी तरह की राजकीय डीेएनए अस्तित्व में था।
योग्यता का कोई महत्व नहीं था।
किसी एक बडे परिवार में जन्म लेना ही सत्ता प्राप्त करने की योग्यता मान ली जाती है।
पारिवारिक शासन स्वाभाविक लगता है।
चुनाव गैरजरूरी लगते हैं।
ये कोई राजनीतिक व्यवस्था नहीं है बल्कि एक मायाजाल है।
मादुरो अपने मार्गदर्शक चावेज से एक कदम आगे बढ़ गये।
जिस तरह राहुल गांधी हिन्दू मतो को आकर्षित करने के लिये चुनावों के दौरान मंदिरों में जाते हैं। उसी तरह साम्यवादी मादुरो लोगों को भ्रमित करने के लिये चर्च जाने लगे।
मादुरो सत्ता पर काबिज होने के बाद भ्रष्टाचार व अराजकता चरम सीमा पर पहुंच गयी।
चुनाव रद्द किये गये। विरोध पक्ष को दबाया गया।
खुद को देश का प्रमुख घोषित कर दिया।
🚨 आज वेनेजुएला की लगभग 80% आबादी कोलंबिया, ब्राजील व अर्जेंटीना में शरणार्थी बनकर जी रही है।
खाना नहीं है।
रोजगार नहीं है।
कोई गौरव नहीं है।
जो देश एक समय सुंदरता और समृद्धि का ठिकाना था। वो भूखमरी व कंगाली में सांस ले रहा है।
एक समय का स्वर्ग आज जीवंत नर्क है।
🇮🇳 भविष्य का भारत - भविष्यवाणी नहीं पर चेतावनी
वेनेजुएला का इतिहास एक बोधपाठ है।
👉 लोगों के मन को कैद करना काफी है।
वो वास्तव में पीढीयों तक फैला मानसिक गुनाह है।
ये कोई राजनीतिक भाषण नहीं है।
इतिहास द्वारा दी गयी चेतावनी है।
आप से करबद्ध विनती है। आप अपने राष्ट्र से प्रेम करते हों तो इसे कम से कम 10 समूहों (ग्रुप) में एवं अपने परिचितों को भेजिये।
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